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सामान्य अध्ययन-2: भारत और उसके पड़ोसी देशों के साथ संबंध; भारत को शामिल करने वाले अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक समूह और समझौते।
संदर्भ: भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) पर हेग स्थित मध्यस्थता न्यायालय (CoA) द्वारा दिए गए नवीनतम निर्णय को खारिज कर दिया है। भारत का कहना है कि इस निकाय का गठन गैर-कानूनी रूप से किया गया है और संधि से संबंधित भारत के संप्रभु निर्णयों पर इसका कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।
अन्य संबंधित जानकारी
• मध्यस्थता न्यायालय का निर्णय: मध्यस्थता न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि सिंधु जल संधि पूरी तरह प्रभावी है और भारत द्वारा इसे स्थगित रखने का निर्णय उसकी संधि संबंधी बाध्यताओं को निलंबित नहीं कर सकता।
• भारत ने निर्णय को खारिज किया: भारत ने इस निर्णय को खारिज करते हुए दोहराया कि उसने मध्यस्थता न्यायालय के कानूनी अस्तित्व या अधिकार क्षेत्र को कभी मान्यता नहीं दी है और न ही उसने इसकी कार्यवाही में भाग लिया है।
• किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाएँ: यह निर्णय पश्चिमी नदियों पर भारत की किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से संबंधित व्यापक विवाद के कारण लिया गया है। इन परियोजनाओं के तकनीकी डिजाइन से जुड़े मुद्दों को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेद रहे हैं।
• भारत का रुख: भारत का कहना है कि मध्यस्थता न्यायालय के निर्णयों, जिसमें नवीनतम निर्णय भी शामिल है, का भारत के संप्रभु निर्णयों या उसकी परियोजनाओं पर कोई प्रभाव नहीं है तथा सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का भारत का निर्णय अभी भी प्रभावी है।
सिंधु जल संधि को समझना
• पृष्ठभूमि: सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर 1960 को कराची में हस्ताक्षर किए गए थे। यह वार्ता विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। संधि भारत और पाकिस्तान द्वारा सिंधु नदी तंत्र के जल के उपयोग के लिए एक ढाँचा प्रदान करती है।
• पूर्वी नदियाँ: रावी, ब्यास और सतलुज नदियों के जल को संधि के प्रावधानों के अधीन भारत के विशेष उपयोग के लिए निर्धारित किया गया।
• पश्चिमी नदियाँ: सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों के जल को मुख्य रूप से पाकिस्तान के उपयोग के लिए निर्धारित किया गया, जबकि भारत को संधि की शर्तों के अधीन घरेलू उपयोग, कृषि उपयोग और जलविद्युत उत्पादन सहित कुछ निर्धारित अधिकार प्राप्त हैं।
• जलविद्युत: भारत को पश्चिमी नदियों पर संधि और उसके परिशिष्टों में निर्धारित डिजाइन एवं संचालन संबंधी प्रतिबंधों के अधीन बहती नदी पर आधारित जलविद्युत परियोजनाएँ स्थापित करने की अनुमति है।
• स्थायी सिंधु आयोग: संधि के तहत स्थायी सिंधु आयोग (PIC) की स्थापना की गई। इसमें दोनों देशों का एक-एक आयुक्त होता है और यह संधि के कार्यान्वयन, सहयोग तथा सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए प्रमुख संस्थागत तंत्र के रूप में कार्य करता है।
भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित क्यों रखा?
• सुरक्षा संबंधी कारण: 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद भारत ने 23 अप्रैल को तत्काल प्रभाव से सिंधु जल संधि को स्थगित रखने की घोषणा की। भारत के इस निर्णय को पाकिस्तान द्वारा कथित रूप से सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन देने से जोड़ा जा सकता है।
• निर्धारित शर्त: भारत का कहना है कि संधि तब तक स्थगित रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा-पार आतंकवाद के लिए अपने समर्थन को विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से त्याग नहीं देता।
• पहले से मौजूद चिंताएँ: इस कदम से पहले भी भारत ने संधि में समीक्षा और संशोधन की माँग की थी। यह बदलती परिस्थितियों तथा विकासात्मक, जनसांख्यिकीय और पर्यावरणीय आवश्यकताओं में हो रहे बदलावों से जुड़ी चिंताओं को दर्शाता है।
• भारत का वर्तमान रुख: भारत का कहना है कि मध्यस्थता न्यायालय के विपरीत निष्कर्ष के बावजूद सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका निर्णय अभी भी प्रभावी है।
भारत न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को क्यों अस्वीकार करता है?
• संधि-आधारित तंत्र: अनुच्छेद IX जल संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए उनकी प्रकृति के आधार पर स्थायी सिंधु आयोग, तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता न्यायालय के माध्यम से एक क्रमबद्ध तंत्र स्थापित करता है।
• भारत की मुख्य आपत्ति: भारत का कहना है कि किशनगंगा और रतले परियोजनाओं से संबंधित मतभेद तकनीकी प्रकृति के हैं और इनकी जाँच संधि में निर्धारित तटस्थ विशेषज्ञ तंत्र के माध्यम से की जानी चाहिए।
• समानांतर प्रक्रियाएँ: वर्ष 2022 में विश्व बैंक ने इन परियोजनाओं से संबंधित दो अलग-अलग प्रक्रियाएँ फिर से शुरू कीं—एक में भारत द्वारा माँगे गए तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया और दूसरी में पाकिस्तान द्वारा माँगे गए मध्यस्थता न्यायालय की प्रक्रिया शामिल थी। भारत ने इन दोनों प्रक्रियाओं के एक साथ संचालित होने पर आपत्ति जताई।
• मध्यस्थता न्यायालय का गठन: भारत का कहना है कि विश्व बैंक द्वारा गठित मध्यस्थता न्यायालय की स्थापना संधि की निर्धारित व्यवस्था का उल्लंघन करते हुए की गई थी और इसलिए इसका कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। इसी कारण भारत ने न तो इस निकाय को मान्यता दी है और न ही इसके समक्ष उपस्थित हुआ है।
महत्त्व एवं व्यापक प्रभाव
• जल सुरक्षा एवं विकास: इस विवाद का भारत द्वारा पश्चिमी नदियों पर संधि के तहत प्राप्त अधिकारों के प्रयोग पर सीधा प्रभाव पड़ता है, विशेष रूप से जलविद्युत विकास की उसकी क्षमता पर।
• संधि की स्थायित्व क्षमता: यह विवाद 1960 की जल-बँटवारा व्यवस्था की कार्यप्रणाली की परीक्षा लेता है, क्योंकि भारत-पाकिस्तान संबंधों और व्यापक सुरक्षा वातावरण में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। इसके बावजूद, दोनों देशों के बीच गंभीर द्विपक्षीय संघर्षों के दौर में भी यह संधि सामान्यतः लागू रही है।
• विवाद-समाधान तंत्र: यह घटनाक्रम उन कठिनाइयों को उजागर करता है, जो तब उत्पन्न हो सकती हैं जब दोनों देश संधि के उपयुक्त तंत्र तथा किसी विवाद-न्यायनिर्णायक निकाय के अधिकार क्षेत्र को लेकर असहमत हों, विशेष रूप से जब समानांतर प्रक्रियाएँ शुरू की जाएँ।
• बदलती जल संबंधी परिस्थितियाँ: संधि को लेकर बहस में अब विकासात्मक आवश्यकताओं, पर्यावरणीय चिंताओं और बदलती जलवैज्ञानिक परिस्थितियों को भी महत्व मिल रहा है। इससे छह दशक से अधिक पहले तैयार की गई इस व्यवस्था की पर्याप्तता पर प्रश्न उठते हैं।
• सुरक्षा एवं जल का संबंध: भारत का निर्णय दर्शाता है कि सीमा-पार सुरक्षा संबंधी चिंताएँ अंतर्राज्यीय जल सहयोग को तेजी से प्रभावित कर सकती हैं, जिससे जल शासन भारत-पाकिस्तान संबंधों के व्यापक संदर्भ का एक महत्त्वपूर्ण आयाम बन गया है।
