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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: नीति आयोग ने ‘ट्रेड वॉच क्वार्टरली’ (चौथी तिमाही वित्त वर्ष 2025–26) का 8वाँ संस्करण जारी किया है, जिसमें भारत के लचीले व्यापारिक प्रदर्शन पर प्रकाश डाला गया है और भारत के दवा (फार्मास्यूटिकल) क्षेत्र को सुदृढ़ करने में अवसरों व चुनौतियों का परीक्षण किया गया है।
ट्रेड वॉच क्वार्टरली के बारे में
• ‘ट्रेड वॉच क्वार्टरली’ नीति आयोग का एक प्रमुख प्रकाशन है, जो वैश्विक और घरेलू व्यापार रुझानों का डेटा-आधारित मूल्यांकन प्रदान करता है।
• संस्करण: चौथी तिमाही (जनवरी–मार्च 2026), वित्त वर्ष 2025–26.
• यह भारत के माल और सेवा व्यापार प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है और प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार के लिए नीतिगत सिफारिशें प्रदान करता है।
• इस संस्करण का विषयगत फोकस भारत का दवा और सक्रिय दवा सामग्री (API) व्यापार है, जिसमें निर्यात के अवसरों, प्रतिस्पर्धात्मकता, आपूर्ति-श्रृंखला की कमजोरियों और भविष्य की विकास संभावनाओं का आकलन किया गया है।
प्रमुख निष्कर्ष
• भारत का समग्र व्यापार प्रदर्शन: वित्त वर्ष 2025–26 में भारत का कुल माल और सेवा व्यापार 5.4% (YoY) बढ़कर $1.84 ट्रिलियन तक पहुँच गया।
- निर्यात में 4.2% की वृद्धि हुई, जबकि आयात 6.5% बढ़ा।
- वित्त वर्ष 2025–26 की चौथी तिमाही में माल निर्यात में 2.8% की गिरावट आई, जबकि आयात में 11.9% की वृद्धि हुई।
- सेवा निर्यात एक प्रमुख शक्ति बना रहा, जिसमें 9% की वृद्धि दर्ज की गई, जो सेवा आयात की 4.1% की वृद्धि दर से काफी अधिक है।
• सेवा व्यापार का बढ़ता महत्व: भारत 2025 में विश्व का 8वाँ सबसे बड़ा सेवा निर्यातक बना रहा।
- सेवा निर्यात ने 10.3% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) (2015–2025) दर्ज की, जो 6.6% की वैश्विक औसत से अधिक है।
- वैश्विक सेवा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी बढ़कर 4.3% हो गई।
- सॉफ्टवेयर सेवा निर्यात में बिज़नेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) और सपोर्ट सर्विसेज की हिस्सेदारी 63.5% रही।
- भारत के सेवा निर्यात में यूरोप की हिस्सेदारी बढ़कर 33% हो गई, जो व्यापक बाजार विविधीकरण को दर्शाता है।
• वैश्विक दवा बाजार के अवसर: 2025 में वैश्विक दवा और सक्रिय दवा सामग्री (API) की मांग लगभग $1.3 ट्रिलियन तक पहुँच गई।
- इसमें फॉर्मुलेशन (दवाइयों) का हिस्सा $961.8 बिलियन (75%) था, जबकि API का हिस्सा $261.2 बिलियन रहा।
- भारत ने $35.8 बिलियन मूल्य के फार्मास्यूटिकल और API उत्पादों का निर्यात किया, लेकिन वैश्विक निर्यात में इसकी हिस्सेदारी केवल 2.8% रही, जो महत्वपूर्ण विस्तार की संभावना को दर्शाता है।
• भारतीय फार्मास्यूटिकल क्षेत्र की क्षमता: यह भारत के GDP में 1.7% से अधिक और विनिर्माण GVA में 7.2% योगदान देता है।
- यह लगभग 27 लाख लोगों की आजीविका का समर्थन करता है।
- भारत जेनेरिक दवाओं, टीकों और आवश्यक औषधियों के दुनिया के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ताओं में से एक है।
- खुदरा औषधियाँ और जेनेरिक दवाएं (HS 3004) भारत का सबसे मजबूत निर्यात खंड बनी हुई हैं, जिसका निर्यात $22.6 बिलियन रहा और वैश्विक मांग में इसकी 4% हिस्सेदारी है।
