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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना,  संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय; समावेशी विकास तथा उससे संबंधित विषय।

अंतर्वाह में अभूतपूर्व वृद्धि

संदर्भ: भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) की विशेष अमेरिकी डॉलर–भारतीय रुपया विदेशी मुद्रा विनिमय सुविधा के माध्यम से 21 अगस्त 2026 तक 72.85 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है। इस सुविधा का उद्देश्य विदेशी मुद्रा की तरलता बढ़ाना, घरेलू तरलता को मजबूत करना तथा विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित परिस्थितियों को बनाए रखना है।

अन्य संबंधित जानकारी

  •  आरबीआई ने 8 जून 2026 को विशेष अमेरिकी डॉलर–भारतीय रुपया विदेशी मुद्रा विनिमय सुविधा शुरू की, जिसमें विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा, बाह्य वाणिज्यिक उधारियां (ECBs) और विदेशी मुद्रा में विदेशी उधारियां (OFCBs) को शामिल किया गया।
  • 21 अगस्त 2026 तक, अधिकृत डीलर बैंकों ने कुल 72.85 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त होने की सूचना दी। इसमें विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा के माध्यम से 65.397 अरब डॉलर, विदेशी मुद्रा में विदेशी उधार के माध्यम से 4.860 अरब डॉलर, बाह्य वाणिज्यिक उधार के माध्यम से 2.591 अरब डॉलर दर्ज किए।
  •  कुल विदेशी मुद्रा प्राप्ति में विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा की हिस्सेदारी लगभग 90% रही, जिससे यह इस सुविधा के अंतर्गत विदेशी मुद्रा जुटाने का प्रमुख माध्यम बन गया।
  • 14 अगस्त 2026 को आरबीआई ने विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा जुटाने की अवधि को 30 सितंबर से घटाकर 31 अगस्त 2026 कर दिया। यह निर्णय उत्साहजनक प्रतिक्रिया और इसके परिणामस्वरूप प्राप्त विदेशी मुद्रा को देखते हुए लिया गया।

आरबीआई की अमेरिकी डॉलर–भारतीय रुपया विदेशी मुद्रा विनिमय सुविधा को समझना

  • विदेशी मुद्रा विनिमय क्या है?
  • विदेशी मुद्रा विनिमय में एक निश्चित अवधि के लिए मुद्राओं का आदान-प्रदान किया जाता है और भविष्य की एक पूर्व-निर्धारित तिथि तथा दर पर उस लेन-देन को विपरीत दिशा में करने का समझौता होता है।
  • इस सुविधा के अंतर्गत आरबीआई विदेशी मुद्रा प्राप्त करता है और बैंकों को रुपये की तरलता उपलब्ध कराता है, जबकि भविष्य में विदेशी मुद्रा वापस करने का संबंधित दायित्व स्वीकार करता है।
  • यह सुविधा कैसे काम करती है?
  • बैंक विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा, बाह्य वाणिज्यिक उधार और विदेशी मुद्रा में विदेशी उधार के माध्यम से पात्र विदेशी मुद्रा संसाधन जुटाते हैं और उन्हें आरबीआई के साथ विनिमय व्यवस्था में शामिल करते हैं।
  • रियायती शर्तों के कारण इन विदेशी मुद्रा संसाधनों के जोखिम से बचाव की प्रभावी लागत कम हो जाती है। इससे बैंकों को अतिरिक्त विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
  • नीतिगत उद्देश्य: यह सुविधा ऐसे समय शुरू की गई जब भारतीय रुपया और भारत के विदेशी मुद्रा भंडार दबाव में थे। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा की तरलता बढ़ाना, घरेलू तरलता को मजबूत करना, विदेशी मुद्रा बाजार को समर्थन देना था।
  • विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा का प्रभुत्व क्यों रहा: रियायती/शून्य-लागत जोखिम-प्रबंधन व्यवस्था और आकर्षक जमा दरों के संयोजन ने विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमाओं को बैंकों के लिए विशेष रूप से आकर्षक बना दिया। परिणामस्वरूप, कुल विदेशी मुद्रा प्राप्ति में इसका बहुत बड़ा हिस्सा रहा।

