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सामान्य अध्ययन -2: भारत और उसके पड़ोसी-संबंध; भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक समूह और करार।
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संदर्भ: भारत ने वैश्विक रक्षा साझेदारियों के लिए ‘RAKSHA’ नामक 10-वर्षीय रणनीतिक रोडमैप प्रस्तुत किया है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा लक्ष्यों को सक्रिय वैश्विक सहयोग तथा दीर्घकालिक क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्थिरता के साथ समन्वित करना है।
अन्य संबंधित जानकारी
• RAKSHA भारत की विदेश नीति में रक्षा कूटनीति के बढ़ते महत्त्व को दर्शाते हुए सक्रिय रणनीतिक सहभागिता की दिशा में बदलाव का संकेत देता है।
• सरकार ने रक्षा कूटनीति को विदेश नीति का एक प्रमुख स्तंभ माना है। RAKSHA अगले दशक के लिए रक्षा साझेदारियों को आगे बढ़ाने हेतु एक स्पष्ट और क्रियान्वयन योग्य दृष्टिकोण प्रदान करता है।
भारत की विकसित होती रक्षा कूटनीति
• सैन्य आदान-प्रदान से रणनीतिक साझेदारी तक: भारत की रक्षा कूटनीति पारंपरिक सैन्य-से-सैन्य संबंधों से आगे बढ़कर दीर्घकालिक द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सुरक्षा साझेदारियों तक विस्तारित हुई है।
• खरीदार से रक्षा साझेदार तक: बढ़ती स्वदेशी क्षमताओं ने भारत को रक्षा प्रौद्योगिकी और उद्योग में सहयोग करने के साथ-साथ रक्षा उत्पादक एवं निर्यातक के रूप में सक्रिय भूमिका निभाने में सक्षम बनाया है।
• द्विपक्षीय सहभागिता से नेटवर्क-आधारित सहयोग तक: संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और सूचना-साझाकरण साझेदार देशों के साथ सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के प्रमुख साधन बन गए हैं।
• रणनीतिक राज्य-कौशल के रूप में रक्षा कूटनीति: रक्षा सहयोग अब राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के विविधीकरण जैसे व्यापक उद्देश्यों की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
• बढ़ता समुद्री आयाम: हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका के साथ रक्षा कूटनीति का समुद्री आयाम भी सुदृढ़ हुआ है। इसमें क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग तथा नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर और फर्स्ट रिस्पॉन्डर के रूप में भारत की जिम्मेदारियाँ शामिल हैं।
RAKSHA: भारत का 10-वर्षीय रक्षा कूटनीति रोडमैप
• RAKSHA अगले दशक के लिए भारत की वैश्विक रक्षा साझेदारियों हेतु एक व्यापक और क्रियान्वयन योग्य ढाँचा प्रदान करता है।
• इसके चार प्रमुख स्तंभ हैं—रणनीतिक सहभागिता, साझेदार देशों की क्षमता वृद्धि, स्वदेशी रक्षा निर्यात और क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा में भारत की भूमिका।
• रणनीतिक साझेदारियाँ: द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सुरक्षा सहयोग को गहरा करना तथा साझेदार देशों के साथ भारत के दीर्घकालिक रक्षा संबंधों को सुदृढ़ करना।
• क्षमता निर्माण: संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान के माध्यम से मित्र देशों की क्षमताओं में वृद्धि करना तथा रक्षा सहयोग को व्यापक बनाना।
• स्वदेशी निर्यात: मेक इन इंडिया रक्षा प्लेटफॉर्म को बढ़ावा देकर भारत को एक विश्वसनीय वैश्विक रक्षा-विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना तथा स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों से जोड़ना।
• समुद्री सुरक्षा: हिंद महासागर क्षेत्र में नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर और फर्स्ट रिस्पॉन्डर के रूप में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करना तथा क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा में उसके योगदान को बढ़ाना।
• इस प्रकार, RAKSHA दीर्घकालिक रणनीतिक ढाँचे के अंतर्गत रक्षा कूटनीति के चार परस्पर पूरक आयामों—साझेदारी निर्माण, क्षमता वृद्धि, रक्षा-औद्योगिक पहुँच और समुद्री सुरक्षा—को एकीकृत करता है।
RAKSHA का रणनीतिक महत्त्व
• रक्षा कूटनीति का संस्थागतकरण: 10-वर्षीय ढाँचा भारत की बढ़ती रक्षा साझेदारियों को अधिक निरंतरता और स्पष्ट रणनीतिक दिशा प्रदान कर सकता है।
• रक्षा उत्पादन को कूटनीति से जोड़ना: स्वदेशी रक्षा निर्यात पर स्पष्ट ध्यान भारत की बढ़ती रक्षा-विनिर्माण क्षमताओं को अंतरराष्ट्रीय सहभागिता में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है।
• क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करना: समुद्री सुरक्षा का स्तंभ हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में शांति, सुरक्षा और स्थिरता में भारत के योगदान को बढ़ाता है।
• भारत की वैश्विक भूमिका को बढ़ाना: RAKSHA का उद्देश्य पारस्परिक रूप से लाभकारी वैश्विक साझेदारियों को बढ़ावा देते हुए भारत को शांति, स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था के समर्थक के रूप में स्थापित करना है।
RAKSHA को परिणामों में बदलने की चुनौतियाँ
• विविध साझेदारियों के बीच संतुलन: भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए विभिन्न साझेदारों के साथ रक्षा सहयोग को गहरा करना होगा तथा किसी एक संबंध पर अत्यधिक निर्भरता से बचना होगा।
• निर्यात को टिकाऊ साझेदारियों में बदलना: विश्वसनीय रक्षा-विनिर्माण केंद्र बनने के लिए भारतीय रक्षा प्लेटफॉर्मों को निरंतर प्रतिस्पर्धात्मकता, विश्वसनीयता और वैश्विक स्वीकार्यता प्रदर्शित करनी होगी।
• समुद्री जिम्मेदारियों को क्षमताओं के अनुरूप बनाना: नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर और फर्स्ट रिस्पॉन्डर के रूप में व्यापक भूमिका निभाने के लिए पर्याप्त परिचालन क्षमताओं तथा हिंद महासागर क्षेत्र में निरंतर सहभागिता आवश्यक होगी।
• संस्थागत समन्वय सुनिश्चित करना: बहुआयामी रक्षा-कूटनीति ढाँचे के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, सशस्त्र बलों और रक्षा उद्योग के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है।
आगे की राह
• विभेदित साझेदारियों को आगे बढ़ाना: रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए प्रत्येक साझेदार देश के रणनीतिक हितों और आवश्यकताओं के अनुरूप रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाना।
• विश्वसनीय रक्षा-निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण: भारत को एक विश्वसनीय दीर्घकालिक रक्षा साझेदार के रूप में स्थापित करने के लिए आवश्यक संस्थागत एवं सहायक क्षमताओं के साथ स्वदेशी रक्षा प्लेटफॉर्मों को सुदृढ़ करना।
• समुद्री सहयोग को मजबूत करना: क्षेत्रीय क्षमता निर्माण, सैन्य अभ्यासों और सहयोगात्मक तंत्रों का विस्तार करना, ताकि नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर और फर्स्ट रिस्पॉन्डर के रूप में भारत की भूमिका को दीर्घकालिक क्षेत्रीय क्षमता में परिवर्तित किया जा सके।
• संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण अपनाना: RAKSHA के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कूटनीतिक उद्देश्यों, सैन्य क्षमताओं और रक्षा-औद्योगिक क्षमता के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना।
