मिशन मित्रा/ MITRA (अंतरसंचालनीय लक्षणों का मानचित्रण और प्रतिक्रिया मूल्यांकन )
संदर्भ: हाल ही में, इसरो (ISRO) ने मिशन मित्रा के लॉन्च की घोषणा की, जो गगनयान मिशन के डिजाइन और विकास में योगदान देगा।
मिशन मित्रा के बारे में
- मिशन मित्रा को लेह, लद्दाख में अंतरिक्ष उड़ान के अनुरूप कृत्रिम परिवेश में चालक दल के व्यवहार, प्रदर्शन और गतिशीलता की जांच के लिए शुरू किया गया है।
- इसका उद्देश्य ‘गगनयात्रियों’ और ग्राउंड-कंट्रोल टीमों के बीच टीम अंतर-संचालनीयता में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि विकसित करना और चरम पर्यावरणीय एवं परिचालन स्थितियों के तहत उनकी निर्णय लेने की प्रभावशीलता का आकलन करना है।
- इसे इसरो के मानव अंतरिक्ष उड़ान केंद्र (HSFC) द्वारा एयरोस्पेस मेडिसिन संस्थान (भारतीय वायु सेना) और प्रोटोप्लैनेट प्राइवेट लिमिटेड, बेंगलुरु के सहयोग से लॉन्च किया गया है।
- इस मिशन में, इसरो लद्दाख के अत्यंत चुनौतीपूर्ण वातावरण—जो अत्यधिक ऊंचाई (समुद्र तल से लगभग 3,500 मीटर), वर्ष में छह महीने से अधिक समय तक शून्य से नीचे का तापमान और कम आर्द्रता द्वारा चिन्हित है—का उपयोग कर रहा है और इसे मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशनों के लिए ‘अंतरिक्ष-तुल्य’ परीक्षण स्थल के रूप में नियोजित कर रहा है।
गगनयान मिशन के बारे में
- गगनयान परियोजना का उद्देश्य 3 सदस्यीय चालक दल को 400 किलोमीटर की कक्षा में 3 दिवसीय मिशन के लिए प्रक्षेपित करके और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाकर मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता का प्रदर्शन करना है।
- यह भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञता को एकीकृत करता है। इसकी प्रमुख आवश्यकताओं में मानव-रेटेड प्रक्षेपण यान, जीवन रक्षक प्रणाली, आपातकालीन निकास प्रावधान और चालक दल प्रबंधन शामिल हैं।
- वास्तविक मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन को क्रियान्वित करने से पहले प्रौद्योगिकी तत्परता स्तरों को प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न पूर्ववर्ती मिशनों की योजना बनाई गई है, जिनमें एकीकृत एयर ड्रॉप परीक्षण (IADT), पैड एबॉर्ट टेस्ट (PAT) और परीक्षण यान (TV) उड़ानें शामिल हैं।
साधना सप्ताह 2026
संदर्भ: अपनी तरह की पहली राष्ट्रीय पहल के रूप में, क्षमता निर्माण आयोग ने साधना सप्ताह 2026 (2–8 अप्रैल) का शुभारंभ किया, जो भारत की सिविल सेवाओं में सबसे बड़ी सहयोगी क्षमता-निर्माण पहलों में से एक है।
साधना सप्ताह के बारे में
- साधना सप्ताह मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत एक पहल है, जिसे ‘सिविल सेवा क्षमता निर्माण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम’ के रूप में भी जाना जाता है।
- इसका उद्देश्य नागरिक-केंद्रित शासन के लिए दक्षताओं का निर्माण करना है, जिसका मुख्य केंद्र अनुकूलन विकास और मानवीय अभिरुचि पर है।
- इस कार्यक्रम का आयोजन कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT), क्षमता निर्माण आयोग और ‘कर्मयोगी भारत’ द्वारा किया गया है।
- यह उत्तरदायी शासन को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय मंत्रालयों, राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और प्रशिक्षण संस्थानों को एक साझा मंच पर लाता है।
- यह पहल तीन प्रमुख सूत्रों—प्रौद्योगिकी, परंपरा, और मूर्त परिणाम द्वारा निर्देशित है, जो विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
- यह iGOT कर्मयोगी प्लेटफॉर्म के माध्यम से सीखने के विविध मार्ग प्रदान करता है, जिसमें सामूहिक चर्चा, विषयगत वेबिनार और विभिन्न प्रशिक्षण संस्थानों द्वारा आयोजित व्यावहारिक कार्यशालाएं शामिल हैं।
- इस पहल का मुख्य ध्यान नेतृत्व, संचार, डेटा विश्लेषण, परियोजना प्रबंधन और डिजिटल गवर्नेंस जैसी मुख्य दक्षताओं को बढ़ाने पर है।
FAO खाद्य मूल्य सूचकांक
