संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-2: केंद्र और राज्यों के कार्य और दायित्व, संघीय संरचना से संबंधित मुद्दे और चुनौतियाँ |

संदर्भ: केंद्र सरकार ने संसद में पुनः स्पष्ट किया है कि सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के कावेरी निर्णय में यह स्पष्ट अनिवार्यता नहीं है कि कर्नाटक, कावेरी नदी पर किसी नए निर्माण कार्य से पहले निचले प्रवाह वाले राज्यों की सहमति प्राप्त करे। इस स्पष्टीकरण के बाद कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना को लेकर विवाद पुनः चर्चा में आ गया है।

कावेरी जल विवाद का विकास

• अंतर-राज्यीय नदी: कावेरी नदी कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के बीच साझा की जाती है। सिंचाई, पेयजल तथा पारिस्थितिकीय आवश्यकताओं को लेकर प्रतिस्पर्धी मांगों के कारण यह भारत की सबसे विवादित अंतर-राज्यीय नदियों में से एक है। 

• कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT): अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत वर्ष 1990 में गठित इस न्यायाधिकरण ने 2007 में अपना अंतिम निर्णय दिया, जिसमें 740 टीएमसी (TMC) उपयोगी जल का निम्नानुसार आवंटन किया गया: 

  • तमिलनाडु: 419 टीएमसी 
  • कर्नाटक: 270 टीएमसी 
  • केरल: 30 टीएमसी 
  • पुडुचेरी: 7 टीएमसी 
  • शेष 14 टीएमसी जल पर्यावरण संरक्षण तथा समुद्र में होने वाले अपरिहार्य प्रवाह के लिए निर्धारित किया गया। 

• सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (2018): बेंगलुरु की बढ़ती पेयजल आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक के हिस्से में 14.75 टीएमसी की वृद्धि कर उसका आवंटन 284.75 टीएमसी कर दिया तथा इसके अनुरूप तमिलनाडु का आवंटन घटाकर 404.25 टीएमसी कर दिया। 

  • न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि तमिलनाडु 10 टीएमसी भूजल का उपयोग करने का अधिकार रखता है, जबकि केरल (30 टीएमसी) और पुडुचेरी (7 टीएमसी) के आवंटन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। 

• संस्थागत तंत्र: सर्वोच्च न्यायालय ने जल बंटवारे की व्यवस्था को लागू करने तथा बेसिन राज्यों के बीच जलाशयों के संचालन को विनियमित करने के लिए कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के गठन का भी निर्देश दिया।

मेकेदातु परियोजना क्या है?

• स्थान: प्रस्तावित मेकेदातु संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना कर्नाटक के रामनगर जिले में मेकेदातु के निकट कावेरी नदी पर, कावेरी और अर्कावती नदियों के संगम के निचले प्रवाह क्षेत्र में प्रस्तावित है। 

• स्थल का चयन: मेकेदातु (कन्नड़ में जिसका अर्थ “बकरी की छलांग” है) एक संकरी घाटी है, जहाँ कावेरी नदी खड़ी चट्टानी भू-आकृति से होकर बहती है। यही भौगोलिक विशेषता इसे संतुलन जलाशय के निर्माण के लिए उपयुक्त बनाती है। 

• उद्देश्य: कर्नाटक सरकार इस परियोजना के माध्यम से: 

  • बेंगलुरु तथा आसपास के क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराना; 
  • जलविद्युत उत्पादन करना; तथा 
  • कावेरी जल बंटवारा व्यवस्था के तहत अपने आवंटित हिस्से के जल का भंडारण एवं विनियमन करना चाहती है। 

• वर्तमान स्थिति: यद्यपि कर्नाटक ने विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (Detailed Project Report – DPR) तैयार कर लिया है, फिर भी इस परियोजना को अभी तक आवश्यक वैधानिक एवं पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ प्राप्त नहीं हुई हैं तथा तमिलनाडु की आपत्तियों के कारण यह परियोजना अभी भी विवाद का विषय बनी हुई है। 

मेकेदातु परियोजना विवादास्पद क्यों है?

• कर्नाटक का पक्ष

  • इस परियोजना का उद्देश्य न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारित जल आवंटन में कोई परिवर्तन किए बिना कावेरी जल के अपने आवंटित हिस्से का उपयोग करना है। 
  • इसका उद्देश्य कर्नाटक के हिस्से में आने वाले अतिरिक्त मानसूनी जल का भंडारण करना है, ताकि पेयजल आपूर्ति, जलविद्युत उत्पादन तथा विनियमित जल प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके। 
  • कर्नाटक का तर्क है कि बेंगलुरु तथा आसपास के क्षेत्रों की बढ़ती पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यह परियोजना अत्यंत आवश्यक है। 

• तमिलनाडु की चिंताएँ

  • तमिलनाडु का तर्क है कि अपस्ट्रीम (ऊपरी प्रवाह क्षेत्र) में जलाशय बनने से कर्नाटक को, विशेषकर जल संकट के वर्षों में, जल प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता मिल जाएगी, जिससे डाउनस्ट्रीम (निचले प्रवाह क्षेत्र) में सिंचाई एवं पेयजल के लिए समय पर जल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। 
  • उसे आशंका है कि यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के निर्णय तथा सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के निर्णय के प्रभावी क्रियान्वयन को कमजोर कर सकती है। 
  • तमिलनाडु का मत है कि सभी आवश्यक वैधानिक स्वीकृतियाँ प्राप्त किए बिना तथा निचले प्रवाह वाले राज्यों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना इस परियोजना को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। 

आगे की राह

• वैधानिक संस्थाओं को सुदृढ़ बनाना: कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) तथा कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) को पारदर्शी जलाशय निगरानी, वास्तविक समय में डेटा साझाकरण तथा कावेरी जल बंटवारा व्यवस्था के प्रभावी अनुपालन के लिए अधिक सशक्त बनाया जाए। 

• संस्थागत राजनीतिक संवाद को बढ़ावा देना: यद्यपि वैधानिक संस्थाएँ जल बंटवारा निर्णयों का क्रियान्वयन करें, फिर भी अंतर-राज्यीय परिषद तथा दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद जैसे मंच दीर्घकालिक अंतर-राज्यीय नदी संबंधी मुद्दों पर राजनीतिक संवाद एवं सहमति निर्माण को प्रोत्साहित कर सकते हैं। 

• वैज्ञानिक नदी बेसिन प्रबंधन अपनाना: निर्णयों को समग्र जलवैज्ञानिक, पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय आकलनों के आधार पर लिया जाए, ताकि शहरी जल सुरक्षा, डाउनस्ट्रीम सिंचाई तथा पारिस्थितिकीय प्रवाह के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके। 

• सतत जल प्रबंधन को बढ़ावा देना: अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के साथ-साथ वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण, सूक्ष्म सिंचाई तथा मांग-आधारित जल प्रबंधन जैसे उपायों को भी बढ़ावा दिया जाए, जिससे कावेरी बेसिन पर दबाव कम किया जा सके। 

Shares: