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सामान्य अध्ययन-3: देश के विभिन्न भागों में प्रमुख फसलें एवं फसल पैटर्न, कृषि उपज का भंडारण, परिवहन एवं विपणन तथा उनसे संबंधित समस्याएँ एवं बाधाएँ; किसानों की सहायता हेतु ई-प्रौद्योगिकी का उपयोग।
संदर्भ: केंद्र सरकार ने ₹175.45 करोड़ की ‘मिशन गोल्डन स्पाइस’ पहल शुरू की है, जिसका उद्देश्य मेघालय की GI-टैग प्राप्त लाकाडोंग हल्दी को वैश्विक स्तर पर प्रीमियम मसाले के रूप में स्थापित करना, संपूर्ण मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना तथा किसानों की आय में वृद्धि करना है।
मिशन गोल्डन स्पाइस के बारे में

- मिशन गोल्डन स्पाइस ₹175.45 करोड़ की अभिसरण-आधारित पहल है, जिसे पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (MDoNER) द्वारा शुरू किया गया है।
- इसका उद्देश्य मेघालय की GI-टैग प्राप्त लाकाडोंग हल्दी का उत्पादन, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और विपणन को बढ़ावा देना है।
- इस परियोजना का आधिकारिक नाम “एकीकृत लाकाडोंग हल्दी मूल्य श्रृंखला संवर्धन परियोजना” है।
- अवधि: 5 वर्ष (2025–2030)।
- दो चरण:
- चरण-I: मूल्य श्रृंखला का सुदृढ़ीकरण।
- चरण-II: विस्तार एवं बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन।
- उद्देश्य: लाकाडोंग हल्दी के लिए एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र (Integrated Ecosystem) विकसित करना, जिसमें निम्नलिखित शामिल हों— खेती, संग्रहण, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, ट्रेसबिलिटी, विपणन, निर्यात
- वित्तपोषण पैटर्न:
- पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (MDoNER) एवं पूर्वोत्तर परिषद (NEC): ₹87.62 करोड़ (50%) अवसंरचना विकास हेतु।
- कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय: ₹58.10 करोड़ (33.1%) उत्पादन वृद्धि एवं जैविक प्रमाणन हेतु।
- मेघालय सरकार: ₹29.73 करोड़ (16.9%) ब्रांडिंग, किसान उत्पादक संगठन (FPO) की कार्यशील पूंजी, ब्लॉकचेन-आधारित GI ट्रेसबिलिटी तथा निर्यात प्रणाली के विकास हेतु।
- चरण-I की स्वीकृति: MDoNER ने पहले चरण के लिए ₹43.24 करोड़ की स्वीकृति प्रदान कर दी है।
- यह मिशन “अनलॉक द इकॉनोमिक पोटेंशियल ऑफ इंडियाज नार्थईस्ट (USP)” पहल का हिस्सा है। साथ ही, यह “अष्टलक्ष्मी विज़न” के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य पूर्वोत्तर के प्रत्येक राज्य के तुलनात्मक लाभ वाले एक विशिष्ट उत्पाद को राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देना है।
लाकाडोंग हल्दी के बारे में
- यह मेघालय के पूर्वी एवं पश्चिमी जैंतिया हिल्स में मुख्य रूप से उगाई जाने वाली एक प्रीमियम स्वदेशी हल्दी की किस्म है।
- इसे 30 मार्च 2024 को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त हुआ।
- यह अपने अत्यधिक उच्च प्राकृतिक करक्यूमिन स्तर के लिए प्रसिद्ध है, जो लगभग 7–12% होता है, जबकि अधिकांश पारंपरिक हल्दी किस्मों में यह केवल 2–3% होता है।
- उच्च करक्यूमिन स्तर के कारण इसमें औषधीय, न्यूट्रास्यूटिकल, एंटीऑक्सीडेंट तथा पाक दृष्टि से अधिक मूल्य होता है, जिससे यह भारत की सर्वोत्तम हल्दी किस्मों में से एक मानी जाती है।
- इसकी विशिष्ट गुणवत्ता मेघालय की विशेष कृषि-जलवायु परिस्थितियों) से जुड़ी हुई है। अन्य स्थानों पर इसकी खेती के प्रयासों में अपेक्षाकृत कम करक्यूमिन स्तर पाया गया है।
- इस फसल का उत्पादन मुख्यतः लघु एवं सीमांत किसानों द्वारा किया जाता है तथा लगभग 99% उत्पादक महिलाएँ हैं। इसलिए यह महिला-नेतृत्व वाली ग्रामीण आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
- GI टैग लाकाडोंग हल्दी की भौगोलिक उत्पत्ति, प्रामाणिकता, पारंपरिक खेती पद्धतियों तथा गुणवत्ता मानकों की रक्षा करता है और इसके नाम के दुरुपयोग, जालसाजी एवं अनधिकृत उपयोग को रोकता है।
- लाकाडोंग हल्दी में जैविक खाद्य, न्यूट्रास्यूटिकल, औषधि तथा निर्यात बाजारों में अत्यधिक संभावनाएँ हैं।
पहल का महत्व
- किसानों की आय एवं आजीविका में वृद्धि: वर्ष 2030 तक किसानों को मिलने वाले मूल्य को ₹30–40 प्रति किलोग्राम से बढ़ाकर लगभग ₹80 प्रति किलोग्राम करने का लक्ष्य, जिससे 17,500 से अधिक किसानों को लाभ होगा तथा 3,000 से अधिक महिला-नेतृत्व वाले आजीविका अवसर सृजित होंगे।
- एकीकृत मूल्य श्रृंखला का विकास: खेती, प्रसंस्करण, करक्यूमिन निष्कर्षण, कोल्ड चेन, ब्रांडिंग, ट्रेसबिलिटी तथा निर्यात के लिए संपूर्ण अवसंरचना का विकास, जिससे अधिकतम मूल्य संवर्धन सुनिश्चित होगा।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ बनाना: मेघालय को उच्च-करक्यूमिन GI-टैग प्राप्त लाकाडोंग हल्दी का वैश्विक केंद्र बनाना तथा इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में “ब्रांड नॉर्थ ईस्ट” के प्रमुख उत्पाद के रूप में स्थापित करना।
- महिला-नेतृत्व वाली एवं सतत कृषि को बढ़ावा: हल्दी की खेती एवं प्रसंस्करण की रीढ़ मानी जाने वाली महिलाओं को सशक्त बनाते हुए उन्हें किसान संस्थाओं एवं मूल्य श्रृंखला आधारित उद्यमों के केंद्र में स्थापित करना।
- संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान: प्रसंस्करण, कटाई उपरांत प्रबंधन, GI के व्यावसायीकरण, खरीदारों से संपर्क तथा बाजार तक पहुँच जैसी कमियों को अभिसरण-आधारित मिशन दृष्टिकोण के माध्यम से दूर करना।
- अनुकरणीय विकास मॉडल का निर्माण: मिशन मोड पर आधारित ऐसा विकास मॉडल प्रस्तुत करना, जिसे मेघालय तथा पूर्वोत्तर के अन्य उच्च-मूल्य कृषि उत्पादों पर भी लागू किया जा सके।
