संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।

संदर्भ: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) के माध्यम से पॉलिमर करेंसी नोटों का परीक्षण करने की तैयारी कर रहा है। इसका उद्देश्य पॉलिमर नोटों की टिकाऊ क्षमता, सुरक्षा और लागत-प्रभावशीलता का आकलन करना है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • वैश्विक निविदा जारी: BRBNMPL ने द्विअक्षीय रूप से उन्मुख पॉलीप्रोपाइलीन (BOPP) आधारित अपारदर्शी पॉलिमर सब्सट्रेट की खरीद के लिए वैश्विक रुचि अभिव्यक्ति आमंत्रित की है। इसमें उन्नत सुरक्षा विशेषताओं से युक्त 68,000 रिम पॉलिमर सब्सट्रेट की खरीद शामिल है। इसका उपयोग BRBNMPL की अपनी प्रेस तथा भारतीय प्रतिभूति मुद्रण तथा मुद्रा निर्माण निगम लिमिटेड (SPMCIL) की प्रेस में बैंक नोटों की छपाई के लिए किया जाएगा।
  • यह केवल क्षेत्रीय परीक्षण है, नोटों का पूर्ण प्रचलन नहीं: यह खरीद केवल क्षेत्रीय परीक्षण के उद्देश्य से की जा रही है। परीक्षण के परिणामों के आधार पर RBI भविष्य में बड़े स्तर पर खरीद और चरणबद्ध तरीके से पॉलिमर नोटों को अपनाने पर विचार कर सकता है।
  • कम मूल्य वर्ग के नोटों से शुरुआत की संभावना: मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह परीक्षण संभवतः ₹10 और ₹20 के नोटों से शुरू किया जा सकता है। हालांकि, निविदा में किसी विशेष मूल्य वर्ग का उल्लेख नहीं किया गया है।
  • सख्त सुरक्षा शर्तें: निविदा में यह अनिवार्य किया गया है कि बोली लगाने वाली कंपनियाँ कच्चे माल की आपूर्ति चीन या पाकिस्तान से नहीं करेंगी। भारत के साथ स्थलीय सीमा साझा करने वाले देशों की संस्थाओं को निर्धारित सुरक्षा आवश्यकताओं का पालन करना होगा।
  • पहले के प्रस्ताव की पुनः पेशकश:  यह पहल भारत में पॉलिमर नोटों को शुरू करने के पुराने प्रयास को फिर से आगे बढ़ाती है। वर्ष 2012–13 में पॉलिमर नोटों के लिए एक परीक्षण परियोजना प्रस्तावित की गई थी, लेकिन मूल्यांकन के दौरान सामने आई तकनीकी चुनौतियों के कारण यह आगे नहीं बढ़ सकी।

पॉलिमर करेंसी नोट क्या हैं?

  • पॉलिमर मुद्रा नोट पारंपरिक 100% सूती कागज के स्थान पर द्विअक्षीय रूप से उन्मुख पॉलीप्रोपाइलीन (BOPP) नामक टिकाऊ प्लास्टिक-आधारित सामग्री पर मुद्रित किए जाते हैं।
  • इनमें निम्नलिखित उन्नत सुरक्षा विशेषताएँ होती हैं:
    • पारदर्शी विंडो
    • होलोग्राफिक या धात्विक तत्व
    • सूक्ष्म अक्षर एवं सूक्ष्म प्रकाशीय विशेषताएँ
    • इंद्रधनुषी पैटर्न
    • उन्नत सुरक्षा धागे
    • विश्व के पहले पॉलिमर करेंसी नोट वर्ष 1988 में ऑस्ट्रेलिया द्वारा जारी किए गए थे।
  • वर्तमान में इनका उपयोग 50 से अधिक देशों में किया जाता है, जिनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, न्यूज़ीलैंड, सिंगापुर, वियतनाम और मलेशिया शामिल हैं।

RBI इस प्रस्ताव को पुनः क्यों ला रहा है?

