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सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक महत्व, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और मूल ढाँचा।
संदर्भ: सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) और 21 के तहत पैदल चलने वालों के फुटपाथ पर चलने के अधिकार को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी, और यह स्पष्ट किया कि इस अधिकार को मोटर चालित वाहनों के आवागमन पर पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
निर्णय की मुख्य विशेषताएं:
- पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग III के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है।
- पैदल चलने के मौलिक अधिकार में सुरक्षित, सीमांकित और सुव्यवस्थित फुटपाथों तक पहुँच का अधिकार भी शामिल है।
- ये अधिकार प्राथमिक हैं और इन्हें मोटर चालित वाहनों की आवाजाही पर प्राथमिकता दी जाएगी।
- यदि कोई सड़क मौजूद है, तो यह सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों का कर्तव्य है कि पैदल चलने वालों के लिए सीमांकित और रखरखाव युक्त फुटपाथ उपलब्ध हों।
- इन कर्तव्यों के पालन के लिए शहरी विकास प्राधिकरण, नगर निगम, नगरपालिकाएं और पंचायतें जिम्मेदार हैं।
- इन प्राधिकारियों को फुटपाथों और पैदल यात्री बुनियादी ढांचे को सीमांकित करने, निर्माण करने, रखरखाव करने और सुरक्षित रखने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
- सीमांकित फुटपाथों पर पैदल चलने के अधिकार का उल्लंघन होने पर नागरिक प्रतिस्थापन और मुआवजे के लिए संवैधानिक और कानूनी उपचार अपनाने के हकदार होंगे।
- ऐसे कानूनी उपचार ‘मोटर वाहन अधिनियम, 1988’ के अंतर्गत उपलब्ध उपचारों से स्वतंत्र हैं।
- न्यायालय ने कहा कि ‘मोटर वाहन अधिनियम, 1988’ पैदल चलने के मौलिक अधिकार को न तो मान्यता देता है और न ही उसकी सुरक्षा करता है, तथा यह अधिनियम मुख्य रूप से वाहन-केंद्रित है।
- न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि तीव्र शहरीकरण और बढ़ते मोटर चालित परिवहन ने पैदल चलने वालों को हाशिए पर पहुँचा दिया है, जबकि फुटपाथों को मोटर वाहनों की जरूरतों के अधीन कर दिया गया है।
- न्यायालय ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि निरंतर निगरानी के लिए इस मामले का नाम बदलकर संदर्भ: पैदल चलने का मौलिक अधिकार और फुटपाथ) “Re: Fundamental Right to Walk and Footpath”) कर दिया जाए।
चलने के अधिकार की संवैधानिक मान्यता
- न्यायालय ने माना कि पैदल चलने का अधिकार निम्नलिखित अनुच्छेदों का अभिन्न अंग है:
- अनुच्छेद 19(1)(d): भारत के पूरे राज्यक्षेत्र में अबाध संचरण का अधिकार।
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार।
- अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
- अनुच्छेद 19(1)(b): शांतिपूर्वक सम्मेलन करने का अधिकार।
- अनुच्छेद 19(1)(c): संगम या संघ बनाने का अधिकार।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि चलना “मानवीय गतिविधियों में सबसे सरल गतिविधि” है और यह जीवन से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
- न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि भारत में पैदल चलने की गहरी सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और सुधारात्मक जड़ें हैं।
- न्यायालय के अनुसार, अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत संचरण का प्राथमिक अधिकार ‘पैदल चलने का मौलिक अधिकार’ है; यह एक ऐसा अधिकार है जो पहियों (वाहनों) पर चलने के अधिकार से पहले आता है।
चलने के अधिकार के संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुझाए गए सुधार
- पैदल यात्रियों के अधिकारों हेतु वैधानिक ढांचा: न्यायालय ने पैदल चलने के अधिकार को औपचारिक रूप से मान्यता देने और सुरक्षित करने, जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करने, उल्लंघन के लिए त्वरित उपाय प्रदान करने और पैदल यात्रियों के अधिकारों के प्रवर्तन को मजबूत करने के लिए एक व्यापक कानून बनाने का आह्वान किया है।
- समर्पित विनियामक निकाय का गठन: न्यायालय ने पैदल यात्री बुनियादी ढांचे की योजना बनाने, पैदल यात्रियों के अधिकारों को लागू करने और पैदल चलने के अधिकार से संबंधित नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए एक पूर्णकालिक विनियामक प्राधिकरण स्थापित करने की सिफारिश की।
- प्रमुख मंत्रालयों को निर्देश: न्यायालय ने निर्देश दिया कि इस निर्णय की एक प्रति उचित कार्रवाई के लिए आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, तथा सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को भेजी जाए।
- भारतीय विधि आयोग को संदर्भ: यह निर्णय भारतीय विधि आयोग को भी भेजा गया है ताकि वे पैदल यात्रियों के अधिकारों की रक्षा करने, उत्तरदायी निकायों की पहचान करने और प्रभावी उपचार प्रदान करने वाले वैधानिक ढांचे की आवश्यकता की जांच कर सकें।
