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सामान्य अध्ययन-2: भारत से जुड़े और/या भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक समूह और करार।

सामान्य अध्ययन -3: साइबर सुरक्षा की मूल बातें; सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और कंप्यूटर के क्षेत्र में जागरूकता।

संदर्भ: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 25 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र के दौरान संयुक्त राष्ट्र साइबर अपराध अभिसमय पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही भारत विशेष रूप से साइबर अपराध से संबंधित पहली व्यापक वैश्विक संधि का हस्ताक्षरकर्ता बन गया।

संयुक्त राष्ट्र साइबर अपराध अभिसमय को समझना

  • उद्देश्य: यह अभिसमय साइबर अपराध की रोकथाम और उससे निपटने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने तथा विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए तकनीकी सहायता और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने का प्रयास करता है।
  • अंगीकरण: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 24 दिसंबर 2024 को प्रस्ताव 79/243 के माध्यम से इस अभिसमय को अपनाया। इसके लिए 2019 में गठित तदर्थ समिति (Ad Hoc Committee) के माध्यम से वार्ताएँ आयोजित की गई थीं।
  • हस्ताक्षर: यह अभिसमय 25–26 अक्टूबर 2025 को वियतनाम के हनोई में हस्ताक्षर के लिए खोला गया तथा इसके बाद 31 दिसंबर 2026 तक न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में हस्ताक्षर के लिए उपलब्ध रहा।
  • वर्तमान स्थिति: सितंबर 2026 तक 91 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं और 3 देश इसके पक्षकार हैं। भारत वर्तमान में इसका हस्ताक्षरकर्ता (Signatory) है, अभी पक्षकार (State Party) नहीं है।
  • प्रवर्तन: यह अभिसमय अभी प्रभावी नहीं हुआ है। यह तब प्रभावी होगा जब संयुक्त राष्ट्र महासचिव के पास अनुसमर्थन, स्वीकृति, अनुमोदन या परिग्रहण के 40वें दस्तावेज के जमा होने के 90 दिन बाद यह लागू होगा।
  • इसकी आवश्यकता क्यों है: साइबर अपराध स्वभावतः पार-राष्ट्रीय होते हैं। अपराधी, पीड़ित, डिजिटल अवसंरचना और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अक्सर अलग-अलग न्यायक्षेत्रों में स्थित होते हैं, जिससे जाँच और अभियोजन में चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
  • सार्वभौमिक ढाँचा: बुडापेस्ट कन्वेंशन ऑन साइबरक्राइम (2001) जैसे क्षेत्रीय/बहुपक्षीय साधनों के विपरीत, संयुक्त राष्ट्र साइबर अपराध अभिसमय एक वैश्विक कानूनी रूप से बाध्यकारी ढाँचा स्थापित करता है, जिसे समावेशी संयुक्त राष्ट्र प्रक्रिया के माध्यम से विकसित किया गया है।

अभिसमय के प्रमुख प्रावधान

  • अपराधीकरण: ICT से संबंधित निर्धारित अपराधों को अपराध के रूप में परिभाषित करने के लिए एक साझा ढाँचा स्थापित करता है। इसमें अवैध पहुँच, गैरकानूनी अवरोधन, इलेक्ट्रॉनिक डेटा और प्रणालियों में हस्तक्षेप, उपकरणों का दुरुपयोग तथा कंप्यूटर से संबंधित कुछ प्रकार की धोखाधड़ी और दुरुपयोग शामिल हैं।
  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य: इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के संरक्षण, संग्रह, पहुँच और साझा करने के लिए तंत्र प्रदान करता है। इसमें अभिसमय के अंतर्गत विशेष रूप से अपराधीकृत अपराधों के अतिरिक्त गंभीर अपराधों से संबंधित साक्ष्य भी शामिल हो सकते हैं।
  • 24/7 सहयोग नेटवर्क: पक्षकार देशों के लिए 24/7 संपर्क बिंदुओं का नेटवर्क स्थापित करना आवश्यक करता है, ताकि इलेक्ट्रॉनिक डेटा के संरक्षण, साक्ष्य संग्रह और तकनीकी सहायता सहित शीघ्र सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: जाँच, अभियोजन और न्यायिक कार्यवाहियों में सहयोग को सुगम बनाता है। इसमें पारस्परिक कानूनी सहायता, प्रत्यर्पण और आपराधिक कार्यवाहियों के हस्तांतरण जैसे प्रावधान शामिल हैं, जो निर्धारित सुरक्षा उपायों के अधीन हैं।
  • वित्तीय आयाम: अभिसमय के अंतर्गत आने वाले अपराधों से प्राप्त आय को फ्रीज करने, जब्त करने, अधिहरण करने और वापस करने में सहयोग का प्रावधान करता है।
  • क्षमता निर्माण और रोकथाम: तकनीकी सहायता, विशेषज्ञता के आदान-प्रदान, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, प्रशिक्षण और निवारक रणनीतियों को बढ़ावा देता है। इसमें विकासशील देशों की आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया गया है।
  • पीड़ित एवं बाल संरक्षण: पीड़ितों की सहायता और सुरक्षा से संबंधित प्रावधान शामिल करता है। इनमें बाल यौन शोषण सामग्री तथा बिना सहमति अंतरंग तस्वीरों के प्रसार से संबंधित अपराध भी शामिल हैं।

