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सामान्य अध्ययन-3: ऊर्जा सुरक्षा; ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का विकास; स्वच्छ ईंधन और निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकी; नई और उभरती ऊर्जा प्रौद्योगिकियाँ ; बुनियादी ढाँचा (ऊर्जा)

संदर्भ: हाल ही में, CSIR-NCL की एक शोध टीम ने डाइमिथाइल ईथर (DME) के उत्पादन के लिए एक पेटेंट-संरक्षित प्रौद्योगिकी विकसित की है। डाइमिथाइल ईथर संश्लेषित ईंधन है और एलपीजी (LPG) का संभावित विकल्प है।

प्रौद्योगिकी के बारे में 

• वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद – राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (CSIR-NCL), पुणे द्वारा विकसित यह प्रौद्योगिकी उत्प्रेरक डिजाइन और प्रक्रिया अभियांत्रिकी दोनों में सुधार करती है।

• इसे एक स्वदेशी, स्वच्छ ईंधन विकल्प के रूप में डिजाइन किया गया है जिसे एलपीजी के साथ मिश्रित किया जा सकता है और घरेलू एवं औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए उपयोग किया जा सकता है।

• एक विशेष प्रौद्योगिकी के माध्यम से ऐसा उत्प्रेरक विकसित किया गया है जो मेथनॉल को कुशलतापूर्वक DME में परिवर्तित कर सकता है।

• यह प्रक्रिया लगभग 10 बार दाब पर संचालित होती है, जिससे DME को सीधे सिलेंडरों में भरा जा सकता है और इसका भंडारण तथा परिवहन सुविधाजनक हो जाता है।

• मीथेन (प्राकृतिक गैस) एक अप्रत्यक्ष फीडस्टॉक के रूप में कार्य करता है और इसे सिनगैस (CO और H2) में परिवर्तित किया जाता है, फिर मेथनॉल में, जिसका उपयोग DME के उत्पादन के लिए किया जाता है।

• एक लचीला बर्नर प्रोटोटाइप विकसित किया गया है, जो 100% एलपीजी (LPG) से लेकर 100% DME तक (जिसमें मध्यवर्ती मिश्रण भी शामिल हैं) संचालित होने में सक्षम है।

• उत्पादन मार्ग और फीडस्टॉक लचीलापन: DME का उत्पादन मेथनॉल से किया जाता है, जिसे विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है जैसे कि प्राकृतिक गैस (सिनगैस के माध्यम से), कोयला, बायोमास (कृषि अवशेष), और कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)।

  • यह DME को एक फीडस्टॉक-लचीला और भविष्य के लिए तैयार ईंधन बनाता है, जो पारंपरिक और नवीकरणीय ऊर्जा दोनों मार्गों का समर्थन करता है।

• नियामक ढांचा और सम्मिश्रण प्रावधान: भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने IS 18698:2024 को अधिसूचित किया है, जो घरेलू, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपयोग के लिए एलपीजी (LPG) के साथ 20% तक DME के सम्मिश्रण की अनुमति देता है।

  • अध्ययनों से संकेत मिलता है कि मौजूदा एलपीजी बुनियादी ढांचे (जैसे कि सिलेंडर, रेगुलेटर, होज़ या बर्नर) में बिना किसी बदलाव के 8% तक सम्मिश्रण किया जा सकता है।

डाइमिथाइल ईथर (DME) के बारे में

• यह एक रंगहीन, गैर-विषाक्त और अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, जिसका उपयोग पर्यावरण के अनुकूल ‘एयरोसोल प्रोपेलेंट’, प्रशीतक और स्वच्छ दहन वाले ईंधन के रूप में किया जाता है।

• इसका उत्पादन प्राकृतिक गैस, कोयला या बायोमास से किया जा सकता है, और यह डीजल या एलपीजी (LPG) के एक संधारणीय विकल्प के रूप में कार्य करता है।

• इसे “दूसरी पीढ़ी” का वैकल्पिक ईंधन माना जाता है, जिसकी सीटेन संख्या उच्च (>55) होती है, जो इसे संपीडन प्रज्वलन इंजन के लिए उपयुक्त बनाती है।

• गुण: 

  • यह एक विशिष्ट गंध वाला सबसे सरल ईथर है।  
  • इसे सामान्य दाब (40°C पर लगभग 10 बार) पर आसानी से द्रवित  किया जा सकता है, जिससे एलपीजी (LPG) की तरह इसका भंडारण और परिवहन संभव हो जाता है।
  • इसके दहन से कणिकीय उत्सर्जन बहुत कम होता है और यह बिल्कुल भी कालिख उत्पन्न नहीं करता है।

• अनुप्रयोग:

  • इसका उपयोग डीजल और एलपीजी जैसे पेट्रोलियम-आधारित ईंधनों के स्थान पर एक प्रतिस्थापन के रूप में किया जा सकता है।
  • अपनी गैर-विषाक्त प्रकृति और घुलनशीलता के कारण इसका उपयोग हेयरस्प्रे, डियोडोरेंट और शैम्पू में किया जाता है।
  • यह विभिन्न रसायनों जैसे डाइमिथाइल सल्फेट, मिथाइल एसीटेट और लोअर ओलेफिन्स के उत्पादन में एक मध्यवर्ती के रूप में कार्य करता है।
  • मस्सों के उपचार के लिए ‘ओवर-द-काउंटर’ (बिना पर्चे के मिलने वाली) “फ्रीज स्प्रे” में DME और प्रोपेन के मिश्रण का उपयोग किया जाता है।
  • हाल ही में इसका उपयोग प्रथम DME-संचालित ट्रैक्टरों को ऊर्जा देने के लिए किया गया है, जो कृषि वातावरण के लिए धुआं-रहित निकास सुनिश्चित करते हैं।

इस प्रौद्योगिकी विकास का महत्व

• ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी जीवाश्म ईंधन आवश्यकताओं का 80% से अधिक आयात करता है। हालिया वैश्विक व्यवधानों ने एलपीजी (LPG) की कीमतों में वृद्धि की है, जिससे घरेलू परिवार, विशेष रूप से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थी प्रभावित हुए हैं।

• स्वच्छ ईंधन विकल्प: यह पारंपरिक ईंधनों की तुलना में कालिख NOx, SOx और कणिकीय पदार्थों का काफी कम उत्सर्जन करता है, जबकि इसकी तापीय दक्षता एलपीजी के समान है।

• आयात बिल में कमी: भारत ने 2024 में लगभग 21 मिलियन टन एलपीजी का आयात किया था। यदि केवल 8% एलपीजी को DME से प्रतिस्थापित कर दिया जाए, तो प्रतिवर्ष लगभग ₹9,500 करोड़ की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है।

• रसोई से परे उपयोग: यह ऑटोमोटिव ईंधन के रूप में कार्य कर सकता है, ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाले CFCs के स्थान पर प्रोपेलेंट के रूप में प्रयुक्त हो सकता है, और ओलेफिन्स, डाइमिथाइल सल्फेट तथा मिथाइल एसीटेट के उत्पादन के लिए एक रासायनिक मध्यवर्ती के रूप में कार्य कर सकता है।

• जलवायु और चक्रीय अर्थव्यवस्था की क्षमता: उन्नत उत्प्रेरक प्रक्रियाओं और हरित हाइड्रोजन का उपयोग करके कैप्चर की गई CO2 (फ्लू गैस) से DME का उत्पादन किया जा सकता है। यह कार्बन कैप्चर, उपयोग और स्वच्छ ईंधन उत्पादन का समर्थन करता है, जो जलवायु शमन में योगदान देता है।

पेट्रोलियम पर आयात निर्भरता कम करने के लिए सरकारी पहल

• सतत (SATAT – किफायती परिवहन की दिशा में सतत विकल्प): इसे कृषि अवशेषों, पशुओं के गोबर और नगर निगम के ठोस कचरे से उत्पादित संपीडित बायोगैस (CBG) को एक वैकल्पिक ऑटोमोटिव ईंधन के रूप में बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया है।

• एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (EBP): सरकार ने पेट्रोल में 20% एथेनॉल सम्मिश्रण (E20) प्राप्त करने के लक्ष्य को समय से पहले पूरा करने का लक्ष्य रखा है, जो इंजनों में स्वच्छ दहन को बढ़ावा देता है।

• जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति, 2018: यह जैव ईंधन उत्पादन के लिए विभिन्न फीडस्टॉक (चीनी/स्टार्च वाली फसलें) के उपयोग की अनुमति देती है और बायोडीजल सम्मिश्रण को बढ़ावा देती है।

• राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM): इसका उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है, जो औद्योगिक और परिवहन क्षेत्रों के लिए एक टिकाऊ ईंधन के रूप में कार्य करेगा।

• फेम इंडिया योजना (FAME India – फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स): यह इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की खरीद के लिए प्रोत्साहन राशि प्रदान करती है और पेट्रोलियम-आधारित परिवहन पर निर्भरता कम करने के लिए चार्जिंग बुनियादी ढांचे के विकास में सहायता करती है।

• मेथनॉल इकोनॉमी कार्यक्रम (नीति आयोग): इसका उद्देश्य परिवहन में मेथनॉल (उच्च-राख वाले कोयले और ठोस कचरे से प्राप्त) के सम्मिश्रण द्वारा ईंधन बिल और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है।

• गोबर-धन योजना (GOBAR-DHAN – गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज): यह पशुओं के गोबर और कृषि अपशिष्ट को बायोगैस में परिवर्तित करती है, जिससे ग्रामीण ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति होती है और प्रदूषण में कमी आती है।

Source:
Economic Times
Indian Express
PIB

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