संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन 1: भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ, भारत की विविधता; सामाजिक सशक्तिकरण, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद और धर्मनिरपेक्षता।
सामान्य अध्ययन 2: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और मूल ढाँचा।
संदर्भ: हाल ही में, उच्चतम न्यायालय ने सबरीमाला पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता में एक नौ-न्यायाधीशों की पीठ को अधिसूचित किया।
अन्य संबंधित जानकारी
• यह नौ-न्यायाधीशों की पीठ केवल सबरीमाला विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक धार्मिक प्रथाओं से जुड़े विषयों की जांच कर रही है। इस सुनवाई का असर विभिन्न धर्मों (मुस्लिम और जैन सहित) की धार्मिक प्रथाओं से जुड़े समान विवादों पर भी पड़ेंगे।
• मुख्य न्यायाधीश (CJI) के अतिरिक्त, इस पीठ में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची शामिल हैं।
• यह संदर्भ 2018 के सबरीमाला निर्णय से उपजे व्यापक संवैधानिक मुद्दों से संबंधित है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता और समानता एवं गरिमा के अधिकार के बीच संतुलन, तथा ‘अनिवार्य धार्मिक कार्यों’ में न्यायिक समीक्षा की सीमा तय करना शामिल है।
सबरीमाला निर्णय के बारे में
• 28 सितंबर, 2018 को उच्चतम न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से ‘केरल हिंदू सार्वजनिक उपासना स्थल (प्रवेश अनुमति) नियमावली, 1965’ के नियम 3(b) को रद्द कर दिया और महिलाओं के प्रवेश पर आयु-आधारित प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित करते हुए हटा दिया।
• यह मामला 2006 में ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ द्वारा दायर एक याचिका के माध्यम से न्यायपालिका तक पहुँचा था, जिसमें इस प्रतिबंध को संविधान के तहत महिलाओं के समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी गई थी।
• उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि नियम 3(b), संविधान के साथ-साथ ‘केरल हिंदू सार्वजनिक उपासना स्थल (प्रवेश अनुमति) अधिनियम, 1965’ की धारा 3 और धारा 4 के अधिकार-बाह्य (Ultra Vires) है, जो किसी भी हिंदू के विरुद्ध वर्ग या अनुभाग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं।
• न्यायालय ने महिलाओं के बहिष्कार को “आधिपत्यवादी पितृसत्ता” के एक रूप के तौर पर वर्णित किया और कहा कि मासिक धर्म जैसी जैविक और शारीरिक विशेषताओं के आधार पर बहिष्कार असंवैधानिक है, जो महिलाओं की समानता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करता है।
• आधिपत्यवादी से तात्पर्य उस व्यवस्था से है जहाँ पितृसत्तात्मक मानदंड इतने गहरे समाहित हो जाते हैं कि भेदभाव स्वाभाविक प्रतीत होने लगता है, जिससे महिलाएँ भी ऐसे पूर्वाग्रहों को आत्मसात कर लेती हैं और उन्हें बढ़ावा देने लगती हैं।
• उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि मासिक धर्म की अशुद्धता और प्रदूषण की धारणाओं के आधार पर महिलाओं का बहिष्कार, अस्पृश्यता के एक रूप के समान है और महिलाओं के कलंकित होने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है।
• न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भगवान अयप्पा के भक्त एक अलग धार्मिक संप्रदाय नहीं हैं, बल्कि वे व्यापक हिंदू समुदाय का हिस्सा हैं।
• न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि यदि रीति-रिवाजों और व्यक्तिगत कानूनों को न्यायिक प्रतिरक्षा प्रदान की गई, तो यह संविधान की सर्वोच्चता और उसके मौलिक अधिकारों के ढांचे को कमजोर करेगा।
• न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने बहुमत की राय से असहमति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि न्यायालयों को धर्म पर तर्कशीलता लागू नहीं करनी चाहिए और ‘अनिवार्य प्रथाओं’ का निर्धारण स्वयं धर्म द्वारा किया जाना चाहिए, न कि न्यायाधीशों द्वारा।
• उन्होंने जोर दिया कि अनुच्छेद 25 विभिन्न संप्रदायों की अपने रीति-रिवाजों का पालन करने की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जिसके लिए मौलिक अधिकारों और धार्मिक विश्वासों के बीच सामंजस्य स्थापित करना आवश्यक है।
महिलाओं के प्रवेश के विरोध में तर्क
