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सामान्य अध्ययन-3: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सब्सिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित मुद्दे; सार्वजनिक वितरण प्रणाली—उद्देश्य, कार्यप्रणाली, सीमाएँ, पुनर्गठन; बफर स्टॉक और खाद्य सुरक्षा से संबंधित मुद्दे; प्रौद्योगिकी मिशन; पशुपालन का अर्थशास्त्र।

संदर्भ: प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना ने 11 अक्टूबर 2026 को अपना पहला वर्ष पूरा किया। इस योजना के अंतर्गत 100 आकांक्षी कृषि जिलों में कृषि उत्पादकता, सिंचाई, ऋण की उपलब्धता तथा कटाई के बाद की अवसंरचना में सुधार के लिए जिला-स्तरीय प्रयास किए गए।

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना की प्रमुख विशेषताएँ

  • जिलों की पहचान: 100 जिलों का चयन तीन संकेतकों के आधार पर किया गया: कम कृषि उत्पादकता, कम फसल सघनता तथा कृषि ऋण का कम वितरण।
    • चयन में प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में शुद्ध फसल क्षेत्र तथा परिचालन जोतों के हिस्से को भी ध्यान में रखा गया। प्रत्येक राज्य से कम-से-कम एक जिले का चयन किया।
  • छह प्रमुख उद्देश्य: इस योजना का उद्देश्य है:
    • कृषि उत्पादकता में वृद्धि करना।
    • फसल विविधीकरण तथा सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना।
    • कटाई के बाद भंडारण क्षमता में वृद्धि करना।
    • सिंचाई अवसंरचना में सुधार करना।
    • अल्पकालिक और दीर्घकालिक कृषि ऋण तक पहुँच सुगम बनाना।
    • शासन व्यवस्था और सेवा वितरण में सुधार करना।
  • योजनाओं का अभिसरण: जिला-विशिष्ट कृषि आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 11 मंत्रालयों और विभागों की 36 मौजूदा केंद्रीय योजनाओं को राज्य की योजनाओं तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ एकीकृत किया गया है।

प्रमुख योजनाओं में शामिल हैं:

  • पीएम-किसान (PM-KISAN): किसानों को आय सहायता।
  • पीएमएफबीवाई (PMFBY): फसल बीमा।
  • पीएमकेएसवाई (PMKSY): सिंचाई का विकास।
  • राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY): कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों का समग्र विकास।
  • तीन-स्तरीय कार्यान्वयन संरचना:
    • जिला स्तर: जिला धन-धान्य कृषि योजना समिति, जिसकी अध्यक्षता जिला कलेक्टर/जिला मजिस्ट्रेट करते हैं, जिला कार्ययोजना तैयार करती है और उसे लागू करती है।
    • राज्य स्तर: राज्य धन-धान्य कृषि योजना समिति, जिसकी अध्यक्षता मुख्य सचिव करते हैं, जिला योजनाओं की समीक्षा और निगरानी करती है।
    • राष्ट्रीय स्तर: केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय कार्यकारी समिति तथा कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय निगरानी समिति कार्यान्वयन की देखरेख करती हैं।
  • जिला कार्ययोजनाएँ और निगरानी: जिला कार्ययोजनाएँ स्थानीय आवश्यकताओं की पहचान करती हैं, लक्ष्य और वार्षिक उपलब्धि-चरण निर्धारित करती हैं तथा संबंधित योजनाओं का अभिसरण सुनिश्चित करती हैं।
    • पीएम-डीडीकेवाई (PM-DDKY) डैशबोर्ड पर 121 संकेतकों के माध्यम से प्रगति पर नज़र रखी जाती है, जिनमें 74 आउटपुट संकेतक और 47 परिणाम संकेतक शामिल हैं।
    • आउटपुट संकेतकों के आधार पर जिला प्रदर्शन का आकलन करने के लिए मासिक रैंकिंग की जाती है।

