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सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान और प्रौद्योगिकी — विकास और अनुप्रयोग तथा रोजमर्रा के जीवन पर उनके प्रभाव; अंतरिक्ष के क्षेत्र में जागरूकता।

संदर्भ: नासा ने बेंगलुरु में आयोजित भारत-अमेरिका नागरिक अंतरिक्ष संयुक्त कार्य समूह की नौवीं बैठक के दौरान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को अपने मून बेस प्रोग्राम में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है। इससे चंद्र अन्वेषण और मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग और बढ़ेगा।

मून बेस प्रोग्राम के बारे में

  • नासा के मून बेस प्रोग्राम का उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट मनुष्यों की निरंतर उपस्थिति स्थापित करना है, जहाँ अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक रहेंगे, कार्य करेंगे और वैज्ञानिक गतिविधियाँ संचालित करेंगे।
  • इस कार्यक्रम की घोषणा 24 मार्च 2026 को आयोजित नासा के ‘इग्निशन’ कार्यक्रम के दौरान अंतरिक्ष क्षेत्र में अमेरिकी नेतृत्व को आगे बढ़ाने की पहलों के हिस्से के रूप में की गई थी।
  • इसे तीन चरणों के माध्यम से विकसित किया जा रहा है:
  • चरण 1 (वर्तमान–2029): प्रयोग और सीखना चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पर्यावरण को समझने तथा चंद्र सतह तक विश्वसनीय पहुँच स्थापित करने के लिए रोबोटिक मिशन, प्रौद्योगिकी प्रदर्शन और अन्वेषण किए जाएंगे।
  • चरण 2 (2029–2032): प्रारंभिक आवास — ऊर्जा, संचार, आवागमन और आवास संबंधी बुनियादी ढाँचे स्थापित किए जाएंगे तथा चंद्र सतह पर प्रारंभिक संचालन शुरू किया जाएगा।
  • चरण 3 (2032 से आगे): निरंतर मानव उपस्थिति — अर्ध-स्थायी आवास, उन्नत ऊर्जा एवं रसद प्रणालियाँ विकसित की जाएंगी तथा चंद्रमा पर लंबे समय तक मानव संचालन के लिए नियमित रूप से अंतरिक्ष यात्रियों की टीमों का आवागमन किया जाएगा।
  • चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव इस कार्यक्रम का प्रमुख केंद्र है क्योंकि माना जाता है कि वहाँ के स्थायी रूप से छायायुक्त क्षेत्रों में जल-बर्फ मौजूद है। इसके अलावा, यह क्षेत्र वैज्ञानिक अनुसंधान तथा भविष्य के गहन अंतरिक्ष अभियानों के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों के परीक्षण के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
  • नासा का उद्देश्य सरकारी क्षमताओं, वाणिज्यिक कंपनियों और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों को एक साथ लाकर चंद्रमा पर लंबे समय तक संचालन के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा विकसित करना है।

नासा, भारत को इस प्रोग्राम का हिस्सा क्यों बनाना चाहता है?

  • आर्टेमिस समझौतों पर आधारित सहयोग: भारत की भागीदारी आर्टेमिस समझौतों पर आधारित है, जिन पर भारत ने 2023 में 27वें हस्ताक्षरकर्ता देश के रूप में हस्ताक्षर किए थे। ये समझौते शांतिपूर्ण, सतत और जिम्मेदार अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए सिद्धांत निर्धारित करते हैं।
  • भारत-अमेरिका के बीच मौजूदा अंतरिक्ष सहयोग: नासा और इसरो ने पहले ही नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार (निसार) मिशन तथा मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सहयोग विकसित किया है। इसमें भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए एक्सिओम-4 मिशन में भागीदारी भी शामिल है।
  • नवीनतम बैठक में आर्टेमिस समझौतों के तहत खुले वैज्ञानिक आँकड़ों के आदान-प्रदान पर चर्चा को आगे बढ़ाने तथा भविष्य में विज्ञान और मानव अंतरिक्ष उड़ान प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में सहयोग करने पर भी सहमति बनी\
  • भारत की चंद्र क्षमताएँ: भारत ने चंद्रयान कार्यक्रम के माध्यम से चंद्र अन्वेषण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण क्षमताओं का प्रदर्शन किया है। विशेष रूप से,चंद्रयान-3 ने 2023 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग की।
  • पूरक अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाएँ: भारत स्वयं भी मानव अंतरिक्ष उड़ान और चंद्र अन्वेषण के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है, जिसमें गगनयान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और2040 तक प्रस्तावित मानवयुक्त चंद्र मिशन शामिल हैं।
  • इस प्रकार, कार्यक्रम में भारत को शामिल करने से इसरो की चंद्र अन्वेषण विशेषज्ञता और तकनीकी क्षमताओं को नासा की व्यापक चंद्र अन्वेषण संरचना तथा अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के ढाँचे के साथ जोड़ा जा सकेगा।

मून बेस प्रोग्राम का महत्व

  • निरंतर मानव उपस्थिति स्थापित करना: इस कार्यक्रम का उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट मनुष्यों की निरंतर उपस्थिति स्थापित करना है, जहाँ अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक रहेंगे, कार्य करेंगे और वैज्ञानिक गतिविधियाँ संचालित करेंगे।
  • चंद्र विज्ञान को आगे बढ़ाना: चंद्रमा पर लंबे समय तक मानव उपस्थिति से उसकी भूगर्भीय संरचना, संसाधनों और पर्यावरण का दीर्घकालिक अध्ययन संभव होगा। इससे चंद्रमा तथा सौरमंडल के प्रारंभिक इतिहास को समझने में भी सहायता मिलेगी।
  • चंद्र संसाधनों का उपयोग: चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का अन्वेषण स्थायी रूप से छायायुक्त क्षेत्रों में उपलब्ध जल-बर्फ जैसे संसाधनों के अध्ययन और उनके संभावित उपयोग में सहायता कर सकता है।
  • अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों का विकास: यह कार्यक्रम रोबोटिक्स, स्वायत्त प्रणालियों, चंद्र सतह पर आवागमन, संचार, ऊर्जा उत्पादन और आवास प्रणालियों में प्रगति को बढ़ावा दे सकता है, जो लंबे समय तक चंद्रमा पर संचालन के लिए आवश्यक हैं।
  • गहन अंतरिक्ष अन्वेषण की तैयारी: चंद्रमा पर विकसित की जाने वाली प्रौद्योगिकियाँ और परिचालन अनुभव भविष्य के मंगल मिशनों तथा अन्य गहन अंतरिक्ष अन्वेषण अभियानों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में काम कर सकते हैं।
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