शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की 150वीं जयंती
संदर्भ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 सितंबर 2026 को बंगाली लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की 150वीं जयंती के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के बारे में

- जन्म: शरतचंद्र चट्टोपाध्याय (1876–1938) का जन्म 15 सितंबर 1876 को बंगाल के हुगली जिले के देवानंदपुर में हुआ था। वे प्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकार और कहानीकार थे।
- साहित्यिक विषय: उनकी रचनाओं में 19वीं सदी के भारत, विशेष रूप से ग्रामीण बंगाली समाज का संवेदनशील चित्रण मिलता है। उन्होंने सामाजिक असमानताओं, तत्कालीन सामाजिक प्रथाओं तथा महिलाओं के जीवन से जुड़े विषयों को प्रमुखता से प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं का भारत की सभी भाषाओं तथा कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया।
- बर्मा से संबंध: वे 1903 में रंगून (वर्तमान यांगून) चले गए, जहाँ उन्होंने सरकारी सेवा तथा बाद में बर्मा रेलवे में कार्य किया। लगभग 13 वर्ष बर्मा में रहने के बाद 1916 में बंगाल लौट आए।
- साहित्यिक रचनाएँ: उन्होंने 30 से अधिक उपन्यास, उपन्यासिकाएँ और कहानियाँ लिखीं। उनकी अनेक रचनाओं का व्यापक स्तर पर विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ और उन पर फिल्में भी बनाई गईं।
साहित्यिक एवं राष्ट्रवादी योगदान
- प्रमुख रचनाएँ: देवदास, परिणीता, चरित्रहीन, निष्कृति, श्रीकांत, बिराज बहू, पथेर दाबी, गृहदाह और शेष प्रश्न उनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं।
- पथेर दाबी (1926): यह एक राजनीतिक उपन्यास है, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी प्रतिरोध पर केंद्रित है। ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने इसकी ब्रिटिश-विरोधी विषयवस्तु के कारण इस पर प्रतिबंध लगा दिया था।
- स्वतंत्रता आंदोलन: उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया और 1921 से 1936 तक हावड़ा जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उनकी रचनाओं में राष्ट्रवाद और सामाजिक सुधार के विषय भी दिखाई देते हैं।
- सम्मान: उन्हें 1923 में कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा जगत्तारिणी स्वर्ण पदक तथा 1936 में ढाका विश्वविद्यालय द्वारा मानद डी.लिट. की उपाधि प्रदान की गई। उनका निधन 16 जनवरी 1938 को कलकत्ता में हुआ।
32वाँ विश्व ओजोन दिवस
संदर्भ: 32वाँ विश्व ओजोन दिवस (ओजोन परत के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस) 16 सितंबर 2026 को “शीतल ग्रह के लिए वैश्विक कार्रवाई” विषय के साथ मनाया गया।
विश्व ओजोन दिवस और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
- संयुक्त राष्ट्र महासभा, 1994: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 49/114 के माध्यम से 16 सितंबर को ओजोन परत के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित किया। यह दिवस 16 सितंबर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए जाने की स्मृति में मनाया जाता है। इसका आयोजन 1995 से शुरू हुआ।
- वियना कन्वेंशन, 1985: इसने ओजोन परत के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का ढाँचा स्थापित किया। इसके बाद 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अपनाया गया, जिसके तहत ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS), जिनमें क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हैलोन और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) शामिल हैं, को नियंत्रित किया जाता है और चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाता है।