• अग्रणी फार्मास्यूटिकल राज्य:
| राज्य | मुख्य विशेषता |
| तेलंगाना | वैक्सीन एंड लाइफ साइंसेज हब |
| गुजरात | मजबूत रासायनिक-फार्मास्यूटिकल विनिर्माण और निर्यात |
| महाराष्ट्र | मजबूत अनुसंधान और विकास क्षमताओं के साथ वृहत स्तरीय विनिर्माण |
उभरती चुनौतियाँ
• उच्च-मूल्य खंडों में सीमित उपस्थिति: भारत की जैविक दवाओं (biologics), बायोसिमिलर (biosimilars), इम्यूनोलॉजिकल और उन्नत चिकित्सा जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में हिस्सेदारी सीमित है। रक्त उत्पादों, टीकों और इम्यूनोलॉजिकल का निर्यात केवल $2.2 बिलियन (वैश्विक मांग का 0.6%) है।
• चीन पर निर्भरता: सक्रिय दवा सामग्री (APIs), प्रमुख शुरुआती सामग्रियों (KSMs) और इंटरमीडिएट्स के लिए भारत अत्यधिक चीन पर निर्भर है, जहाँ शीर्ष पाँच API आयात श्रेणियों में चीन की आपूर्ति 66–86% है।
• कम अनुसंधान और विकास (R&D) गहनता: 2013 में 440 पेटेंट आवेदनों के मुकाबले 2023 में इनके बढ़कर 3,576 होने के बावजूद, भारतीय दवा कंपनियां वैश्विक स्तर पर 15–20% की तुलना में अपनी बिक्री का केवल ~7% ही अनुसंधान और विकास पर खर्च करती हैं।
• बाजार पहुँच संबंधी बाधाएं: भारतीय निर्यातकों को लंबी पंजीकरण प्रक्रिया, दोहरावपूर्ण निरीक्षण, कठोर दस्तावेज़ीकरण मानक, सीमित नियामक मान्यता और बढ़ते पर्यावरणीय अनुपालन मानदंडों जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
सिफारिशें
• दवा मूल्य श्रृंखला में आगे की ओर बढ़ना: कम लागत वाली जेनेरिक दवाओं से हटकर बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर, उन्नत चिकित्सा और नवाचार-संचालित दवा उत्पादों की ओर रुख करना।
• अनुसंधान, विकास और नवाचार को बढ़ाना: अनुसंधान और विकास में निवेश का विस्तार करना, उद्योग-अकादमिक सहयोग को सुदृढ़ करना और अनुसंधान तथा दवा स्टार्टअप्स के व्यावसायीकरण को बढ़ावा देना।
• पेटेंट और नियामक प्रणालियों में सुधार: नियामक पारदर्शिता में सुधार करना, समयबद्ध पेटेंट विरोध और अनुदान प्रक्रियाएं शुरू करना, तथा बौद्धिक संपदा (IP) की निश्चितता को बढ़ाना।
• घरेलू सक्रिय दवा सामग्री (API) इकोसिस्टम को सुदृढ़ करना: सक्रिय दवा सामग्री, प्रमुख शुरुआती सामग्रियों और जैव प्रौद्योगिकी इनपुट के घरेलू उत्पादन का विस्तार करना, साथ ही विविध स्रोतों के माध्यम से चीनी आयात पर निर्भरता कम करना।
• मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के माध्यम से बाजार पहुँच में सुधार: भविष्य के मुक्त व्यापार समझौतों में दवा संबंधी प्रावधान शामिल करना, जिसमें नियामक निर्भरता, अच्छी विनिर्माण प्रथाओं (GMP) का निरीक्षण सहयोग, उत्पाद पंजीकरण, मानकों का सामंजस्य और विवाद-समाधान तंत्र शामिल हों।
• सतत विनिर्माण को बढ़ावा देना: पर्यावरणीय अनुपालन लागत को कम करने के लिए सामान्य अपशिष्ट उपचार सुविधाओं, शून्य तरल निर्वहन प्रणालियों और विलायक रिकवरी बुनियादी ढांचे के साथ बल्क ड्रग पार्कों का विस्तार करना।
• विश्वस्तरीय नवाचार क्लस्टर बनाना: प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, पेटेंट व्यावसायीकरण और उन्नत विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ावा देने के लिए एकीकृत जीवन-विज्ञान इकोसिस्टम और दवा क्लस्टरों का विकास करना।
