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सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन।

संदर्भ: वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) के एक राज्यव्यापी सर्वेक्षण में बताया गया है कि हिमालयी जंगली बकरी अर्थात कश्मीर मारखोर स्थानीय रूप से विलुप्त होने के कगार पर है।

अन्य महत्वपूर्ण जानकारी:

  • यह सर्वेक्षण WTI द्वारा जम्मू-कश्मीर वन्यजीव संरक्षण विभाग और नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन के सहयोग से किया गया था।
  • WTI सर्वेक्षण इस बात पर प्रकाश डालता है कि पीर पंजाल में बनिहाल दर्रे से लेकर झेलम नदी के उत्तर में शमशाबारी रेंज तक इसके ऐतिहासिक क्षेत्र में केवल 300-350 मारखोर ही बचे हैं।

सर्वेक्षण के मुख्य बिंदु:

  • कश्मीर मारखोर के बचे हुए आवास: काजीनाग रेंज भारत में इस प्रजाति का अंतिम गढ़ है, जबकि शोपियां में हिरपोरा वन्यजीव अभयारण्य और पुंछ में टट्टकुटी वन्यजीव अभयारण्य और खारा गली संरक्षण रिजर्व में भी इनकी कुछ आबादी बची हुई है।
  • अस्तित्व के लिए खतरा: अनियोजित विकास, अत्यधिक पशुचारण और अवैध शिकार इनके लिए बढ़ते खतरों के रूप में उभरे हैं।
  • हिरपोरा की आबादी अत्यधिक चराई और लगभग 15 वर्ष पहले हुए एक राजमार्ग के निर्माण के कारण गंभीर दबाव का सामना कर रही है।
  • पिछले वर्षों में हुए इनके अवैध शिकार से पुंछ की आबादी अत्यधिक प्रभावित हुई है और वन्यजीव कर्मचारियों तथा बुनियादी ढांचे की कमी के कारण उनकी स्थिति और भी खराब हो गई है।
  • जर्नल फॉर नेचर कंजर्वेशन (अगस्त 2025) ने उल्लेख किया कि मारखोर के समान ही पालतू बकरियां भी मई और जून के महीनों में प्रजनन करती हैं, जिससे मारखोर के आवासों और खाद्य संसाधनों पर गंभीर दबाव पड़ता है।
  • संरक्षण की तात्कालिकता: सर्वेक्षण इस बात पर जोर देता है कि प्रजातियों के दीर्घकालिक अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए काजीनाग के साथ-साथ पीर पंजाल में कम से कम एक अतिरिक्त व्यवहार्य आबादी क्षेत्र स्थापित करने हेतु संरक्षण प्रयासों बढ़ाए जाने चाहिए।

राज्य द्वारा इनके संरक्षण के लिए किए गए उपाय:

  • संरक्षित क्षेत्रों का सुदृढ़ीकरण: काजीनाग रेंज में मारखोर के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय उद्यान है, हिरपोरा वन्यजीव अभयारण्य का विस्तार किया गया है, और प्रजातियों की रक्षा के लिए टट्टकुटी वन्यजीव अभयारण्य को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया गया है।
  • निगरानी और पर्यवेक्षण: WTI इनके प्रमुख स्थलों की लगातार निगरानी कर रहा है और उनके खतरों को कम करने के लिए स्थानीय समुदायों और चरवाहों के साथ मिलकर काम करता है।

कश्मीर मारखोर:

  • “मारखोर” एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ है “सांप खाने वाला।” यह नाम इसके सर्पिल सींगों या इस विश्वास को संदर्भित करता है कि यह अपने खुरों से सांपों को मार देता है।
  • विशिष्ट विशेषताएँ: यह पर्वतीय खुरदार जानवर (ungulate) विश्व की सबसे बड़ी जंगली बकरियों में से एक है, जिसका वजन लगभग 100 किलोग्राम होता है। इसकी विशेषताओं में लंबे, सर्पिल नुकीले सींग और ठुड्डी, गर्दन और कंधों पर लहराते बाल होते हैं।
  • जीवित रहने का कौशल: भूरे रंग के आवरण, ठोस शरीर और असाधारण फुर्ती के साथ, ये स्वयं पहाड़ों का ही भाग प्रतीत होते हैं।
    • शिकारियों और किसी भी अन्य खतरे या अशांति से बचने के लिए, मादाएं अपने बच्चों के साथ लगभग 90-डिग्री के ढलानों पर भी चल सकती हैं।
  • संरक्षण स्थिति: यह प्रजाति वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और जम्मू-कश्मीर वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1978 की अनुसूची I के तहत सूचीबद्ध है।
    • IUCN स्थिति: संकटग्रस्त
    • संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2024 से 24 मई को ‘अंतर्राष्ट्रीय मारखोर दिवस’ घोषित किया है।
  • पारिस्थितिक महत्व: मारखोर मिश्रित आहार लेने वाले हैं – घास, जड़ी-बूटियाँ, झाड़ियाँ, पत्तियाँ और टहनियाँ सभी उनके आहार में शामिल हैं, इस प्रकार यह अत्यधिक वृद्धि को रोकने और स्वस्थ मिट्टी को बनाए रखने में मदद करते हैं।
    • मारखोर की स्वस्थ आबादी एक संतुलित पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत देती है, जिसमें हिम तेंदुए, आम तेंदुए और भेड़ियों जैसे शिकारियों के लिए आवश्यक शिकार भी मौजूद होते हैं।

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