• रूढ़िवादी परंपराएं: सबरीमाला मंदिर लंबे समय से चली आ रही धार्मिक परंपराओं का पालन करता है। त्रावणकोर देवासम बोर्ड ने तर्क दिया कि महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करना इन परंपराओं का एक अनिवार्य हिस्सा है।
- चूंकि भगवान अयप्पा की पूजा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ के रूप में की जाती है, इसलिए यह दावा किया गया कि यह अपवर्जन एक उचित और अभिन्न धार्मिक प्रथा है।
• धार्मिक स्वतंत्रता: यह तर्क दिया गया कि सबरीमाला एक ‘धार्मिक संप्रदाय’ है, जिसे अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षण प्राप्त है। यह अनुच्छेद धार्मिक संप्रदायों को अपने आंतरिक धार्मिक कार्यों के प्रबंधन के अधिकार की गारंटी देता है।
• वैधानिक समर्थन: ‘केरल हिंदू सार्वजनिक उपासना स्थल (प्रवेश अनुमति) नियमावली, 1965’ के नियम 3(b) ने रीति-रिवाजों के आधार पर अपवर्जन की अनुमति देकर इसे कानूनी समर्थन प्रदान किया था, जिसमें कुछ विशेष आयु वर्ग की महिलाओं पर प्रतिबंध लगाना शामिल था।
• न्यायिक मिसाल: ‘ऋतु प्रसाद शर्मा बनाम असम राज्य’ मामले का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित धार्मिक प्रथाएं अन्य मौलिक अधिकारों के आधार पर दी जाने वाली चुनौतियों से सुरक्षित हैं।
धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश के समर्थन में तर्क
• समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14): आयु और मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं का अपवर्जन (Exclusion) मनमाना और भेदभावपूर्ण है। यह अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15(1) (लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध) का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह लैंगिक रूढ़िवादिता और प्रणालीगत पूर्वाग्रहों को पुष्ट करता है।
• महिलाओं के लिए धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25): पुरुषों के समान ही महिलाओं को भी धर्म को मानने और आचरण करने का समान अधिकार है। प्रवेश से वंचित करना इस स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करता है, जिसे केवल सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के आधार पर ही उचित ठहराया जा सकता है।
• संवैधानिक नैतिकता का सिद्धांत: संवैधानिक नैतिकता यह अधिदेश देती है कि धार्मिक रीति-रिवाजों को समानता, गरिमा और स्वतंत्रता के मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। किसी भी उल्लंघनकारी प्रथा में सुधार किया जाना अनिवार्य है।
• गरिमा का अधिकार (अनुच्छेद 21): मासिक धर्म के आधार पर बहिष्कार महिलाओं को ‘अशुद्ध’ मानता है, जो उनकी मानवीय गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता को ठेस पहुँचाता है।
• अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं: न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि यह प्रतिबंध धर्म का कोई ‘अनिवार्य हिस्सा’ नहीं है। साथ ही, चूंकि अयप्पा भक्त एक अलग ‘धार्मिक संप्रदाय’ नहीं हैं, इसलिए इसे अनुच्छेद 26 के तहत सुरक्षा प्राप्त नहीं है।
• लैंगिक न्याय और सामाजिक प्रगति: महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देना लैंगिक न्याय, समावेशिता और सामाजिक सुधार को बढ़ावा देता है। यह धार्मिक प्रथाओं को विकसित होते लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकार मानकों के साथ संरेखित करता है।
आगे की राह
• मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन: समानता (अनुच्छेद 14, 15, 21) और धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) के मध्य एक सामंजस्यपूर्ण संतुलन सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि आस्था में अनुचित हस्तक्षेप किए बिना मानवीय गरिमा को अक्षुण्ण रखा जा सके।
• संवाद के माध्यम से संवैधानिक नैतिकता को बढ़ावा देना: प्रतिगामी प्रथाओं में सुधार के लिए न्यायपालिका, धार्मिक निकायों और नागरिक समाज के बीच संवाद को प्रोत्साहित करना चाहिए, साथ ही धार्मिक आस्था का सम्मान भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
• संवेदनशीलता के साथ प्रभावी कार्यान्वयन: अदालती फैसलों का समान रूप से प्रवर्तन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके लिए जागरूकता अभियानों की सहायता ली जाए ताकि प्रतिरोध को कम किया जा सके और लैंगिक समावेशन को बढ़ावा मिले।
Sources:
Live Law
The Hindu
Indian Express
The Hindu
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