संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-1: महिला और महिला संगठनों की भूमिका, जनसंख्या और संबद्ध मुद्दे; सामाजिक सशक्तिकरण।

सामान्य अध्ययन -2:कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, गठन और कार्यप्रणाली।

संदर्भ: महिलाओं के स्वास्थ्य पर एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए, उच्चतम न्यायालय ने ‘मासिक धर्म स्वास्थ्य’ कोमूल अधिकार घोषित किया।

अन्य संबंधित जानकारी

  • डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार मामले में उच्चतम न्यायालय ने घोषणा की कि शैक्षणिक संस्थानों में मासिक धर्म स्वास्थ्य (Menstrual Health) का अधिकार और ‘मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन’ (MHM) उपायों तक पहुंच, अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
  • न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कक्षा 6-12 तक केंद्र की ‘मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ को अखिल भारतीय स्तर पर लागू करने के लिए बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं। इसके साथ ही मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन, बालकों से पृथक शौचालय आदि उपलब्ध कराने जैसे अतिरिक्त निर्देश भी दिए गए हैं।
  • न्यायालय ने माना कि मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं का अभाव किशोरियों की गोपनीयता, शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा और शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन करता है।
  • न्यायालय ने निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की व्याख्या मासिक धर्म स्वास्थ्य के परिप्रेक्ष्य में की। न्यायालय ने कहा कि धारा 3 के तहत “निःशुल्क शिक्षा” केवल ट्यूशन फीस को माफ़ कर देने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उन सभी वित्तीय बाधाओं को दूर करना भी शामिल है जो बच्चे की शिक्षा में बाधक बनती हैं।
  • न्यायालय का तर्क सारभूत समानता”  की अवधारणा पर आधारित है। जहाँ संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता की गारंटी देता है, वहीं न्यायालय ने उल्लेख किया कि हर किसी के साथ बिल्कुल समान व्यवहार करना असमानता को स्थायी बना सकता है।
    • सारभूत समानता “तथ्यात्मक समानता” या वास्तविक परिणामों पर ध्यान केंद्रित करती है।
      • उदाहरण: यह सुनिश्चित करने के लिए कि हाशिए पर रहने वाले समूह वास्तव में नौकरियां सुरक्षित कर सकें, आरक्षण या छात्रवृत्ति प्रदान करना।

उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी मुख्य निर्देश

  • सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में प्रत्येक स्कूल (चाहे सरकारी हो या निजी) में उपयोग योग्य जल संचयन के साथ चालू महिला-पुरुषमौजूद हों।
  • स्कूलों में सभी मौजूदा या नवनिर्मित शौचालयों का डिजाइन, निर्माण और रखरखाव गोपनीयता एवं पहुँच सुनिश्चित करने के लिए किया जाएगा, जिसमें दिव्यांग बच्चों की आवश्यकताओं का भी विशेष ध्यान रखा जाएगा।
  • सभी स्कूल शौचालयों में चालू धुलाई सुविधाएं और हर समय साबुन एवं पानी उपलब्ध होना चाहिए।
  • राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को सभी स्कूलों में ASTM D-6954-अनुपालन वाले मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन की आपूर्ति करनी होगी। ये छात्राओं को अधिमानतः वेंडिंग मशीनों या विवेकपूर्ण ढंग से निर्दिष्ट क्षेत्रों के माध्यम से उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
    • ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन विशेष योजक वाले पारंपरिक प्लास्टिक पैड होते हैं जो ऑक्सीजन, पराबैंगनी प्रकाश या उष्मा के संपर्क में आने पर छोटे टुकड़ों में विघटित हो जाते हैं।

सैनिटरी अपशिष्ट के निपटान के लिए निर्देश

  • सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रत्येक स्कूल में नवीनतम ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुसार सैनिटरी नैपकिन के निपटान के लिए एक सुरक्षित, स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल तंत्र हो।
  • प्रत्येक शौचालय इकाई में सैनिटरी सामग्री के संग्रह के लिए एक ढक्कनदार कूड़ेदानहोगा, और ऐसे डिब्बों की स्वच्छता एवं नियमित रखरखाव हर समय सुनिश्चित किया जाएगा।

निर्णय का महत्व

  • अनुच्छेद 21 का संवैधानिक विस्तार: उच्चतम न्यायालय ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन, गरिमा, गोपनीयता और शारीरिक स्वायत्तता से अविभाज्य मानकर इसके दायरे का विस्तार किया है।
  • शिक्षा तक केवल पहुंच नहीं बल्कि गरिमा के साथ शिक्षा: मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं के अभाव को बालिकाओं की अनुपस्थिति, असुरक्षित तरीकों और स्कूल छोड़ने से जोड़कर, न्यायालय ने पुष्टि की कि शिक्षा तब तक सार्थक नहीं हो सकती जब तक वह गरिमा से समझौता करती हो। न्यायालय ने कहा कि राज्य किसी भी बच्चे को शिक्षा और आत्म-सम्मान के बीच किसी एक को चुनने के लिए विवश नहीं कर सकता।
  • जवाबदेही और प्रवर्तनीयता: यह घोषणा करके कि यदि सरकारी स्कूल शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 19 का पालन नहीं करते हैं, तो संबंधित राज्य को जवाबदेह ठहराया जाएगा, यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य संबंधी दायित्व प्रवर्तनीय हैं और इनकी अनदेखी करने से कानूनी कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है।
    • धारा 19 में स्कूलों के लिए मानदंडों और मानकों का प्रावधान किया गया है, जिसमें बालकों और बालिकाओं के लिए अलग शौचालय और उन तक बाधारहित पहुंच शामिल है।
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