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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: हाल ही में, नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने नई दिल्ली में वित्तीय वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2025) के लिए ‘ट्रेड वॉच क्वार्टरली’ का छठा संस्करण जारी किया।
ट्रेड वॉच क्वार्टरली के बारे में
- यह नीति आयोग का एक प्रमुख प्रकाशन है जो वैश्विक और घरेलू व्यापार प्रवृत्तियों, संरचनात्मक परिवर्तनों और भारत की व्यापार नीति के लिए उभरते अवसरों का डेटा-आधारित मूल्यांकन प्रदान करता है।
- यह रिपोर्ट विकसित होती वैश्विक गतिशीलता के संदर्भ में भारत के ‘वस्तु और सेवा व्यापार’ के प्रदर्शन का विश्लेषण करती है, जैसे कि वैश्विक व्यापार वृद्धि की धीमी किंतु सकारात्मक प्रवृत्ति, सेवाओं के नेतृत्व में विस्तार और वैश्विक व्यापार में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की बढ़ती भूमिका।
- प्रत्येक संस्करण में एक विषयगत फोकस क्षेत्र होता है जो विशिष्ट क्षेत्रों की गहन समझ प्रदान करता है।
- वित्तीय वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2025) का यह संस्करण इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापार पर केंद्रित है, जो निम्नलिखित पहलुओं का परीक्षण करता है:
- वैश्विक मांग की प्रवृत्तियां और भारत का निर्यात फुटप्रिंट
- वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में सहभागिता
- संरचनात्मक बाधाएं और नीतिगत अंतराल
- प्रतिस्पर्धात्मकता, मूल्यवर्धन और निर्यात को बढ़ावा देने हेतु हस्तक्षेप
- यह रिपोर्ट निर्यात विविधीकरण, ई-कॉमर्स व्यापार की संभावनाओं, ग्लोबल साउथ व्यापार एकीकरण और मूल्य-श्रृंखला के सुदृढ़ीकरण जैसे क्षेत्रों पर भविष्योन्मुखी नीतिगत अंतर्दृष्टि भी प्रदान करती है।
- यह सरकार, उद्योग, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं के लिए एक नीतिगत संसाधन के रूप में कार्य करती है, ताकि साक्ष्य-आधारित व्यापार रणनीति में सहायता के लिए दिया जा सके और भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाया जा सके।
प्रमुख निष्कर्ष
वैश्विक व्यापार के संदर्भ में:
- रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि 2025 के मध्य में वैश्विक व्यापार वृद्धि धीमी परन्तु किन्तु सकारात्मक बनी रही, जिसमें सेवाओं का प्रदर्शन वस्तुओं की तुलना में बेहतर रहा।
- यह वृद्धि उच्च कीमतों और पूर्वी एशिया तथा अफ्रीका जैसे विकासशील क्षेत्रों के बेहतर प्रदर्शन से प्रेरित थी।
- इस परिप्रेक्ष्य में, अप्रैल-सितंबर 2025 के दौरान भारत का कुल वस्तु और सेवा व्यापार वार्षिक आधार पर लगभग 5.1% बढ़ा। इसमें सेवाओं में निरंतर वृद्धि और चुनिंदा वस्तु श्रेणियों के कारण आयात की तुलना में निर्यात में तीव्र वृद्धि देखी गई।
भारत का व्यापार प्रदर्शन:
- वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद भारत की निर्यात गति ने समग्र व्यापार विस्तार को बनाए रखा।
- सेवा और वस्तु निर्यात दोनों में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई।
- वस्तु निर्यात का नेतृत्व इलेक्ट्रिकल मशीनरी, खनिज ईंधन, अनाज, ऑटोमोबाइल और कीमती पत्थरों द्वारा किया गया।
- स्मार्टफोन, गैर-बासमती चावल और यात्री वाहन प्रमुख विकास चालक के रूप में उभरे।
- आयात में खनिज ईंधन, इलेक्ट्रॉनिक्स, कीमती पत्थरों और उर्वरकों का वर्चस्व बना रहा।
- भारत ने हांगकांग, चीन, यूएई और अमेरिका जैसे बाजारों में मजबूत निर्यात वृद्धि दर्ज की, हालांकि आसियान क्षेत्र में धीमी वृद्धि देखी गई।
- एक प्रमुख संरचनात्मक प्रवृत्ति विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार का बढ़ना है, जो 2005 के बाद से लगभग चार गुना बढ़ गया है।
- भारत का व्यापार प्रक्षेपवक्र क्षेत्रीय मूल्य श्रृंखलाओं और नए व्यापार कॉरिडोर के माध्यम से इस ‘ग्लोबल साउथ पुनर्संतुलन’ के साथ तेजी से संरेखित हो रहा है।
व्यापार में ई-कॉमर्स का उदय:
- रिपोर्ट भविष्य में निर्यात वृद्धि के लिए ई-कॉमर्स की बढ़ती भूमिका को एक प्रमुख प्रवर्तक के रूप में रेखांकित करती है।
