संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरणीय प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास तथा अनुप्रयोग और रोजमर्रा के जीवन पर उनके प्रभाव।

संदर्भ: सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने नए यात्री वाहनों के लिए 1 अप्रैल, 2029 से भारत स्टेज VII (BS-VII) उत्सर्जन मानकों को लागू करने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत हल्के वाणिज्यिक वाहनों को अप्रैल 2030 तथा बसों और भारी-भरकम वाहनों को अप्रैल 2031 से इन मानकों के दायरे में लाने की योजना है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • अक्टूबर 2026 में प्रकाशित तीन मसौदा अधिसूचनाओं में अप्रैल 2035 तक चरणबद्ध कार्यान्वयन का प्रस्ताव दिया गया है तथा 30 दिनों के भीतर जनता से टिप्पणियाँ आमंत्रित की गई हैं।
  • प्रस्तावित मानक यूरोप के यूरो 7 (Euro 7) मानदंडों के अनुरूप हैं। इनमें प्रदूषण नियंत्रण को निकास उत्सर्जन से आगे बढ़ाकर ब्रेक से उत्पन्न कणों, टायरों के घिसाव, वास्तविक परिस्थितियों में वाहन चलाने के परीक्षणों, ऑनबोर्ड निगरानी और बैटरी की टिकाऊपन क्षमता तक विस्तारित किया गया है।
  • ये प्रस्ताव अभी मसौदा चरण में हैं और अंतिम रूप दिए जाने से पहले कार्यान्वयन की तिथियों तथा तकनीकी आवश्यकताओं में बदलाव हो सकता है।

भारत स्टेज उत्सर्जन मानकों के बारे में

  • भारत स्टेज (BS) उत्सर्जन मानक सरकार द्वारा अनिवार्य किए गए ऐसे नियम हैं, जो मोटर वाहनों से उत्सर्जित होने वाले प्रदूषकों की मात्रा को सीमित करते हैं। इनमें कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), हाइड्रोकार्बन (HC) और कणिकीय पदार्थ (PM) शामिल हैं।
  • भारत के मानक यूरोपीय उत्सर्जन मानदंडों पर आधारित हैं।
  • भारत में पहले उत्सर्जन मानक, जिन्हें इंडिया 2000 के नाम से जाना जाता है, वर्ष 2000 में लागू किए गए थे।
  • इसके बाद भारत ने BS-II, BS-III और BS-IV लागू किए। BS-V को छोड़कर सीधे BS-VI पर चला गया।
  • BS-VI मानक देशभर में 1 अप्रैल, 2020 से लागू हुए। इनके तहत उत्सर्जन सीमाओं को सख्त किया गया और कम सल्फर वाले ईंधन का उपयोग अनिवार्य किया गया, जिसमें सल्फर की मात्रा 10 भाग प्रति मिलियन (ppm) तक सीमित है।

प्रस्तावित BS-VII मानकों के प्रमुख प्रावधान

  • प्रस्तावित मानकों में यात्री कारें (M1 श्रेणी), 3.5 टन तक के हल्के वाणिज्यिक वाहन (N1 श्रेणी) तथा बसों और ट्रकों सहित भारी वाणिज्यिक वाहन शामिल हैं।
  • यात्री कारों के लिए निकास पाइप से होने वाले उत्सर्जन की प्रमुख सीमाएँ BS-VI के समान ही बनी हुई हैं। मुख्य बदलाव परीक्षण, निगरानी, गैर-निकास प्रदूषण और वाहनों की टिकाऊपन क्षमता से संबंधित हैं।
  • मौजूदा BS-VI वाहनों के लिए देशव्यापी प्रतिस्थापन या रेट्रोफिट कार्यक्रम का कोई प्रस्ताव नहीं है।

प्रमुख परिवर्तन: BS-VI बनाम BS-VII

BS-VII का महत्त्व

  • वायु प्रदूषण में कमी: छोटे कणों और हानिकारक उत्सर्जनों का बेहतर मापन और नियंत्रण किया जा सकेगा।
  • गैर-निकास प्रदूषण पर नियंत्रण: ब्रेक से उत्पन्न कणों और टायरों के घिसाव से होने वाले प्रदूषण की सीमाएँ तय करने से इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) सहित सभी प्रकार के पावरट्रेन से होने वाले प्रदूषण पर नियंत्रण किया जा सकेगा।
  • वास्तविक परिस्थितियों में अनुपालन: सड़कों पर परीक्षण और ऑनबोर्ड निगरानी से वाहनों के वास्तविक उपयोग के दौरान उत्सर्जन मानकों के अनुपालन में सुधार होगा।
  • बैटरी की टिकाऊपन क्षमता: बैटरी की क्षमता बनाए रखने संबंधी मानदंड और पर्यावरणीय वाहन पासपोर्ट बैटरी की स्थिति तथा वाहन उत्सर्जन से संबंधित जानकारी को बेहतर बनाएँगे।

BS-VII से संबंधित चुनौतियाँ या मुद्दे

  • अनुपालन की अधिक लागत: उन्नत प्रौद्योगिकियों और परीक्षणों से वाहनों की कीमतें बढ़ सकती हैं, विशेषकर किफायती कारों की।
  • तैयारी के लिए कम समय: अप्रैल 2029 की समय-सीमा से वाहनों के नए मॉडलों की पेशकश में बाधा आ सकती है और निर्माताओं को तैयारी के लिए सीमित समय मिल सकता है।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास पर प्रभाव: मौजूदा वाहनों को उन्नत बनाने से इंजीनियरिंग संसाधन इलेक्ट्रिक वाहनों के अनुसंधान एवं विकास से हटकर अन्य कार्यों में लग सकते हैं।
  • तकनीकी और अवसंरचनात्मक चुनौतियाँ: तकनीकी सीमाओं और परीक्षण आवश्यकताओं को अंतिम रूप न दिया जाना तथा विशेष सुविधाओं की अपर्याप्तता कार्यान्वयन को जटिल बना सकती है।

आगे की राह

  • स्पष्ट मानकों को अंतिम रूप देना: सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) को जनता की टिप्पणियों पर विचार करने के बाद उत्सर्जन सीमाओं और परीक्षण प्रक्रियाओं को अंतिम रूप देना चाहिए।
  • पर्याप्त संक्रमण समय सुनिश्चित करना: कार्यान्वयन की समय-सीमा तकनीकी तैयारी और वाहन निर्माताओं की निवेश संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर निर्धारित की जानी चाहिए।
  • परीक्षण अवसंरचना को सुदृढ़ करना: परीक्षण सुविधाओं, पोर्टेबल मापन प्रणालियों और प्रशिक्षित कार्मिकों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।
  • किफायती प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना: पारदर्शी निगरानी और प्रभावी प्रवर्तन के साथ-साथ स्वच्छतर प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान को समर्थन दिया जाना चाहिए।
Shares: