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सामान्य अध्ययन-3: अंतरिक्ष के क्षेत्र में जागरूकता; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास एवं अनुप्रयोग और रोजमर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव।
संदर्भ: हाल ही में, नासा ने अपनी ‘चंद्रमा से मंगल’ (Moon-to-Mars) रणनीति में एक बड़े बदलाव की शुरुआत की, जिसके तहत चंद्रमा की कक्षा में स्थित अंतरिक्ष स्टेशन की योजनाओं को रद्द कर चंद्रमा की सतह पर एक बेस बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, साथ ही मंगल ग्रह के लिए परमाणु-ऊर्जा संचालित अंतरिक्ष यान की योजनाओं की दिशा में भी आगे बढ़ा जा रहा है।
अन्य संबंधित जानकारी

- नासा ने ‘लूनर गेटवे’ को स्थगित करके और इसके घटकों को अगले सात वर्षों में 20 बिलियन डॉलर के मून बेस के निर्माण की ओर निर्देशित करके अपने आर्टेमिस कार्यक्रम को पुनर्गठित किया है, जो कक्षीय अवसंरचना से सतह-आधारित निवास की ओर संक्रमण को दर्शाता है।
- यह बदलाव बढ़ती वैश्विक अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा के बीच किया गया है, विशेष रूप से चीन द्वारा 2030 तक मानवयुक्त चंद्रमा लैंडिंग के लक्ष्य को देखते हुए, जिसने चंद्र अन्वेषण में रणनीतिक तत्परता में तेजी ला दी है।
- इसके साथ ही, नासा ने 2028 तक परमाणु-ऊर्जा संचालित अंतरिक्ष यान, ‘स्पेस रिएक्टर-1 फ्रीडम’ को लॉन्च करने की योजना का भी अनावरण किया है, जो चंद्र मिशनों को भविष्य के मंगल अन्वेषण के साथ जोड़ता है और निवास एवं प्रणोदन प्रौद्योगिकियों पर दोहरे ध्यान का संकेत देता है।
परमाणु अंतरिक्ष याँ और गहन अंतरिक्ष तंत्र
- ‘स्पेस रिएक्टर-1 फ्रीडम’ मिशन परमाणु विद्युत प्रणोदन की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह एक ऐसी तकनीक है जो लंबी अवधि और ऊर्जा-कुशल गहन अंतरिक्ष मिशनों को सक्षम बनाती है, जहाँ सौर ऊर्जा की व्यवहार्यता कम हो जाती है।
- पारंपरिक रासायनिक रॉकेटों के विपरीत, परमाणु प्रणोदन निरंतर थ्रस्ट (प्रणोद) और यात्रा के समय में उल्लेखनीय कमी करता है, जिससे मंगल ग्रह के लिए मानवयुक्त मिशन अधिक सुरक्षित और साध्य हो जाते हैं।
- यह गहन अंतरिक्ष में सौर-विद्युत प्रणालियों से बेहतर प्रदर्शन करता है, जहाँ सूर्य के प्रकाश की कमी ऊर्जा उत्पादन को सीमित कर देती है। इस प्रकार, परमाणु प्रणालियाँ अंतरग्रहीय यात्रा के लिए एक विश्वसनीय आधार के रूप में स्थापित होती हैं।
- इस अंतरिक्ष यान से हेलीकॉप्टर जैसी हवाई प्रणालियों की तैनाती सहित उन्नत अन्वेषण क्षमताओं में उल्लेखनीय वृद्धि होने की अपेक्षा है, साथ ही यह भविष्य के मंगल मिशनों के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों का सत्यापन भी करेगा।
- इसके समानांतर, नासा की योजना चंद्रमा पर छोटे परमाणु रिएक्टर तैनात करने की है ताकि आवासों, रोवर्स, जीवन-रक्षक प्रणालियों और स्थानीय संसाधन उपयोग के लिए निर्बाध बिजली सुनिश्चित की जा सके, विशेष रूप से 14 दिन लंबी चंद्र रात्रि के दौरान।
- कुल मिलाकर, ये विकास एक गहन अंतरिक्ष रसद तंत्र की ओर संक्रमण को चिह्नित करते हैं, जहाँ परमाणु-ऊर्जा संचालित प्रणालियाँ पृथ्वी की कक्षा से परे निरंतर मानव और रोबोटिक उपस्थिति के महत्वपूर्ण आधार के रूप में कार्य करती हैं।
चंद्र बेस के बारे में
- प्रस्तावित चंद्र बेस को एक चरणबद्ध विकास रणनीति के माध्यम से अल्पकालिक मिशनों से दीर्घकालिक निवास की ओर परिवर्तित कर निरंतर मानवीय उपस्थिति सक्षम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
- प्रथम चरण (निर्माण-परीक्षण-सीखना): यह चरण ‘कमर्शियल लूनर पेलोड सर्विसेज’ (CLPS) जैसी पहलों के तहत रोबोटिक मिशनों पर केंद्रित है, ताकि गतिशीलता, संचार और ऊर्जा प्रौद्योगिकियों का परीक्षण किया जा सके।
- द्वितीय चरण (प्रारंभिक अवसंरचना): इसमें अर्ध-आवासीय प्रणालियों, रसद सहायता और ‘जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी’ (JAXA) जैसे भागीदारों के सहयोग से आवर्ती अंतरिक्ष यात्री मिशनों की स्थापना शामिल है।
- अंतिम चरण (स्थायी उपस्थिति): यह भारी अवसंरचना और कार्गो-क्षम लैंडिंग प्रणालियों के परिनियोजन की परिकल्पना करता है, जिससे ‘इतालवी अंतरिक्ष एजेंसी’ और ‘कनाडा अंतरिक्ष एजेंसी’ जैसे निकायों के सहयोग से दीर्घकालिक मानव प्रवास संभव हो सके।
- रोबोटिक प्रीकर्सर मिशन: स्थायी निवास से पहले स्थल की तैयारी, प्रणालियों के सत्यापन और क्रमिक अवसंरचना विकास में रोबोटिक प्रीकर्सरमिशन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
निहितार्थ
- स्थायी चंद्र बेस की ओर रुख और परमाणु प्रणोदन में प्रगति, उभरती अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ाती है तथा चंद्रमा को एक रणनीतिक भू-राजनीतिक सीमा के रूप में स्थापित करती है, विशेष रूप से अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में।
- यह प्रणोदन, ऊर्जा प्रणालियों और पुन: प्रयोज्य मिशन संरचनाओं में तकनीकी नवाचार को गति देता है, जिसके प्रत्यक्ष लाभ मंगल और गहन अंतरिक्ष अन्वेषण को प्राप्त होंगे।
- निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका एक वाणिज्यिक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के विस्तार का संकेत देती है, जो सेवा-आधारित और स्केलेबल मिशन मॉडलों द्वारा संचालित है।
- ‘लूनर गेटवे’ को रद्द करने से यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी जैसे पारंपरिक भागीदारों के लिए अनिश्चितता उत्पन्न हुई है, जबकि साथ ही इसने सतह अवसंरचना और रसद (लॉजिस्टिक्स) में नए अवसरों के द्वारा भी खोले हैं।
- इसके साथ ही, एक स्थायी चंद्र आधार निरंतर प्रयोगों, संसाधन उपयोग और चंद्र भू-विज्ञान की गहरी समझ के माध्यम से वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देता है, जबकि परमाणु प्रणोदन निरंतर अंतरग्रहीय संपर्क की नींव रखता है।
चंद्रमा से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय कानूनी ढाँचा
- बाह्य अंतरिक्ष संधि (1967): यह स्थापित करती है कि चंद्रमा का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा, संप्रभुता के दावों को नकारती है, और इसलिए अधिदेशित है कि अंतरिक्ष गतिविधियाँ अन्य देशों का उचित सम्मान करते हुए पूरी मानवता के लाभ के लिए होनी चाहिए।
- देयता अभिसमय (1972): इसके तहत प्रक्षेपण करने वाला देश पृथ्वी पर होने वाली क्षति के लिए पूर्णतः उत्तरदायी और अंतरिक्ष (चंद्रमा सहित) में होने वाली क्षति के लिए दोष-अनुसार उत्तरदायी होता है।
- पंजीकरण अभिसमय (1976): अंतरिक्ष गतिविधियों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए देशों को अपने अंतरिक्ष पिंडों का संयुक्त राष्ट्र (UN) के पास पंजीकरण करना आवश्यक है।
- चंद्रमा समझौता (1979): यह चंद्रमा और उसके संसाधनों को ‘मानवता की साझा विरासत’ घोषित करता है और संसाधन दोहन के अंतर्राष्ट्रीय विनियमन का आह्वान करता है, हालांकि इसकी स्वीकार्यता सीमित है।
- संयुक्त राष्ट्र परमाणु ऊर्जा सिद्धांत (1992): ये गैर-बाध्यकारी दिशा-निर्देश की पेशकश करते हैं जो बाह्य अंतरिक्ष मिशनों में परमाणु ऊर्जा स्रोतों के सुरक्षित, पारदर्शी और परामर्शदात्री उपयोग को सुनिश्चित करते हैं।
- आर्टेमिस समझौता (2020): यह एक गैर-बाध्यकारी गठबंधन-आधारित ढांचे के माध्यम से पारदर्शिता, अंतःक्रियाशीलता, सुरक्षा क्षेत्र और जिम्मेदार संसाधन उपयोग को बढ़ावा देता है।
- भारत की स्थिति: भारत बाह्य अंतरिक्ष संधि और आर्टेमिस समझौते (2023) का हस्ताक्षरकर्ता है, लेकिन चंद्रमा समझौते का हिस्सा नहीं है। भारत चंद्रयान जैसे स्वतंत्र मिशनों के माध्यम से एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाता है और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए भी तत्पर रहता है।