संदर्भ: हाल ही में, मार्च 2026 में एफएओ (FAO) खाद्य मूल्य सूचकांक में वृद्धि दर्ज की गई। इसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया संघर्ष से जुड़ी ऊर्जा लागतों में वृद्धि है, जिसने वैश्विक खाद्य कीमतों को बढ़ा दिया है।
एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक के बारे में
- यह एक मासिक संकेतक है जो प्रमुख खाद्य वस्तुओं की एक टोकरी (बास्केट) के अंतर्राष्ट्रीय मूल्य संचलन पर नज़र रखता है।
- इसे संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) द्वारा प्रकाशित किया जाता है।
- इसकी गणना उनके औसत निर्यात अंशों के आधार पर 5 वस्तु समूह सूचकांकों के भारित औसत के रूप में की जाती है: अनाज, वनस्पति तेल, डेयरी उत्पाद, मांस, चीनी।
- आधार वर्ष: 2014–16
- यह एक महत्वपूर्ण वैश्विक खाद्य मुद्रास्फीति संकेतक के रूप में कार्य करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय खाद्य बाजारों के रुझानों को दर्शाता है। इसका व्यापक रूप से वैश्विक खाद्य सुरक्षा स्थितियों, मुद्रास्फीति के दबाव और वस्तु बाजार की अस्थिरता का आकलन करने के लिए उपयोग किया जाता है।
खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के बारे में
- यह संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषज्ञ एजेंसी है जो भूख को समाप्त करने, पोषण में सुधार करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के वैश्विक प्रयासों का नेतृत्व करती है।
- इसका मुख्य उद्देश्य सभी के लिए खाद्य सुरक्षा प्राप्त करना है, ताकि सक्रिय और स्वस्थ जीवन के लिए पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन तक नियमित पहुंच सुनिश्चित हो सके।
- मुख्यालय: रोम, इटली
- सदस्यता: इसमें 195 सदस्य (194 देश + यूरोपीय संघ) शामिल हैं और यह दुनिया भर के 130 से अधिक देशों में कार्य करता है।
- यह संयुक्त राष्ट्र के अन्य निकायों जैसे विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) और अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) के साथ समन्वय में कार्य करता है।
FAO द्वारा प्रकाशित प्रमुख रिपोर्टें:
- विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति (SOFI)
- विश्व के वनों की स्थिति (SOFO)
- विश्व मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर की स्थिति (SOFIA)
- कृषि वस्तु बाजार की स्थिति (SOCO)
होर्मुज़ के पुनः खुलने के पश्चात् तेल उत्पादन बढ़ाएगा OPEC+
संदर्भ: जारी ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच, OPEC+ ने मई के लिए तेल उत्पादन को 206,000 बैरल प्रतिदिन बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है। हालांकि, यह वृद्धि होर्मुज जलडमरूमध्य के पुनः खुलने की शर्त पर आधारित है।
अन्य संबंधित जानकारी
- इस निर्णय को मुख्य रूप से प्रतीकात्मक या “सैद्धांतिक” माना जा रहा है, क्योंकि कई सदस्य देशों के पास युद्ध के कारण हुई बाधाओं और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे के कारण वर्तमान में उत्पादन बढ़ाने की क्षमता का अभाव है।
- होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने इतिहास में तेल आपूर्ति के सबसे बड़े व्यवधानों में से एक को जन्म दिया है, जिसके परिणामस्वरूप तेल की कीमतें $110–120 प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, यह वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में “सबसे बड़ा आपूर्ति व्यवधान” है।
पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (OPEC) और OPEC+ के बारे में
- यह 2016 में बना एक विस्तारित गठबंधन है जिसमें ओपेक के साथ-साथ रूस और कई मध्य एशियाई देशों जैसे गैर-ओपेक उत्पादक शामिल हैं।
- इसमें 12 ओपेक सदस्य और 10 अन्य प्रमुख गैर-ओपेक तेल निर्यातक देश (जैसे रूस, मैक्सिको और कजाकिस्तान) शामिल हैं।