- सार्वभौमिक भागीदारी: 2009 में वियना कन्वेंशन और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सार्वभौमिक अनुसमर्थन प्राप्त करने वाली पहली संधियाँ बनीं। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण प्रशीतन और वातानुकूलन उपकरणों जैसे उत्पादों में उपयोग किए जाने वाले लगभग 99% ओजोन-क्षयकारी रसायनों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा चुका है।
- भारत: भारत मार्च 1991 में वियना कन्वेंशन और जून 1992 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का पक्षकार बना तथा उसने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा किया है।
किगाली संशोधन और भारत
- किगाली संशोधन, 2016: इसके तहत हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) की वैश्विक स्तर पर चरणबद्ध समाप्ति की व्यवस्था की गई। HFCs ओजोन परत को क्षति नहीं पहुँचाते, लेकिन ये शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं और इनका व्यापक उपयोग प्रशीतन तथा वातानुकूलन में किया जाता है। इसके पूर्ण कार्यान्वयन से सदी के अंत तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 0.5°C तक कम करने में मदद मिल सकती है।
- भारत ने सितंबर 2021 में किगाली संशोधन का अनुसमर्थन किया, जो भारत के लिए 26 दिसंबर 2021 को प्रभावी हुआ।
- भारत 2032 से चार चरणों में HFCs के उत्पादन और खपत में कमी करेगा। सहमत आधार-वर्ष के मुकाबले 2032 में 10%, 2037 में 20%, 2042 में 30% और 2047 में 85% की कमी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
- भारत पहले ही 2015, 2020 और 2025 के HCFC चरणबद्ध समाप्ति लक्ष्यों को प्राप्त कर चुका है।
- 2026 की पहल: विश्व ओजोन दिवस के अवसर पर भारत ने नेट-जीरो पोर्टल और राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) डैशबोर्ड का शुभारंभ किया। इनका उद्देश्य जलवायु प्रतिबद्धताओं, उत्सर्जन और प्रगति पर निगरानी रखना तथा कम-कार्बन भविष्य की दिशा में प्रगति को ट्रैक करना है।
भारत का 51वाँ डॉप्लर मौसम रडार
संदर्भ: भारत के 51वें डॉप्लर मौसम रडार (DWR) का हाल ही में संबलपुर, ओडिशा में उद्घाटन किया गया। इससे पश्चिमी ओडिशा और आसपास के क्षेत्रों में मौसम अवलोकन, पूर्वानुमान तथा पूर्व-चेतावनी क्षमताओं को मजबूत किया गया है।
डॉप्लर मौसम रडार: कार्यप्रणाली और अनुप्रयोग
- डॉप्लर मौसम रडार (DWR) एक रिमोट सेंसिंग प्रणाली है, जो वायुमंडलीय कणों, जैसे वर्षा की बूंदों, बर्फ और ओलों की गति तथा वेग को मापने के लिए डॉप्लर प्रभाव का उपयोग करती है। यह विद्युतचुंबकीय स्पंदों को प्रसारित करता है और वर्षण कणों से परावर्तित संकेतों का विश्लेषण करता है।
- संकेत की वापसी का समय वर्षण की दूरी को दर्शाता है, जबकि डॉप्लर आवृत्ति विस्थापन वर्षण कणों की गति और वेग से संबंधित जानकारी प्रदान करता है।
- पारंपरिक मौसम रडार की तुलना में DWR परावर्तनीयता के साथ-साथ वेग और स्पेक्ट्रल-चौड़ाई से संबंधित जानकारी प्रदान करता है, जिससे गतिशील मौसम प्रणालियों और गंभीर मौसम की बेहतर निगरानी संभव होती है।
- DWR से प्राप्त अवलोकन आंधी-तूफान, भारी वर्षा तथा अन्य गंभीर मौसम संबंधी घटनाओं के तात्कालिक पूर्वानुमान और अल्पकालिक पूर्वानुमान में सहायक होते हैं। ये चक्रवात निगरानी, आपदा प्रबंधन, कृषि, विमानन तथा जल संसाधन प्रबंधन में भी उपयोगी हैं।
- द्विध्रुवण तकनीक से युक्त आधुनिक DWR क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर दोनों दिशाओं में संकेत प्रसारित कर सकते हैं। इससे वर्षण की विशेषताओं की पहचान, वर्षा के अनुमान में सुधार तथा गंभीर मौसम की घटनाओं का बेहतर पता लगाने में मदद मिलती है।
भारत में DWR नेटवर्क का विस्तार
- संबलपुर में स्थापना के साथ ओडिशा में अब तीन DWR हो गए हैं—गोपालपुर, पारादीप और संबलपुर। नया रडार पश्चिमी ओडिशा में मौसम संबंधी अवलोकनों को बेहतर बनाएगा तथा दक्षिणी झारखंड, उत्तरी छत्तीसगढ़ और उत्तर आंध्र प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों के लिए मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध कराएगा।
