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सामान्य अध्ययन-2: सांविधिक, विनियामक एवं विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकाय; केंद्र एवं राज्यों के कार्य एवं उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ। 

संदर्भ: 20 अगस्त 2026 को तमिलनाडु के महाबलीपुरम में केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह की अध्यक्षता में दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद (SZC) की 31वीं बैठक आयोजित की जा रही है।

क्षेत्रीय परिषद के बारे में

• क्षेत्रीय परिषदें राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित वैधानिक सलाहकारी निकाय हैं।

• क्षेत्रीय परिषदों के गठन का विचार पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट पर बहस के दौरान प्रस्तुत किया था।

• इनका गठन निम्नलिखित को बढ़ावा देने के लिए किया गया था:

  • राज्यों के बीच सहयोगात्मक कार्यप्रणाली,      
  • राष्ट्रीय एकीकरण,
  • केंद्र-राज्य एवं अंतर-राज्यीय सहयोग,
  • तथा संवाद एवं परामर्श के माध्यम से अंतर-राज्यीय मुद्दों का समाधान।

• भारत में पाँच क्षेत्रीय परिषदें हैं — उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी — जबकि उत्तर पूर्वी परिषद एक अलग वैधानिक ढाँचे के तहत स्वतंत्र रूप से कार्य करती है।

  • उत्तर पूर्वी परिषद की स्थापना उत्तर पूर्वी परिषद अधिनियम, 1972 के तहत की गई थी।
  • इसके सदस्य राज्यों में असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड और सिक्किम शामिल हैं।
  • उत्तर पूर्वी परिषद (संशोधन) अधिनियम, 2002 के माध्यम से सिक्किम को शामिल किया गया।

• केंद्रीय गृह मंत्री सभी क्षेत्रीय परिषदों के अध्यक्ष होते हैं, जबकि सदस्य राज्यों के मुख्यमंत्री और दो अन्य मंत्री परिषद के सदस्य होते हैं।

  • केंद्र शासित प्रदेशों के मामले में, संबंधित क्षेत्र के केंद्र शासित प्रदेशों से दो सदस्यों को शामिल किया जाता है।
  • सदस्य राज्यों के मुख्यमंत्री बारी-बारी से उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं तथा प्रत्येक मुख्यमंत्री एक वर्ष की अवधि के लिए इस पद पर बना रहता है।

• प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद में सदस्य राज्यों के मुख्य सचिवों की एक स्थायी समिति होती है, जो मुद्दों पर प्रारंभिक विचार-विमर्श करती है और क्षेत्रीय परिषद की बैठकों के लिए आवश्यक तैयारी का कार्य करती है।

• गृह मंत्रालय के अंतर्गत अंतर-राज्यीय परिषद सचिवालय क्षेत्रीय परिषदों की बैठकों का आयोजन करता है।

कार्य

• प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद एक सलाहकारी निकाय है और उन विषयों पर चर्चा कर सकती है जिनमें सदस्य राज्यों या केंद्र तथा एक या अधिक सदस्य राज्यों का साझा हित हो।

• यह निम्नलिखित विषयों के संबंध में सिफारिशें कर सकती है:

  • आर्थिक एवं सामाजिक नियोजन में साझा हित के विषय;
  • सीमा विवाद, भाषाई अल्पसंख्यक और अंतर-राज्यीय परिवहन;
  • राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित या उससे उत्पन्न होने वाले विषय।

• परिषदें चर्चा एवं परामर्श के माध्यम से केंद्र-राज्य तथा अंतर-राज्यीय मुद्दों एवं विवादों के समाधान के लिए एक मंच भी प्रदान करती हैं।

दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद के बारे में

• दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद में शामिल हैं:

  • राज्य: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना
  • केंद्र शासित प्रदेश: पुडुचेरी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप

• केंद्रीय गृह मंत्री दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद के अध्यक्ष होते हैं, जबकि किसी सदस्य राज्य के मुख्यमंत्री बारी-बारी से उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।

• 31वीं बैठक में क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय महत्व के साझा मुद्दों पर चर्चा की गई, जिनमें बुनियादी ढाँचे का विकास, जल संसाधनों का बंटवारा, आर्थिक विकास, औद्योगिक निवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सूचना प्रौद्योगिकी, आपदा प्रबंधन, अपराध की रोकथाम और अंतर-राज्यीय मामले शामिल थे।

• आंध्र प्रदेश द्वारा आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम से संबंधित मुद्दे भी उठाए गए, जिनमें संस्थानों, परिसंपत्तियों और देनदारियों का विभाजन तथा लंबित वित्तीय मामले शामिल थे।

क्षेत्रीय परिषदों का महत्व

• सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना: ये केंद्र-राज्य एवं अंतर-राज्यीय संवाद के लिए एक संस्थागत तंत्र प्रदान करती हैं।

• अंतर-राज्यीय मुद्दों का समाधान: ये जल, परिवहन, सीमाओं और विकास परियोजनाओं से जुड़े विवादों पर चर्चा एवं सहमति निर्माण की सुविधा प्रदान करती हैं।

• क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना: आर्थिक, राजनीतिक एवं भौगोलिक संबंध रखने वाले राज्य साझा क्षेत्रीय चुनौतियों का सामूहिक रूप से समाधान कर सकते हैं।

• राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देना: राज्यों के पुनर्गठन के बाद उत्पन्न क्षेत्रवाद, भाषावाद और स्थानीयतावादी प्रवृत्तियों से निपटना भी क्षेत्रीय परिषदों के गठन के उद्देश्यों में शामिल था।

• टीम भारत को मजबूत करना: परिषदें सहकारी संघवाद के व्यापक उद्देश्य में योगदान देती हैं, जो इस सिद्धांत पर आधारित है कि मजबूत राज्य एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण करते हैं।

• सलाहकारी तंत्र: यद्यपि इनकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होती हैं, फिर भी उच्च-स्तरीय विचार-विमर्श स्वतंत्र एवं स्पष्ट चर्चा तथा सहमति निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।

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