भारत के लिए महत्व

  • विदेशी मुद्रा की तरलता को मजबूत करना: इस सुविधा के माध्यम से पर्याप्त मात्रा में विदेशी मुद्रा संसाधन जुटाए गए हैं। इससे घरेलू वित्तीय प्रणाली में डॉलर की उपलब्धता बढ़ी है और भारत की बाह्य तरलता की स्थिति मजबूत हुई है।
  • बाह्य स्थिरता को समर्थन: अतिरिक्त विदेशी मुद्रा संसाधन बाह्य वित्तपोषण संबंधी दबावों और वैश्विक वित्तीय अस्थिरता के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं तथा भारत के मौजूदा विदेशी मुद्रा भंडार को अतिरिक्त समर्थन देते हैं।
  • रुपये पर दबाव कम करना: डॉलर की अधिक उपलब्धता से विदेशी मुद्रा की अत्यधिक मांग को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है और रुपये पर दबाव कम हो सकता है। हालांकि, यह सुविधा अपने आप में रुपये के मूल्य में वृद्धि की गारंटी नहीं देती है।
  • बैंकिंग प्रणाली की तरलता को समर्थन: इस विनिमय व्यवस्था के माध्यम से बैंक पात्र विदेशी मुद्रा संसाधनों के बदले रुपये की तरलता प्राप्त करते हैं। इससे घरेलू तरलता को समर्थन मिलता है और आरबीआई को विदेशी मुद्रा की तरलता के प्रबंधन में सहायता मिलती है।
  • बाह्य लचीलापन बढ़ाना: भारत के पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार के साथ अतिरिक्त विदेशी मुद्रा संसाधनों का जुटाया जाना बाहरी झटकों और अस्थिर पूंजी प्रवाह से निपटने की भारत की क्षमता को मजबूत करता है।

चिंताएँ और सीमाएँ

  • विदेशी मुद्रा भंडार में स्थायी वृद्धि नहीं: 72.85 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्ति को भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में स्थायी वृद्धि के समान नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि इस विनिमय व्यवस्था के तहत आरबीआई पर भविष्य में विदेशी मुद्रा लौटाने का संबंधित दायित्व भी बनता है।
  • दायित्व का घटक: विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) जमा और विदेशी मुद्रा में लिए गए उधार बैंकों की देनदारियाँ हैं। इसलिए बाह्य क्षेत्र पर इनके लाभ का आकलन करते समय इनकी परिपक्वता और पुनर्भुगतान संबंधी दायित्वों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
  • रियायती जोखिम-प्रबंधन की लागत: अनुकूल विनिमय शर्तों से आरबीआई पर एक लागत आती है। इंडियन एक्सप्रेस में उद्धृत एसबीआई रिसर्च के अनुमान के अनुसार, जोखिम-प्रबंधन की संभावित लागत जुटाई गई राशि की लगभग 15% हो सकती है। हालांकि, यह केवल एक अनुमान है और इसे आरबीआई की आधिकारिक लागत नहीं माना जाना चाहिए।
  • सीमित स्थायित्व: असाधारण रूप से बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा जुटने का एक कारण अस्थायी रियायती सुविधा की आकर्षक शर्तें भी हैं। इसलिए विशेष सुविधा की अवधि समाप्त होने के बाद इसी स्तर पर विदेशी मुद्रा का प्रवाह जारी रहने की गारंटी नहीं मानी जा सकती।

आगे की राह

  • लक्षित नीतिगत साधन के रूप में उपयोग: विदेशी मुद्रा विनिमय को मुख्य रूप से बाहरी दबाव के समय प्रतिचक्रीय तरलता प्रबंधन के साधन के रूप में रखा जाना चाहिए। इसे विदेशी मुद्रा के संरचनात्मक स्रोतों के विकल्प के रूप में नहीं अपनाया जाना चाहिए।
  • संरचनात्मक विदेशी मुद्रा स्रोतों को मजबूत करना: भारत को निर्यात, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, प्रेषण और स्थिर दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह के माध्यम से विदेशी मुद्रा के टिकाऊ स्रोतों को बढ़ाना चाहिए, ताकि अस्थायी नीतिगत उपायों पर निर्भरता कम हो।
  • पारदर्शिता और जोखिम प्रबंधन को बढ़ावा देना: आरबीआई को विदेशी मुद्रा विनिमय परिचालनों से जुड़ी लागत, परिपक्वता अवधि और भविष्य के दायित्वों के संबंध में पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए तथा संबंधित तुलन-पत्रीय जोखिमों का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना चाहिए।
  • नीतिगत संतुलन बनाए रखना: भविष्य के नीतिगत हस्तक्षेपों में रुपये की स्थिरता, विदेशी मुद्रा की तरलता, घरेलू तरलता और वित्तीय प्रणाली की स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए तथा अस्थायी केंद्रीय बैंक सहायता पर अत्यधिक निर्भरता से बचना चाहिए।
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