- भारत का DWR नेटवर्क 2014 में 14 रडार से बढ़कर 2026 में 51 रडार हो गया है। मिशन मौसम के तहत लगभग 40 अतिरिक्त रडार स्थापित किए जाने की योजना है।
- रडार नेटवर्क के विस्तार के साथ-साथ बहु-स्तरीय अवलोकन नेटवर्क भी विकसित किया जा रहा है, जिसमें स्वचालित मौसम स्टेशन, वर्षामापी, रेडियोसोंडे स्टेशन और माइक्रोवेव रेडियोमीटर शामिल हैं। इसका उद्देश्य स्थानीय मौसम संबंधी अवलोकनों में सुधार करना और अधिक स्थानीयकृत मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराना है।
- मिशन मौसम, जिसे सितंबर 2024 में दो वर्षों के लिए ₹2,000 करोड़ के परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई थी, उन्नत अवलोकन प्रणालियों, अगली पीढ़ी के रडार और उपग्रहों, उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग, बेहतर मॉडलों तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता/मशीन लर्निंग (AI/ML) आधारित विधियों के माध्यम से भारत को “मौसम के लिए तैयार” (Weather Ready) और “जलवायु के प्रति स्मार्ट” (Climate Smart) बनाने का लक्ष्य रखता है।
राष्ट्रीय अभियंता दिवस 2026
संदर्भ: राष्ट्रीय अभियंता दिवस 15 सितंबर 2026 को भारत रत्न सर एम. विश्वेश्वरैया की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया गया।
एम. विश्वेश्वरैया के बारे में
- सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (1861–1962) एक प्रसिद्ध अभियंता, प्रशासक और राजनेता थे। उनका जन्म 15 सितंबर 1861 को वर्तमान कर्नाटक के मुद्देनहल्ली में हुआ था।
- उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि प्राप्त की और बाद में पुणे के विज्ञान महाविद्यालय से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की। 1884 में वे बॉम्बे लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता के रूप में नियुक्त हुए।
- उन्होंने 1912 से 1918 तक मैसूर के दीवान के रूप में कार्य किया तथा राज्य के औद्योगिक, शैक्षिक और बुनियादी ढाँचे के विकास में योगदान दिया।
- इंजीनियरिंग और राष्ट्र-निर्माण के क्षेत्र में उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए उन्हें 1955 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
इंजीनियरिंग क्षेत्र में योगदान और विरासत
- जल प्रबंधन और सिंचाई: उन्होंने स्वचालित जल-प्रवाह नियंत्रण गेट प्रणाली का डिजाइन तैयार किया और उसका पेटेंट कराया। इसे पहली बार 1903 में पुणे के निकट खड़कवासला जलाशय में स्थापित किया गया, जिससे जल भंडारण और जल-नियमन में सुधार हुआ। उन्होंने सिंचाई और जलापूर्ति से संबंधित परियोजनाओं में भी योगदान दिया।
- बाढ़ प्रबंधन: 1908 में हैदराबाद में मूसी नदी की विनाशकारी बाढ़ के बाद उन्होंने बाढ़ नियंत्रण संबंधी प्रस्ताव तैयार किए और भविष्य में शहर को बाढ़ से बचाने के उपायों पर सलाह दी। उनके इंजीनियरिंग कार्यों में विशाखापत्तनम बंदरगाह को समुद्री अपरदन से बचाने से संबंधित उपाय भी शामिल थे।
- बाँध और बुनियादी ढाँचा: मैसूर के मुख्य अभियंता के रूप में वे कृष्णराज सागर (KRS) बाँध से निकटता से जुड़े रहे। यह एक महत्वपूर्ण सिंचाई और जलापूर्ति परियोजना थी। उन्होंने मैसूर के व्यापक बुनियादी ढाँचे के विकास में भी योगदान दिया।
डोगरी लिपि
संदर्भ: जम्मू नगर निगम ने पारंपरिक डोगरी लिपि, ‘नमे डोगरा अखर’, में सार्वजनिक साइनबोर्ड लगाना शुरू किया है। यह इसके दैनिक उपयोग को बढ़ावा देने के प्रयास को दर्शाता है।
डोगरी भाषा और लिपि के बारे में
- भाषा: डोगरी एक हिंद-आर्य भाषा है, जो पश्चिमी पहाड़ी भाषा समूह से संबंधित है। यह मुख्य रूप से जम्मू तथा पंजाब, हिमाचल प्रदेश और पाक अधिकृत कश्मीर के आसपास के क्षेत्रों में बोली जाती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में इसके लगभग 26 लाख मातृभाषी थे।
