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सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान—संवैधानिक संशोधन, महत्त्वपूर्ण उपबंध; संघीय ढाँचे, शक्तियों एवं वित्त के स्थानीय स्तर तक विकेंद्रीकरण तथा उनसे संबंधित चुनौतियाँ।
संदर्भ: एक राष्ट्र, एक चुनाव (One Nation, One Election–ONOE) प्रस्ताव की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए संसद के शीतकालीन सत्र के अंत तक का समय-विस्तार दिया गया है।
अन्य संबंधित जानकारी
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के एक साथ चुनाव कराने से संबंधित संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024 और संघ राज्य-क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2024 की समीक्षा के लिए बनाई गई 41 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के कार्यकाल को आगे बढ़ा दिया गया है। अब यह समिति शीतकालीन सत्र 2026 के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए समीक्षा कार्य जारी रखेगी।
- पी. पी. चौधरी की अध्यक्षता वाली यह समिति, वर्ष 2029 तक लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव पर देशव्यापी स्तर पर परामर्श और चर्चा कर रही है।
- ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (ONOE) की अवधारणा पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की उन सिफारिशों पर आधारित है, जिन्हें वर्ष 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई थी।
एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) के बारे में
- ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (ONOE) से अभिप्राय लोकसभा और देश की सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ संपन्न कराने तथा तत्पश्चात स्थानीय निकायों के चुनावों को भी एक निश्चित समयावधि या चक्र के अंतर्गत समन्वित रूप से आयोजित करने की व्यवस्था से है।
- वर्तमान समय में भारत के विभिन्न विधानमंडलों के कार्यकाल में भिन्नता के कारण चुनाव अलग-अलग समय पर आयोजित किए जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप देश में वर्षभर कोई न कोई चुनाव प्रक्रिया चलती रहती है।
- देश में वर्ष 1951–52 से लेकर 1967 तक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ संपन्न कराए जाते थे। किंतु, बाद के वर्षों में राज्य विधानसभाओं के समयपूर्व विघटन, संविधान के अनुच्छेद 356 के बार-बार उपयोग तथा राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह समेकित चुनावी चक्र खंडित हो गया।

कार्यान्वयन की प्रमुख चुनौतियाँ
- संवैधानिक संशोधन: ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (ONOE) को लागू करने हेतु संविधान के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों के अलावा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में भी आवश्यक संशोधन करने पड़ेंगे, जिसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव संचालित होते हैं।
- लॉजिस्टिक आवश्यकताएँ: एक साथ चुनाव संपन्न कराने के उद्देश्य से बहुत बड़ी मात्रा में अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और वीवीपैट (VVPAT) मशीनों की व्यवस्था करनी होगी, जिनकी जीवन अवधि लगभग 15 वर्ष होने के कारण इन्हें समय-समय पर बदलना भी आवश्यक होता है।
- सरकार की स्थिरता: यदि किसी कारणवश किसी सदन या विधानमंडल का समय से पहले विघटन हो जाए अथवा वर्तमान सरकार अपना बहुमत खो बैठे, तो ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक जवाबदेही को सुनिश्चित करते हुए समन्वित चुनावी चक्र को बरकरार रखना एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती है।
- चुनावी व्यय पर प्रभाव: यद्यपि ONOE व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य चुनावी खर्चों में कमी लाना है, तथापि इसे चुनावों में काले धन के प्रचलन और उसके प्रभाव को रोकने का पूर्ण समाधान नहीं माना जाता है।
आगे की राह
- सर्वसम्मति आधारित कार्यान्वयन: ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (ONOE) को क्रमिक और चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए। इसके लिए सभी प्रमुख राजनीतिक दलों, राज्य सरकारों और संवैधानिक संस्थाओं के बीच व्यापक विचार-विमर्श अनिवार्य है, जिससे देश का संघीय संतुलन और लोकतांत्रिक जवाबदेही सुरक्षित रह सके।
- पूरक चुनावी सुधार: एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया के साथ-साथ राजनीतिक वित्तपोषण में अधिक पारदर्शिता लाने, राजनीतिक दलों के संगठनात्मक ढांचे में आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने, तथा चुनावों के आंशिक राज्य वित्तपोषण जैसे अन्य आवश्यक सुधारों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
- पारदर्शिता एवं जवाबदेही को सुदृढ़ करना: राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के दायरे के अंतर्गत लाने से संपूर्ण चुनावी प्रणाली में पारदर्शिता, आम जनमानस का विश्वास तथा जवाबदेही की भावना को और अधिक सुदृढ़ किया जा सकता है।