भारत के लिए महत्त्व

  • सीमा-पार साइबर अपराध से निपटना: एक साझा कानूनी ढाँचा उन देशों के साथ भारत के सहयोग को मजबूत कर सकता है, जहाँ साइबर अपराधी, डिजिटल अवसंरचना या साक्ष्य भारत के न्यायक्षेत्र से बाहर स्थित हैं।
  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य तक पहुँच: त्वरित संरक्षण और सहयोग तंत्र से डिजिटल साक्ष्य को सुरक्षित करने में मदद मिल सकती है, इससे पहले कि उसे नष्ट, परिवर्तित या विभिन्न न्यायक्षेत्रों के बीच स्थानांतरित किया जाए।
  • कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय: यह अभिसमय साइबर अपराध की जाँच, अभियोजन और अपराध से प्राप्त धन की बरामदगी में भारतीय एजेंसियों तथा विदेशी समकक्ष एजेंसियों के बीच सहयोग को सुगम बना सकता है।
  • क्षमता निर्माण: तकनीकी विशेषज्ञता, प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग से उभरते साइबर खतरों से निपटने की भारत की क्षमता मजबूत हो सकती है।
  • भारत की वार्ता में भूमिका: भारत ने अभिसमय की वार्ताओं में सक्रिय रूप से भाग लिया और सीमा-पार डेटा तक पहुँच तथा 24/7 सहयोग नेटवर्क के लिए मजबूत तंत्र की वकालत की। यह विदेशों में स्थित डेटा प्राप्त करने में आने वाली कठिनाइयों के प्रति भारत की चिंताओं को दर्शाता है।

चिंताएँ और चुनौतियाँ

  • संप्रभुता और न्यायक्षेत्र: सीमा-पार जाँच से राष्ट्रीय कानूनों, न्यायक्षेत्रीय अधिकारों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों तक त्वरित पहुँच की आवश्यकता के बीच टकराव उत्पन्न हो सकता है।
  • गोपनीयता और मानवाधिकार: इलेक्ट्रॉनिक डेटा तक पहुँच और उसके हस्तांतरण के विस्तारित तंत्र के लिए गोपनीयता, उचित प्रक्रिया और मौलिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा हेतु पर्याप्त उपाय आवश्यक हैं।
  • कार्यान्वयन में असमानताएँ: साइबर कानूनों, तकनीकी क्षमताओं, संस्थागत क्षमता और न्यायिक प्रक्रियाओं में अंतर प्रभावी अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सीमित कर सकता है।
  • दायरे और दुरुपयोग संबंधी चिंताएँ: नागरिक समाज और निजी क्षेत्र से जुड़े हितधारकों ने चिंता व्यक्त की है कि व्यापक जाँच एवं डेटा तक पहुँच की शक्तियाँ गोपनीयता, वैध ऑनलाइन गतिविधियों और डिजिटल अधिकारों को प्रभावित कर सकती हैं।

आगे की राह

  • घरेलू प्रक्रियाएँ पूरी करना: भारत को अभिसमय के अनुसमर्थन और प्रभावी घरेलू कार्यान्वयन के लिए आवश्यक कानूनी एवं संस्थागत मूल्यांकन करना चाहिए।
  • साइबर क्षमताओं को मजबूत करना: केंद्र और राज्य स्तर पर साइबर फोरेंसिक, विशेषीकृत जाँच, अभियोजन तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से संबंधित क्षमताओं को बढ़ाना चाहिए।
  • विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करना: 24/7 संपर्क तंत्र, पारस्परिक कानूनी सहायता और संयुक्त जाँच को मजबूत किया जाना चाहिए तथा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सीमा-पार डेटा तक पहुँच कानूनसम्मत और जवाबदेह बनी रहे।
  • सुरक्षा और अधिकारों के बीच संतुलन: साइबर अपराध के विरुद्ध मजबूत कानून प्रवर्तन के साथ गोपनीयता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उचित प्रक्रिया और राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए ठोस सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाने चाहिए। साथ ही, ढाँचे को उभरती प्रौद्योगिकियों के अनुरूप अनुकूलनशील बनाए रखना चाहिए।
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