सामान्य अध्ययन

सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और क्रियान्वयन से संबंधित विषय; स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उससे जुड़ी चुनौतियाँ।

सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

संदर्भ: जनजातीय कार्य मंत्रालय के अनुसार, वन अधिकार अधिनियम, 2006 में चरण-II वन स्वीकृति के लिए ग्राम सभा की सहमति को अनिवार्य करने का कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है। यह स्पष्टीकरण प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं के लिए वन स्वीकृति में हो रही लंबी देरी को लेकर उठी चिंताओं के बीच सामने आया है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • जनजातीय कार्य मंत्रालय का पक्ष: जनजातीय कार्य मंत्रालय ने कहा है कि न तो वन अधिकार अधिनियम और न ही इसके नियमों में चरण-II वन स्वीकृति के लिए ग्राम सभा की सहमति आवश्यक करने का कोई प्रावधान है। मंत्रालय ने यह भी संकेत दिया है कि ऐसे वन-स्वीकृति संबंधी मामले उसके प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं।
  • एनएचपीसी परियोजनाएँ: सार्वजनिक उपक्रमों पर संसदीय स्थायी समिति ने एनएचपीसी पर अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया कि इसकी निर्माणाधीन परियोजनाओं के लिए वन स्वीकृति प्राप्त करने में औसतन 106 महीने लगते हैं और ग्राम सभा की सहमति को एक प्रमुख बाधा के रूप में चिन्हित किया।
  • तीस्ता-IV: उत्तरी सिक्किम में 520 मेगावाट की तीस्ता-IV जलविद्युत परियोजना का उदाहरण दिया गया, जो कुछ ग्राम पंचायतों की सहमति लंबित रहने के कारण अनिश्चितकाल के लिए रुकी हुई है।
  • प्रस्तावित परिवर्तन: समिति ने सभी प्रभावित ग्राम सभाओं की सहमति लेने के बजाय राष्ट्रीय महत्व की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के लिए प्रभावित ग्राम सभाओं के 70–75% योग्य विशेष बहुमत की व्यवहार्यता की जाँच करने की सिफारिश की।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 को समझना

  • उद्देश्य: वन अधिकार अधिनियम का उद्देश्य वन क्षेत्रों में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों (ओटीएफडी) के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना तथा वन अधिकारों को मान्यता देना और उन्हें प्रदान करना है।
  • मान्यता प्राप्त अधिकार: इनमें व्यक्तिगत वन अधिकार, सामुदायिक अधिकार, सामुदायिक वन संसाधन (सीएफआर) अधिकार, विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के आवास अधिकार और लघु वनोपज पर अधिकार आदि शामिल हैं।
  • धारा 6 के अंतर्गत ग्राम सभा: ग्राम सभा दावों को प्राप्त करके, उनका सत्यापन करके और उन्हें समेकित करके व्यक्तिगत तथा सामुदायिक वन अधिकारों के निर्धारण और मान्यता की प्रक्रिया शुरू करती है।
  • संरक्षण की भूमिका: धारा 5 ग्राम सभा और वन अधिकार धारकों को वनों, जैव विविधता, वन्यजीवों, जल स्रोतों तथा अन्य पारिस्थितिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा करने का अधिकार प्रदान करती है।
  • विकासात्मक सुविधाएँ: धारा 3(2) निर्धारित शर्तों के अधीन और संबंधित ग्राम सभा की सिफारिश के आधार पर निर्दिष्ट बुनियादी विकासात्मक सुविधाओं के लिए वन भूमि के उपयोग की अनुमति देती है।
  • नोडल मंत्रालय: धारा 11 वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय को नोडल मंत्रालय बनाती है।

ग्राम सभा की सहमति वन स्वीकृति से कैसे संबद्ध थी?