पीएम-डीडीकेवाई की उपलब्धियाँ

  • संस्थागत ढाँचे की स्थापना: सभी 100 जिलों ने जिला कार्ययोजनाएँ (DAPs) तैयार कीं। जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी समितियों का गठन किया गया।
  • जिलों के प्रदर्शन में सुधार: छह उद्देश्यों के अंतर्गत जिलों का औसत स्कोर अप्रैल 2026 के 18.85 से बढ़कर अगस्त 2026 में 46.89 हो गया, यानी 28.04 अंकों की वृद्धि हुई।
  • निगरानी को सशक्त बनाना: नवंबर 2025 में मासिक जिला रैंकिंग शुरू हुई। सभी 100 जिलों ने अगस्त 2026 तक के आउटपुट आँकड़े तथा वित्त वर्ष 2025–26 के परिणाम संबंधी आँकड़े प्रस्तुत किए।
  • किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) का विकास और बाज़ार संपर्क: दिसंबर 2025 में आयोजित पीएम-डीडीकेवाई एफपीओ संगम में 15 राज्यों और 33 जिलों के 72 से अधिक किसान उत्पादक संगठन शामिल हुए। सफल उदाहरणों में शामिल हैं:
    • गढ़चिरोली (महाराष्ट्र): 3 टन प्रति घंटे की क्षमता वाली चावल प्रसंस्करण इकाई, 900 मीट्रिक टन का गोदाम तथा ₹1.24 करोड़ का कारोबार।
    • तुमकुरु (कर्नाटक): टिपटूर एफपीओ ने ₹1.60 करोड़ का कारोबार दर्ज किया।
    • जैसलमेर (राजस्थान): 2,000 एकड़ में एकीकृत कीट प्रबंधन आधारित जीरा की खेती तथा 500 एकड़ में सौर ऊर्जा संचालित सिंचाई।
    • सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की भागीदारी: सार्वजनिक उद्यम विभाग ने वित्त वर्ष 2026–27 और 2027–28 के लिए केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) गतिविधियों के अंतर्गत पीएम-डीडीकेवाई जिलों को अपनाने को शामिल किया।

चुनौतियाँ और सुधार के क्षेत्र

  • असमान प्रगति: सुधार के बावजूद जिलों का औसत स्कोर 46.89 है। सिंचाई (4.91) और कटाई के बाद भंडारण (5.19) पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • समन्वय संबंधी चुनौतियाँ: 11 मंत्रालयों/विभागों की 36 केंद्रीय योजनाओं तथा राज्य की योजनाओं के अभिसरण के कारण अनुमोदन, धनराशि जारी करने और कार्यान्वयन में देरी हो सकती है।
  • कार्यान्वयन और अवसंरचना संबंधी कमियाँ: जिला स्तर पर क्षमता, तकनीकी विशेषज्ञता, सिंचाई, भंडारण तथा ऋण तक पहुँच में अंतर कार्यान्वयन को प्रभावित कर सकता है।
  • दीर्घकालिक साक्ष्यों का अभाव: डैशबोर्ड के स्कोर में सुधार आवश्यक नहीं कि अधिक कृषि उत्पादकता या किसानों की आय में वृद्धि को भी दर्शाए। उपलब्ध सफलता की कहानियाँ सीमित हैं तथा दीर्घकालिक परिणामों का आकलन किया जाना अभी बाकी है।

आगे की राह

  • जिला-विशिष्ट नियोजन को सुदृढ़ बनाना: स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों, मृदा स्वास्थ्य, जल की उपलब्धता और किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप हस्तक्षेप सुनिश्चित करना तथा पंचायती राज संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी बढ़ाना।
  • समन्वय और वित्तपोषण में सुधार: जिला कार्ययोजनाओं को राज्य की योजनाओं में समय पर शामिल करना, धनराशि शीघ्र जारी करना तथा कार्यान्वयन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना।
  • अवसंरचना और बाज़ार तक पहुँच का विस्तार: सूक्ष्म सिंचाई, वैज्ञानिक भंडारण, किसान उत्पादक संगठनों के नेतृत्व में प्रसंस्करण, संस्थागत ऋण और प्रत्यक्ष बाज़ार संपर्क को प्राथमिकता देना तथा सफल जिला मॉडलों को अन्य जिलों में अपनाना।
  • मापनीय परिणामों पर ध्यान देना: नियमित निगरानी और स्वतंत्र मूल्यांकन के माध्यम से कृषि उत्पादकता, किसानों की आय, फसल सघनता, सिंचाई कवरेज तथा कटाई के बाद होने वाली हानि का आकलन करना।
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