- संवैधानिक दर्जा: डोगरी को 92वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के माध्यम से आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं में शामिल किया गया। वर्ष 2020 में यह केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की आधिकारिक भाषाओं में से एक बन गई।
- टाकरी: डोगरी ऐतिहासिक रूप से टाकरी लिपि में लिखी जाती थी। यह पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में प्रचलित एक लिपि थी। महाराजा रणबीर सिंह के शासनकाल में इसका संशोधित रूप ‘नमे डोगरा अखर’ विकसित हुआ।
- नामे डोगरा अखर: टाकरी लिपि में प्रशासनिक लिप्यंतरण के लिए आवश्यक स्वर चिह्नों का अभाव था। रणबीर सिंह के शासनकाल में देवनागरी से स्वर चिह्न अपनाए गए, जिसके परिणामस्वरूप नमे डोगरा अखर का विकास हुआ। इसका अर्थ “नई डोगरी लिपि” है।
- पतन: धीरे-धीरे इस लिपि का उपयोग कम होता गया। डोगरी संस्था ने डोगरी साहित्य को लोकप्रिय बनाने के लिए 1944 में देवनागरी लिपि को अपनाया, जबकि एक आधिकारिक समिति की सिफारिश के बाद 1955 में डोगरी के लिए देवनागरी को औपचारिक रूप से अपनाया गया।
डोगरी लिपि को पुनः प्रचलन में लाना
- सार्वजनिक संकेतक: जम्मू नगर निगम प्रमुख स्थानों और संस्थानों पर नमे डोगरा अखर वाले साइनबोर्ड लगा रहा है। इन पर देवनागरी और रोमन लिपि का भी उपयोग किया जा रहा है।
- नागरिक समाज की पहल: इस पुनरुद्धार अभियान की शुरुआत नागरिक समाज के सदस्यों द्वारा धार्मिक स्थलों और श्मशान घाटों पर नमे डोगरा अखर में बोर्ड लगाने से हुई। इसके बाद व्यापक स्तर पर सार्वजनिक संकेतक लगाने के लिए नगर निगम से संपर्क किया गया।
- सीखना और संरक्षण: इस पहल का उद्देश्य विशेष रूप से युवा पीढ़ी के बीच इस लिपि से परिचित होने की भावना को पुनः स्थापित करना है। इस पुनरुद्धार प्रयास के तहत डोगरी लिपि की कक्षाएँ शुरू करने का प्रस्ताव भी है।
- भाषा–लिपि का अंतर: डोगरी को भाषा के रूप में संवैधानिक और संस्थागत मान्यता प्राप्त है, लेकिन इसकी पारंपरिक लिपि दैनिक उपयोग से काफी हद तक लुप्त हो गई है। इसलिए वर्तमान पहल का विशेष ध्यान भाषा के साथ-साथ इसकी लिखित लिपि को पुनः प्रचलन में लाने पर है।
युद्ध अभ्यास 2026
संदर्भ: भारत-अमेरिका के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘युद्ध अभ्यास’ का 22वाँ संस्करण 15 सितंबर 2026 को औली, उत्तराखंड और महाजन फील्ड फायरिंग रेंज, राजस्थान में शुरू हुआ।
अन्य संबंधित जानकारी
- दो स्थानों पर आयोजित अभ्यास: 2026 के संस्करण में औली में उच्च ऊँचाई वाले/पर्वतीय क्षेत्र में प्रशिक्षण तथा महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में फील्ड-फायरिंग और सामरिक प्रशिक्षण को शामिल किया गया है।
- प्रौद्योगिकी और आधुनिक युद्ध: प्रशिक्षण में एकीकृत युद्धक समूह (IBGs), ड्रोन और स्वायत्त प्रणालियों का उपयोग शामिल है। इसमें अंतर-संचालनीयता और बहु-क्षेत्रीय अभियानों पर विशेष जोर दिया गया है।
युद्ध अभ्यास के बारे में
- प्रकृति: यह भारतीय सेना और अमेरिकी सेना के बीच आयोजित एक द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास है, जिसका पहला आयोजन 2004 में हुआ था।
- उद्देश्य: दोनों सेनाओं के बीच अंतर-संचालनीयता, संयुक्त परिचालन क्षमताओं और सामरिक कार्यप्रणालियों के आदान-प्रदान को बढ़ाना।
- केंद्रबिंदु: पर्वतीय और अर्द्ध-पर्वतीय क्षेत्रों में प्रशिक्षण, संयुक्त अभियान तथा आधुनिक युद्ध तकनीकों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। इसके नए संस्करणों में उभरती प्रौद्योगिकियों को भी शामिल किया जा रहा है।
- महत्त्व: यह भारत-अमेरिका सैन्य सहयोग को मजबूत करता है तथा दोनों सेनाओं की संयुक्त अभियान संचालित करने की क्षमता को बढ़ाता है।