  • मुद्रा प्रतिस्थापन लागत में कमी: पॉलिमर नोट सामान्य कागज़ी नोटों की तुलना में 2.5 से 4 गुना अधिक समय तक चलते हैं, जिससे बार-बार नोट बदलने की आवश्यकता कम हो जाती है।
    • यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 2025–26 में RBI ने मुद्रा छपाई पर ₹4,875 करोड़ खर्च किए, जबकि स्वच्छ नोट नीति (Clean Note Policy) के तहत प्रतिवर्ष अरबों पुराने एवं गंदे नोट बदले जाते हैं।
  • जाली नोटों पर प्रभावी रोक: पॉलिमर नोटों में पारदर्शी विंडो, सूक्ष्म प्रकाशीय विशेषताएँ और होलोग्राफिक तत्व जैसी उन्नत सुरक्षा विशेषताएँ होती हैं, जिससे इनकी नक़ल करना काफी कठिन हो जाता है।
    • मजबूत सुरक्षा की आवश्यकता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2025–26 में लगभग 2.3 लाख जाली नोटों का पता चला, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक था।
  • अधिक टिकाऊ: पॉलिमर नोट नमी, गंदगी, फटने तथा सूक्ष्मजीवी संक्रमण के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं, जिससे वे भारत की विविध जलवायु परिस्थितियों तथा बार-बार उपयोग के लिए अधिक उपयुक्त हैं।
  • दीर्घकाल में कम लागत: यद्यपि इनकी प्रारंभिक उत्पादन लागत अधिक होती है, लेकिन इनका लंबा जीवनकाल नोटों को बार-बार बदलने की आवश्यकता कम करता है, जिससे दीर्घकाल में कुल लागत घट जाती है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव में कमी: नोटों का लंबा जीवनकाल मुद्रण, परिवहन और नष्ट करने की आवृत्ति को कम करता है।
    • उपयोग के बाद पॉलिमर नोटों का पुनर्चक्रण (Recycling) करके उन्हें अन्य प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण में भी उपयोग किया जा सकता है।

चुनौतियाँ / चिंताएँ

  • उच्च प्रारंभिक निवेश: पॉलिमर सब्सट्रेट तथा विशेष मुद्रण तकनीकें पारंपरिक कागज़-आधारित मुद्रा की तुलना में अधिक महंगी हैं।
  • अवसंरचना में अनुकूलन की आवश्यकता: एटीएम, नकदी छँटाई मशीनें, वेंडिंग मशीनें तथा अन्य नकदी प्रबंधन प्रणालियों को पॉलिमर नोटों के प्रभावी उपयोग के लिए पुनः समायोजित करना पड़ सकता है।
  • आयात पर निर्भरता एवं आपूर्ति संबंधी जोखिम: पॉलिमर नोटों के लिए पॉलीप्रोपाइलीन-आधारित सब्सट्रेट की आवश्यकता होती है, जिसके लिए भारत अभी भी आंशिक रूप से आयात पर निर्भर है।
    • जब तक पर्याप्त घरेलू विनिर्माण क्षमता विकसित नहीं हो जाती, तब तक मुद्रा उत्पादन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान तथा पेट्रो-रसायन कीमतों में उतार-चढ़ाव से प्रभावित हो सकता है।
  • पर्यावरणीय चिंताएँ: यद्यपि पॉलिमर नोटों का पुनर्चक्रण किया जा सकता है, फिर भी ये प्लास्टिक-आधारित होते हैं। इसलिए इनके पर्यावरण-अनुकूल निपटान के लिए संग्रहण एवं पुनर्चक्रण की मजबूत व्यवस्था आवश्यक है।
  • डिजिटल भुगतान के साथ सह-अस्तित्व: UPI जैसे डिजिटल भुगतान मंचों के तीव्र विस्तार के बीच बड़े पैमाने पर पॉलिमर मुद्रा में निवेश की दीर्घकालिक लागत-प्रभावशीलता को लेकर प्रश्न बने हुए हैं, हालांकि भारत की भुगतान प्रणाली में नकदी अभी भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

वैश्विक अनुभव एवं आगे की राह

  • जिन देशों ने पॉलिमर मुद्रा को अपनाया है, वहाँ सामान्यतः नोटों की अधिक टिकाऊ क्षमता, जाली नोटों के विरुद्ध बेहतर सुरक्षा तथा नोटों के पूरे जीवनकाल में कम प्रतिस्थापन लागत देखने को मिली है।
    • भारत के लिए वर्तमान क्षेत्रीय परीक्षण विविध जलवायु परिस्थितियों, मशीनों के साथ अनुकूलता, जनस्वीकृति तथा समग्र लागत-प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने का अवसर प्रदान करता है, ताकि व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले इसके परिणामों का आकलन किया जा सके।
    • साथ ही, पॉलिमर सब्सट्रेट और सुरक्षा विशेषताओं के घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने से आयात पर निर्भरता कम होगी तथा भारत की मुद्रा सुरक्षा व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ होगी।
    • अवसंरचना उन्नयन, प्रभावी पुनर्चक्रण व्यवस्था तथा जन-जागरूकता के सहयोग से चरणबद्ध एवं साक्ष्य-आधारित अपनाने की रणनीति भारत की मुद्रा प्रबंधन प्रणाली का आधुनिकीकरण कर सकती है तथा जाली नोटों के विरुद्ध इसकी क्षमता को और बढ़ा सकती है।

Source:
Indianexpress
Indianexpress
Thehindu
Britannica

Shares: