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सामान्य अध्ययन–3: विभिन्न सुरक्षा बल एवं एजेंसियाँ तथा उनके अधिदेश; सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ एवं उनका प्रबंधन; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास।

संदर्भ: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने भारतीय नौसेना के लिए अगली पीढ़ी के स्टील्थ गाइडेड मिसाइल विध्वंसक के विकास हेतु प्रोजेक्ट 18A को सैद्धांतिक मंजूरी प्रदान की है।

प्रोजेक्ट 18A के बारे में

  •  प्रोजेक्ट 18A, जिसे अगली पीढ़ी के विध्वंसक (NGD) कार्यक्रम के रूप में भी जाना जाता है, का उद्देश्य भारत की भविष्य की नौसैनिक आवश्यकताओं के लिए उन्नत स्टील्थ निर्देशित मिसाइल विध्वंसक का विकास करना है।
  • यह विशाखापत्तनम श्रेणी (प्रोजेक्ट 15B) के विध्वंसक युद्धपोतों का उत्तरवर्ती कार्यक्रम होगा तथा स्वदेशी निर्देशित मिसाइल विध्वंसक युद्धपोतों के विकास को आगे बढ़ाएगा।
  • इस कार्यक्रम का अभिकल्पन नौसेना के युद्धपोत अभिकल्पन ब्यूरो (WDB) द्वारा किया जा रहा है। यह नौसेना की व्यापक आधुनिकीकरण योजना का हिस्सा है, जिसमें अगली पीढ़ी के फ्रिगेट (प्रोजेक्ट 17B) और अगली पीढ़ी के कार्वेट भी शामिल हैं।
  • इस कार्यक्रम की अनुमानित लागत 75,000–80,000 करोड़ रुपये है।

प्रोजेक्ट 18A की प्रमुख विशेषताएँ

  • बड़े आकार के युद्धपोत: प्रस्तावित विध्वंसक युद्धपोतों का विस्थापन 10,000 टन से अधिक होने की संभावना है, जबकि कुछ रिपोर्टों के अनुसार यह लगभग 13,000 टन हो सकता है।
    • यह विशाखापत्तनम श्रेणी के विध्वंसक युद्धपोतों के लगभग 7,400 टन के विस्थापन से काफी अधिक है। इससे अधिक हथियारों, संवेदकों और भविष्य में उन्नयन की क्षमता उपलब्ध होगी।
  • उन्नत हथियार प्रणालियाँ: उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित अभिकल्पना में अधिकतम 144 ऊर्ध्वाधर प्रक्षेपण प्रणाली (VLS) सेल हो सकते हैं।
    • इनमें ब्रह्मोस के विभिन्न संस्करण, बराक-8 विस्तारित मारक क्षमता वाली मिसाइल तथा लंबी दूरी की भूमि आक्रमण क्रूज मिसाइल (LR-LACM) के साथ उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों और भविष्य की मिसाइल प्रणालियों को भी शामिल किया जा सकता है।
  • उन्नत निगरानी एवं स्टील्थ क्षमता: प्रस्तावित विध्वंसक युद्धपोतों में उन्नत रडार, एकीकृत युद्ध प्रबंधन प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियाँ होंगी।
    • स्टील्थ-आधारित अभिकल्पना से बहु-क्षेत्रीय खतरों का पता लगाने, उनकी निगरानी करने तथा युद्धपोतों की उत्तरजीविता क्षमता में सुधार होगा।
  • एकीकृत विद्युत प्रणोदन (IEP): प्रस्तावित प्रणाली प्रणोदन और जहाज पर लगे उपकरणों के संचालन के लिए केंद्रीकृत रूप से विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करेगी।
    • इससे उन्नत संवेदकों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों और भविष्य में निर्देशित ऊर्जा हथियारों के उपयोग के लिए अधिक विद्युत क्षमता उपलब्ध होगी।
  • उन्नत पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता: उन्नत सोनार, जल के भीतर निगरानी प्रणालियों और पनडुब्बी रोधी हथियारों से शत्रु पनडुब्बियों का पता लगाने तथा उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता में सुधार होगा।
    • मानवरहित जलमग्न प्रणालियों के लिए प्रावधानों से निगरानी और समुद्री सुरंगों का पता लगाने की क्षमता भी बढ़ सकती है।
  • स्वदेशी विनिर्माण: इसमें लगभग 75% स्वदेशी सामग्री का उपयोग किए जाने की परिकल्पना है।
    • घरेलू रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSUs) और निजी पोत निर्माण शालाओं की भागीदारी से हथियारों, संवेदकों, प्रणोदन प्रणालियों तथा उन्नत पोत निर्माण प्रौद्योगिकियों के स्वदेशी विकास को बढ़ावा मिलेगा।

अगली पीढ़ी के स्टील्थ विध्वंसकों की आवश्यकता एवं महत्त्व

  • समुद्री प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करना: उन्नत हथियार, स्टील्थ और निगरानी प्रणालियाँ हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति तथा पाकिस्तान की बढ़ती जलमग्न युद्ध क्षमता का मुकाबला करने में सहायता करेंगी।
  • समुद्री हितों की रक्षा करना: महत्त्वपूर्ण समुद्री संचार मार्गों (SLOCs), समुद्री व्यापार और सामरिक अवसंरचना की सुरक्षा सुनिश्चित करना। भारत की व्यापक हिंद-प्रशांत प्रतिबद्धताओं को समर्थन देना।
  • दूरवर्ती समुद्री संचालन क्षमता बढ़ाना: अधिक मारक क्षमता, लंबी अवधि तक संचालन की क्षमता और उन्नत युद्ध प्रणालियाँ लंबी दूरी के नौसैनिक अभियानों को संचालित करेंगी। विमानवाहक पोत समूहों और समुद्री कार्यबलों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी।
  • नौसैनिक बेड़े का आधुनिकीकरण करना: सेवामुक्ति के निकट पहुँच रहे पुराने विध्वंसकों को प्रतिस्थापित करने में सहायता करना। उभरते समुद्री खतरों के मद्देनज़र भारत के सतही युद्धपोत बेड़े की क्षमता बनाए रखना।
  • आत्मनिर्भरता एवं भविष्य की तैयारियों को बढ़ावा देना: स्वदेशी विनिर्माण, उन्नत प्रणोदन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियाँ और अगली पीढ़ी के हथियार भारत के रक्षा उद्योग को मजबूती प्रदान करेंगे। आयात पर निर्भरता कम करेंगे तथा नौसेना को बहु-क्षेत्रीय समुद्री युद्ध के लिए तैयार करेंगे।
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