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सामान्य अध्ययन-3: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कम्प्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी और औद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के क्षेत्र में जागरूकता|
संदर्भ: भुवनेश्वर में भारत की पहली उन्नत 3D चिप पैकेजिंग इकाई की आधारशिला रखा जाना, भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के तहत एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
उन्नत 3D चिप पैकेजिंग यूनिट के बारे में

- भारत में प्रथम: ओडिशा में देश की पहली ‘ग्लास सबस्ट्रेट’ आधारित उन्नत सेमीकंडक्टर पैकेजिंग इकाई की स्थापना।
- अत्याधुनिक तकनीक: उन्नत ‘3D हेटेरोजेनियस इंटीग्रेशन’ (3D Heterogeneous Integration) मॉड्यूल की शुरुआत।
- तीव्र प्रगति: केंद्रीय कैबिनेट द्वारा अनुमोदन के कुछ ही महीनों के भीतर भूमिपूजन, जो तीव्र गति से कार्यान्वयन को दर्शाता है।
- रणनीतिक निवेश: लगभग ₹1,943 करोड़ का कुल परियोजना परिव्यय।
- रोजगार सृजन: लगभग 2,500 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियों का सृजन।
- उच्च क्षमता: प्रति वर्ष 5 करोड़ (50 मिलियन) असेंबल इकाइयों की वार्षिक उत्पादन क्षमता।
- महत्वपूर्ण अनुप्रयोग: ये चिप्स एयरोस्पेस, रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), 5G तकनीक और डेटा सेंटर जैसे प्रमुख क्षेत्रों की आवश्यकताओं को पूरा करेंगे।
3D ग्लास सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी की समझ
- पारंपरिक सेमीकंडक्टर निर्माण के विपरीत, जो ‘सिलिकॉन वेफर्स’ और ‘प्लानर (2D) पैकेजिंग’ पर निर्भर करता है, यह सुविधा ग्लास-आधारित सबस्ट्रेट्स और 3D स्टैकिंग तकनीकों का उपयोग करेगी।
- ये तकनीकें कई चिप घटकों को लंबवत रूप से एकीकृत करने की अनुमति देती हैं, जिससे समान फुटप्रिंट के भीतर ‘कंप्यूटिंग पावर’ बढ़ जाती है।
- यह दृष्टिकोण ‘हेटेरोजेनियस इंटीग्रेशन’ को सक्षम बनाता है, जहाँ लॉजिक, मेमोरी और सेंसर को कुशलतापूर्वक संयोजित किया जाता है। ग्लास सबस्ट्रेट्स उन्नत नोड्स के लिए बेहतर तापीय स्थायित्व, कम सिग्नल हानि और उच्च सटीकता प्रदान करते हैं।
यह परियोजना भारत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण चिप बेट क्यों हैं?
- मूर के नियम (Moore’s Law) से परे तकनीकी बदलाव:
- 1965 में प्रस्तावित मूर के नियम ने सुझाव दिया था कि एक चिप पर ट्रांजिस्टर की संख्या हर दो साल में दोगुनी हो जाएगी। हालांकि, जैसे-जैसे चिप्स अपनी भौतिक और तापीय सीमाओं के करीब पहुँच रहे हैं, यह गति धीमी हो गई है।
- सेमीकंडक्टर उद्योग अब उन्नत पैकेजिंग, चिपलेट्स और 3D एकीकरण जैसे विकल्पों की ओर बढ़ रहा है। 3D ग्लास सेमीकंडक्टर परियोजना इस बदलाव के अनुरूप है और केवल लघुकरण के बजाय लंबवत एकीकरण के माध्यम से प्रदर्शन में सुधार बनाए रखने के प्रयास का प्रतिनिधित्व करती है।
- भारत के लिए रणनीतिक महत्व:
- भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के तहत सभी परियोजनाओं में से, उन्नत पैकेजिंग तकनीक के मामले में इसे सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह भारत को सेमीकंडक्टर नवाचार के अत्याधुनिक स्तर पर रखता है।
- यह परियोजना निम्नलिखित माध्यमों से वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में भारत की भूमिका को मजबूत करती है:
- 3D पैकेजिंग अभियान में भागीदारी को सक्षम बनाना।
- AI, 5G, रक्षा और डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सहायता प्रदान करना।
- बाहरी तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भरता को कम करना।
भावी दिशा: ISM 2.0
- सरकार इस मिशन के अगले संस्करण पर कार्य कर रही है, जिसके लिए लगभग 11 बिलियन डॉलर के संभावित परिव्यय का अनुमान है। जहाँ ISM 1.0 का ध्यान बुनियादी ढांचे के निर्माण पर केंद्रित था, वहीं ISM 2.0 से गैस, रसायन और पूंजीगत वस्तुओं जैसे सहायक उद्योगों पर जोर देने की अपेक्षा है।
- केंद्रीय बजट 2026-27 में ‘भारतीय सेमीकंडक्टर मिशन 2.0’ की घोषणा के साथ भारत की तकनीकी महत्वाकांक्षाओं को निर्णायक प्रोत्साहन दिया गया है।
- वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹1,000 करोड़ का प्रावधान आवंटित किया गया है, जो सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता का संकेत देता है।
- बाजार-आधारित परिणामों और गहन इकोसिस्टम एकीकरण पर ध्यान केंद्रित करते हुए, ‘डिज़ाइन-लिंक्ड इंसेंटिव’ की ओर भी अधिक मजबूती से बढ़ने की संभावना है।
चुनौतियाँ और आगे की राह
- अपनी संभावनाओं के बावजूद, यह परियोजना कई चुनौतियों का सामना कर रही है। सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए उच्च पूंजी निवेश, उन्नत तकनीकी क्षमताओं और एक कुशल कार्यबल की आवश्यकता होती है।
- भारत को स्थापित सेमीकंडक्टर हब से प्रतिस्पर्धा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है।
- इन चुनौतियों के समाधान के लिए निरंतर नीतिगत समर्थन, इकोसिस्टम के विकास और अनुसंधान एवं नवाचार (R&I) में दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता होगी।
Sources:
PIB
Indian Express
PIB
PIB