- यह समूह आपूर्ति-मांग की गतिशीलता को संतुलित करने, तेल की कीमतों को प्रभावित करने और युद्ध या प्रतिबंधों जैसे भू-राजनीतिक व्यवधानों पर प्रतिक्रिया देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- ओपेक और ओपेक+ देश मिलकर वैश्विक तेल उत्पादन का लगभग 59% हिस्सा उत्पादित करते हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व
- यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है, जिसके माध्यम से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% और महत्वपूर्ण मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का पारगमन होता है।
- इसकी नाकेबंदी से विशेष रूप से चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हुई है।
2025–26 में भारत ने सर्वकालिक उच्च वार्षिक पवन ऊर्जा वृद्धि दर्ज की
संदर्भ: भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 6.05 GW की अपनी अब तक की सर्वाधिक वार्षिक पवन ऊर्जा क्षमता वृद्धि हासिल की है, जिससे कुल स्थापित क्षमता 56 GW से अधिक हो गई है।
अन्य संबंधित जानकारी
- वित्त वर्ष 2025-26 की वार्षिक वृद्धि ने वित्त वर्ष 2016-17 में दर्ज 5.5 GW क्षमता वृद्धि के पिछले कीर्तिमान को पीछे छोड़ दिया है।
- यह रिकॉर्ड वृद्धि 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता प्राप्त करने के भारत के व्यापक लक्ष्य को महत्वपूर्ण रूप से सुदृढ़ करती है।
- यह वृद्धि वित्त वर्ष 2024-25 की क्षमता की तुलना में लगभग 46% की वृद्धि दर्शाती है, जो भारत के तटवर्ती (onshore) पवन ऊर्जा परिनियोजन में निर्णायक तेजी का संकेत है।
भारत का पवन ऊर्जा परिदृश्य
- IRENA नवीकरणीय ऊर्जा सांख्यिकी 2025 (दिसंबर 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार) के अनुसार, पवन ऊर्जा क्षमता में भारत विश्व स्तर पर चौथे स्थान पर है।
- स्थापित विद्युत क्षमता में पवन ऊर्जा का योगदान लगभग 10.8% है और यह ग्रिड स्थिरता में सौर ऊर्जा के पूरक के रूप में भूमिका निभाती है।
- प्रमुख पवन ऊर्जा संपन्न राज्य: गुजरात (सबसे बड़ी हिस्सेदारी), तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र
क्षेत्र को प्रोत्साहित करने वाली सरकारी पहल
- ISTS पारेषण शुल्क में छूट
- रियायती सीमा शुल्क
- नवीकरणीय खरीद दायित्व (RPO/RCO)
- प्रतिस्पर्धी बोली ढांचा
उत्तर प्रदेश की शिवालिक तलहटी में भारत के पहले गौरेमी जीवाश्म की खोज
संदर्भ: वैज्ञानिकों ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में शिवालिक की पहाड़ियों में भारत के पहले गौरेमी मछली के जीवाश्म की खोज की है।
अन्य संबंधित जानकारी
- यह जीवाश्म लगभग 4.8 मिलियन वर्ष पुराना (प्लीओसीन युग) है, जो इसे इस क्षेत्र में मीठे पानी की मछली के सबसे शुरुआती अभिलेखों में से एक बनाता है।
- विशेष रूप से, यह विश्व स्तर पर ऐसा केवल दूसरा जीवाश्म है; इससे पहले ऐसा रिकॉर्ड सुमात्रा, इंडोनेशिया से प्राप्त हुआ था।
- इस खोज में गौरेमी, स्नेकहेड और गोबी जैसी कई मछली प्रजातियों के ओटोलिथ (Otoliths – कान की हड्डियाँ) शामिल हैं, जो प्राचीन जलीय जीवन के पुनर्निर्माण में सहायता करते हैं।
- ऐतिहासिक रूप से, इस क्षेत्र में जीवाश्मों की खोज में स्थलीय स्तनधारियों (जैसे हाथी, जिराफिड, मांसाहारी जीव) का दबदबा था, जबकि जलीय जीवन के प्रमाण बहुत कम थे।
- हालांकि, हालिया खोज हिमालय की तलहटी में मीठे पानी की जैव विविधता को उजागर करके इस दृष्टिकोण को चुनौती देती है।
खोज का महत्व
- पुरा-पर्यावरणीय इतिहास का पुनर्लेखन: यह स्थापित करता है कि शिवालिक क्षेत्र न केवल स्थलीय आवासों, बल्कि मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र का भी समर्थन करता था।
- जलवायु और पारिस्थितिकी में अंतर्दृष्टि: यह प्लीओसीन युग के दौरान एक आर्द्र और वनस्पतियों से समृद्ध वातावरण का संकेत देता है, जो जलवायु पुनर्निर्माण में सहायक है।
- हिमालयी विकास को समझना: यह यह पता लगाने में मदद करता है कि कैसे भूगर्भीय उत्थान और पर्यावरणीय परिवर्तनों ने जलीय परिदृश्यों को वर्तमान तलहटी में बदल दिया।