  • वन अधिकार अधिनियम और सहमति: वन अधिकार अधिनियम में गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए वन भूमि के व्यपवर्तन या चरण-II वन स्वीकृति के लिए सामान्य ग्राम सभा की सहमति को पूर्व शर्त के रूप में स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किया गया है।
  • वन स्वीकृति संबंधी दिशानिर्देश: यह संबंध वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के अंतर्गत वन भूमि व्यपवर्तन की व्यवस्था के माध्यम से विकसित हुआ, जिसके तहत वन अधिकारों की पहचान, मान्यता और उन्हें प्रदान किया जाना आवश्यक था तथा ग्राम सभा से संबंधित प्रमाणन/अनापत्ति प्रमाण-पत्र की आवश्यकताओं को स्वीकृति प्रक्रिया में शामिल किया गया। जनजातीय कार्य मंत्रालय स्वयं इन वन भूमि व्यपवर्तन संबंधी दिशानिर्देशों को अपने “विकास और वन अधिकार अधिनियम” ढाँचे के अंतर्गत सूचीबद्ध करता है।
  • 2017 की व्यवस्था: वन संरक्षण नियम, 2017 में विशेष रूप से जिला कलेक्टर के लिए वन अधिकारों की मान्यता और उन्हें प्रदान करने की प्रक्रिया पूरी करना तथा वन भूमि व्यपवर्तन के लिए निष्कर्ष अग्रेषित करने से पहले प्रत्येक संबंधित ग्राम सभा की सहमति प्राप्त करना अनिवार्य किया गया था।
  • 2022 के नियम: वन संरक्षण नियम, 2022 ने प्रक्रिया के क्रम में बदलाव करते हुए राज्य सरकार द्वारा अंतिम व्यपवर्तन आदेश जारी करने से पहले अनुपालन के एक भाग के रूप में वन अधिकार अधिनियम के अधिकारों का निपटान आवश्यक किया। हालांकि, नियमों में सैद्धांतिक स्वीकृति से पहले ग्राम सभा की सहमति प्राप्त करने संबंधी पहले की स्पष्ट शब्दावली को बरकरार नहीं रखा गया।
  • नियामगिरि निर्णय: ओडिशा माइनिंग कॉरपोरेशन बनाम पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (2013) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने किसी परियोजना से प्रभावित वनवासी समुदायों के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक अधिकारों के निर्धारण में ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका को मान्यता दी।

ग्राम सभा, पेसा और सामुदायिक अधिकार

  • पेसा, 1996: संविधान के भाग IX का विस्तार पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों तक करता है, जिसमें ग्राम सभाओं की भूमिका को मान्यता देने के लिए संशोधन किए गए हैं, ताकि प्रथागत परंपराओं और सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
  • ·वन अधिकार अधिनियम–पेसा संबंध: दोनों कानून एक-दूसरे के पूरक क्षेत्रों में कार्य करते हैं—पेसा अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय स्वशासन को सुदृढ़ करता है, जबकि वन अधिकार अधिनियम वन-निवासी समुदायों के वन अधिकारों को मान्यता देता है और उन्हें अधिकार प्रदान करता है।
    • सामुदायिक वन संसाधन अधिकार: सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की मान्यता ग्राम सभाओं और वन अधिकार-धारकों को सामुदायिक वनों की सुरक्षा, संरक्षण, पुनरुत्पादन और प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करती है।
    • सहभागी शासन: इसलिए, वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत ग्राम सभा की भूमिका केवल वन स्वीकृति प्रक्रियाओं में भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अधिकारों की मान्यता, सामुदायिक संसाधन प्रबंधन और वन संरक्षण तक विस्तृत है।

सामुदायिक अधिकारों और विकास के बीच संतुलन

  • विकास संबंधी चिंता: एनएचपीसी की निर्माणाधीन परियोजनाओं के लिए 106 महीने की औसत स्वीकृति अवधि लंबे समय तक चलने वाली वन-स्वीकृति प्रक्रियाओं से जुड़ी आर्थिक और ऊर्जा-सुरक्षा लागत को उजागर करती है।
  • सामुदायिक अधिकार: वन भूमि के व्यपवर्तन से वन अधिकारों की मान्यता, आजीविका, संसाधनों तक प्रथागत पहुँच और वन-निर्भर समुदायों के सांस्कृतिक हित प्रभावित हो सकते हैं।
  • विशेष बहुमत का प्रस्ताव: 70–75% की सीमा निर्धारित करने से उन मामलों में विलंब कम हो सकता है, जहाँ कम संख्या में ग्राम सभाएँ सहमति देने से इनकार करती हैं, विशेष रूप से राष्ट्रीय महत्व की बड़ी परियोजनाओं के लिए।
  • अधिकारों की सुरक्षा: हालाँकि, सर्वसम्मति के स्थान पर संख्यात्मक सीमा निर्धारित करने से प्रभावित अल्पसंख्यक समुदायों की आपत्तियों के बावजूद किसी परियोजना को आगे बढ़ाया जा सकता है; इसलिए प्रक्रियात्मक विलंब और वास्तविक अधिकार-आधारित आपत्तियों के बीच अंतर किया जाना आवश्यक है।

आगे की राह

  • स्पष्ट एवं समयबद्ध वन अधिकार अधिनियम-अनुपालन व्यवस्था विकसित की जाए, प्रभावित ग्राम सभाओं की सार्थक एवं सूचित भागीदारी सुनिश्चित की जाए तथा जनजातीय कार्य मंत्रालय, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थाओं के दायित्वों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाए, साथ ही विधि द्वारा संरक्षित वन अधिकारों का प्रभावी संरक्षण सुनिश्चित किया जाए।
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