- भारत विश्व के शीर्ष छह ई-कॉमर्स बाजारों में से एक है, जिसमें ऑनलाइन खुदरा व्यापार में इलेक्ट्रॉनिक्स की बड़ी हिस्सेदारी है।
- यद्यपि ई-कॉमर्स निर्यात वर्तमान में सीमित है, लेकिन इनका तेजी से विस्तार होने का अनुमान है।
- लॉजिस्टिक्स दक्षता में सुधार, नियामक सुगमता और एमएसएमई (MSME) की बढ़ती भागीदारी के सहयोग से, 2030 तक ये भारत के वस्तु निर्यात में 20-30% का योगदान दे सकते हैं।
विषयगत फोकस: इलेक्ट्रॉनिक्स
- इलेक्ट्रॉनिक्स भारत के विनिर्माण और निर्यात रूपांतरण की आधारशिला बनकर उभरा है और अब यह भारत की निर्यात टोकरी की दूसरी सबसे बड़ी वस्तु है।
- वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मांग में भारत की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है, जिसका मुख्य कारण मोबाइल फोन का निर्यात है।
- पिछले एक दशक में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, जिसमें मोबाइल फोन, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार उपकरणों का प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा है।
- प्रमुख निर्यात बाजारों में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और यूएई शामिल हैं।
- यह क्षेत्र ऑटोमोटिव, नवीकरणीय ऊर्जा, टेलीकॉम, रक्षा और डिजिटल सेवाओं जैसे उद्योगों से अंतर्संबंधित है, जो इसे औद्योगिक विकास के लिए एक प्रभावशाली गुणक बनाता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स में संरचनात्मक चुनौतियां:
- अपेक्षित लाभ के बावजूद, रिपोर्ट महत्वपूर्ण संरचनात्मक बाधाओं पर प्रकाश डालती है, जैसे: सेमीकंडक्टर, इंटीग्रेटेड सर्किट, बैटरी और डिस्प्ले जैसे आयातित घटकों पर अत्यधिक निर्भरता।
- पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के प्रभुत्व वाली सघन अंतः-एशियाई इलेक्ट्रॉनिक्स मूल्य श्रृंखलाओं में सीमित भागीदारी।
- घरेलू विनिर्माण का मुख्य रूप से मोबाइल फोन असेंबली तक ही संकेंद्रित होना।
- अपेक्षाकृत संरक्षणवादी शुल्क संरचना, जो असेंबली का समर्थन तो करती है लेकिन घटक-प्रधान उत्पादन की लागत बढ़ा देती है।
- परिणामस्वरूप, भारत मूल्य श्रृंखला में गहनता से जुड़े हुए एकीकृत भागीदार के बजाय एक ‘अंतिम-बाजार आपूर्तिकर्ता’ के रूप में स्थापित है।
मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ना:
- असेंबली और सिस्टम एकीकरण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के बाद, भारत अब अपनी इलेक्ट्रॉनिक्स यात्रा के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है, जो घटक विनिर्माण और उच्च मूल्य संवर्धन की ओर संक्रमण है।
- इस संक्रमण को लक्षित नीतिगत उपायों का समर्थन प्राप्त है, जैसे:
- इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना
- सेमीकंडक्टर मिशन
- सीमा शुल्क युक्तिकरण
- ई-कॉमर्स निर्यात हेतु सहायता
- भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मकता वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मूल्य श्रृंखलाओं में गहरे एकीकरण पर निर्भर करेगी, जिसमें प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) डिजाइन, सेमीकंडक्टर असेंबली एवं टेस्टिंग, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और एम्बेडेड सिस्टम शामिल हैं।
भावी नीतिगत प्राथमिकताएं:
- रिपोर्ट इस बात पर बल देती है कि भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स रणनीति को ‘असेंबली-जनित’ लाभ से इकोसिस्टम-संचालित’ विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
- प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हैं:
- घरेलू घटक पारिस्थितिकी तंत्र और आरएंडडी (R&D) का सुदृढ़ीकरण।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और आपूर्तिकर्ता नेटवर्क बनाने के लिए ‘एंकर निवेश’ को प्रोत्साहित करना।
- लॉजिस्टिक्स दक्षता और शुल्क युक्तिकरण।
- नियामक सरलीकरण और निर्यात वित्त सहायता।
- पूर्वानुमानित घरेलू खरीद और मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) का बेहतर उपयोग।
- ये सुधार वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम बनने और वित्तीय वर्ष 2030 तक 500 बिलियन डॉलर के विनिर्माण लक्ष्य को प्राप्त करने की भारत की महत्वाकांक्षा में सहायक हो सकते हैं।
