संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: वैधानिक, विनियामक एवं विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकाय; संघ और राज्यों के कार्य एवं उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ; स्थानीय स्तर तक शक्तियों एवं वित्त का हस्तांतरण तथा उससे संबंधित चुनौतियाँ।
संदर्भ: केंद्रीय गृह मंत्री ने 7 सितंबर 2026 को पणजी, गोवा में पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद की 28वीं बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में अंतर-राज्यीय समन्वय, विकास, जनकल्याण और आंतरिक सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की गई।
अन्य संबंधित जानकारी
- बैठक में गोवा, गुजरात और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव के प्रशासक तथा केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया।
- बैठक ने क्षेत्रीय परिषदों की बदलती भूमिका को रेखांकित किया। अब ये केवल अंतर-राज्यीय मुद्दों के समाधान के मंच नहीं, बल्कि कल्याण एवं विकास से जुड़े परिणामों की निगरानी के प्रभावी मंच के रूप में भी कार्य कर रही हैं। इनमें बाल कुपोषण, आधार कवरेज, आयुष्मान भारत कवरेज, PACS का कंप्यूटरीकरण, साइबर अपराध और तटीय सुरक्षा जैसे विषय शामिल हैं।
- गृह मंत्री ने पश्चिमी क्षेत्र को भारत की विकास यात्रा का “WEST इंजन” कहा, जहाँ W – वेल्थ एंड फाइनेंस, E – एक्सपोर्ट्स एंड पोर्ट्स, S –स्टार्ट-अप एवं सेमीकंडक्टर, T – टूरिज्म एंड ब्लू इकॉनमी, भारत की आर्थिक वृद्धि के प्रमुख आधार हैं।
क्षेत्रीय परिषदों को समझना
- उत्पत्ति एवं प्रकृति
- 1956 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राज्यों के बीच सहयोगात्मक कार्यप्रणाली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान क्षेत्रीय परिषदों के गठन का विचार प्रस्तुत किया।
- इसके बाद राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के भाग III के अंतर्गत पाँच क्षेत्रीय परिषदों की स्थापना की गई।
- ये वैधानिक एवं परामर्शदात्री निकाय हैं, जिनमें उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्रीय परिषदें शामिल हैं।
- उत्तर-पूर्वी परिषद (NEC) अलग से उत्तर-पूर्वी परिषद अधिनियम, 1971 के अंतर्गत कार्य करती है।
- संरचना
- केंद्रीय गृह मंत्री सभी पाँच क्षेत्रीय परिषदों के अध्यक्ष होते हैं, जबकि सदस्य राज्यों के मुख्यमंत्री एक वर्ष के लिए बारी-बारी से उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।
- प्रत्येक राज्य का प्रतिनिधित्व उसके मुख्यमंत्री और दो मंत्रियों द्वारा किया जाता है, जबकि केंद्रशासित प्रदेशों के दो प्रतिनिधि होते हैं।
- प्रत्येक परिषद में मुद्दों की प्रारंभिक जाँच/परीक्षण के लिए मुख्य सचिवों की एक स्थायी समिति भी होती है।
- गृह मंत्रालय के अंतर्गत अंतर-राज्यीय परिषद सचिवालय क्षेत्रीय परिषदों की बैठकों के आयोजन और समन्वय के लिए नोडल निकाय के रूप में कार्य करता है।
- क्षेत्रीय परिषदों के कार्य: राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अंतर्गत क्षेत्रीय परिषदें निम्नलिखित विषयों पर चर्चा करती हैं तथा सिफारिशें देती हैं:
- आर्थिक एवं सामाजिक नियोजन तथा साझा क्षेत्रीय हितों से जुड़े विषय;
- अंतर-राज्यीय मुद्दे, जिनमें सीमा विवाद, भाषाई अल्पसंख्यक और अंतर-राज्यीय परिवहन शामिल हैं;
- राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित विषय; तथा
- सदस्य राज्यों के बीच समन्वय एवं सहयोग को बढ़ावा देने के लिए उन्हें संदर्भित किए गए अन्य विषय।

भारतीय संघवाद में क्षेत्रीय परिषदों का महत्त्व
- संस्थागत संवाद एवं सहमति निर्माण: क्षेत्रीय परिषदें केंद्र–राज्य तथा अंतर-राज्यीय परामर्श के लिए एक नियमित मंच प्रदान करती हैं। इससे क्षेत्रीय मुद्दों का समाधान टकरावपूर्ण तंत्रों के बजाय संवाद और सहमति के माध्यम से करने में सहायता मिलती है।
- नीति समन्वय एवं सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान: ये राष्ट्रीय कार्यक्रमों के समन्वित क्रियान्वयन, राज्यों के बीच नीतिगत अभिसरण तथा प्रभावी सुशासन की सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान को बढ़ावा देती हैं।
- क्षेत्रीय विकास एवं सुरक्षा: क्षेत्रीय परिषदें वामपंथी उग्रवाद (LWE), साइबर अपराध, आपदा प्रबंधन, बुनियादी ढाँचे की कमी और क्षेत्रीय असमानताओं जैसी साझा चुनौतियों से निपटने के लिए राज्यों के बीच समन्वित कार्रवाई को सक्षम बनाती हैं।
- राष्ट्रीय एकीकरण एवं सहकारी शासन: नियमित राजनीतिक और प्रशासनिक संवाद राष्ट्रीय एकीकरण को मजबूत करता है। साथ ही, कल्याण एवं विकास संबंधी परिणामों की निगरानी पर बढ़ता जोर क्षेत्रीय परिषदों की भूमिका को केवल चर्चा और विवाद-समाधान के मंचों तक सीमित न रखकर अधिक क्रियाशील सहकारी शासन के मंचों के रूप में विस्तारित कर रहा है।
