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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा नियोजन, संसाधनों को जुटाने, संवृद्धि, विकास और रोजगार से संबंधित विषय; बुनियादी ढाँचा; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी—विकास और अनुप्रयोग तथा रोजमर्रा के जीवन पर उनके प्रभाव।
संदर्भ: नीति आयोग के फ्रंटियर टेक हब ने राज्यों को अवसंरचना की तैयारी, संसाधनों की सतत उपलब्धता और दीर्घकालिक आर्थिक मूल्य के आधार पर डेटा सेंटर निवेश का मूल्यांकन करने में सहायता देने के लिए एक फ्रेमवर्क जारी किया है।
फ्रेमवर्क की आवश्यकता
• तेजी से विस्तार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग की माँग के कारण भारत की डेटा सेंटर क्षमता वर्ष 2020 में लगभग 375 मेगावाट से बढ़कर लगभग 1.5 गीगावाट हो गई है।
• संसाधनों पर दबाव: डेटा सेंटरों को पर्याप्त मात्रा में बिजली, पानी, भूमि, कनेक्टिविटी और सहायक अवसंरचना की आवश्यकता होती है, जिससे स्थानीय संसाधनों और उनके मौजूदा उपयोगकर्ताओं पर दबाव पड़ सकता है।
• निवेश के लिए तैयारी: राज्यों को केवल निवेश घोषणाओं को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा करने के बजाय, सार्वजनिक सहायता देने की प्रतिबद्धता जताने से पहले अवसंरचना संबंधी कमियों, संसाधनों की उपलब्धता और आर्थिक लाभों का आकलन करना आवश्यक है।
फ्रेमवर्क के बारे में
• उद्योग जगत, इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), विद्युत मंत्रालय तथा उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के सुझावों के साथ नीति आयोग के फ्रंटियर टेक हब द्वारा विकसित यह रूपरेखा डेटा सेंटर प्रस्तावों के मूल्यांकन के लिए समान मानदंड प्रदान करती है।
• यह पाँच स्तंभों के आधार पर परियोजनाओं का आकलन करती है:
- विद्युत और ऊर्जा: ग्रिड की तैयारी, अवसंरचना का विस्तार, नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और ऊर्जा दक्षता।
- जल और शीतलन: दीर्घकालिक जल उपलब्धता, नदी बेसिन स्तर पर जल संकट, शीतलन प्रौद्योगिकियाँ और मौजूदा उपयोगकर्ताओं के हितों की सुरक्षा।
- स्थल चयन और पर्यावरणीय सततता: स्थल की उपयुक्तता, जलवायु एवं सामुदायिक जोखिम, अपशिष्ट प्रबंधन और परियोजना को बंद करने की प्रक्रिया।
- आर्थिक और रणनीतिक मूल्य: शुद्ध आर्थिक योगदान, घरेलू खरीद, रोजगार, कौशल तथा अनुसंधान एवं विकास।
- नीति, शासन और कार्यान्वयन: स्पष्ट उत्तरदायित्व, अनुमोदन प्रक्रियाओं को सरल बनाना, निगरानी और जवाबदेही।
• फ्रेमवर्क की प्रकृति: यह निर्णय लेने में सहायता देने वाला एक साधन है, न कि एक समान नियामक आदेश। राज्य अपनी प्राथमिकताओं और संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार इसके सिद्धांतों को अपना सकते हैं, जबकि केंद्र समान मानकों, मार्गदर्शन और प्रारूपों के माध्यम से इसके कार्यान्वयन में सहायता कर सकता है।
प्रमुख सिफारिशें
• अवसंरचना की तैयारी का सत्यापन: अतिरिक्त क्षमता को मंजूरी देने से पहले परिसर स्तर पर बिजली की माँग, ग्रिड के विस्तार और ग्रिड से ली जाने वाली शुद्ध बिजली का आकलन किया जाना चाहिए। 20 मेगावाट से अधिक क्षमता वाली सुविधाओं के लिए, लागू ग्रिड कोड की आवश्यकताओं के अधीन, रूपरेखा स्वचालित माँग-प्रतिक्रिया प्रणाली के लिए तैयारी की सिफारिश करती है।
• जल संसाधनों की सुरक्षा: 20–30 वर्षों की अवधि के लिए मौसमी जलग्रहण क्षेत्र का जल संतुलन तैयार किया जाना चाहिए, जल की प्रतिस्पर्धी माँगों का आकलन किया जाना चाहिए तथा मौजूदा उपयोगकर्ताओं के हितों की रक्षा की जानी चाहिए। जल संकट वाले क्षेत्रों में उपचारित अपशिष्ट जल, वर्षा जल संचयन और जहाँ संभव हो, समुद्री जल के विलवणीकरण पर विचार किया जाना चाहिए।
• सतत स्थानों की योजना बनाना: भूमि, बिजली, पानी और कनेक्टिविटी का आकलन करने के बाद डेटा सेंटरों के लिए उपयुक्त क्षेत्र विकसित किए जाने चाहिए। दीर्घकालिक जलवायु एवं सामुदायिक जोखिमों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए तथा इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट, बैटरियों और परियोजना को बंद करने के लिए संपूर्ण जीवनचक्र संबंधी योजनाएँ अनिवार्य की जानी चाहिए।
• प्रोत्साहनों को मापने योग्य परिणामों से जोड़ना: राज्य की सहायता की लागत घटाने के बाद आर्थिक लाभों का आकलन किया जाना चाहिए तथा प्रोत्साहनों को रोजगार, घरेलू खरीद, नवीकरणीय ऊर्जा, संसाधन दक्षता और तकनीकी क्षमता से संबंधित सत्यापन योग्य लक्ष्यों से जोड़ा जाना चाहिए।
• शासन और निगरानी में सुधार: समय-सीमा आधारित डिजिटल सिंगल-विंडो मंजूरी प्रणाली और राज्यवार डेटा सेंटर अनुमोदन मैट्रिक्स स्थापित किया जाना चाहिए। परियोजना संबंधी प्रतिबद्धताओं की निगरानी को मजबूत किया जाना चाहिए तथा लागू भारतीय मानकों के अनुरूप विद्युत उपयोग प्रभावशीलता (PUE), जल उपयोग प्रभावशीलता (WUE) और कार्बन उपयोग प्रभावशीलता (CUE) के मापन एवं रिपोर्टिंग को मानकीकृत किया जाना चाहिए।
महत्त्व एवं अपेक्षित परिणाम
• निवेश को सुगम बनाना: अवसंरचना संबंधी कमियों की समय रहते पहचान करने से कार्यान्वयन संबंधी जोखिमों को कम किया जा सकता है और परियोजनाओं की मंजूरी में पूर्वानुमेयता बढ़ाई जा सकती है।
• संसाधनों की सततता: बिजली, पानी और पर्यावरण संबंधी बाधाओं का अग्रिम आकलन स्थानीय अवसंरचना और समुदायों की सुरक्षा में सहायता कर सकता है।
• आर्थिक एवं तकनीकी लाभ: प्रदर्शन से जुड़े प्रोत्साहन और घरेलू भागीदारी में वृद्धि से रोजगार, नवाचार, स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास तथा एक बेहतर घरेलू डेटा सेंटर पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिल सकता है।
