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सामान्य अध्ययन2: भारत एवं उसके पड़ोसी देशों के साथ संबंध; भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक समूह और समझौते।
संदर्भ: भारत ने पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग को खारिज करते हुए दोहराया है कि “पाकिस्तान और चीन के बीच कोई सीमा नहीं है” तथा भारतीय क्षेत्र से संबंधित इस प्रकार की किसी व्यवस्था का कोई वैधानिक आधार नहीं है।
अन्य संबंधित जानकारी
- पाकिस्तान और चीन ने सीमा संयुक्त आयोग को सक्रिय करते हुए इसकी पहली बैठक इस्लामाबाद में आयोजित की।
- यह तंत्र 2013 के सीमा प्रबंधन प्रणाली संबंधी समझौते से संबंधित है। इसके अंतर्गत सीमा प्रबंधन, संयुक्त सीमा सर्वेक्षण, व्यापार प्रवाह तथा लोगों के बीच संपर्क जैसे विषय शामिल हैं।
- भारत ने इस आयोग को खारिज करते हुए पुनः स्पष्ट किया है कि उसने 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा करार को कभी मान्यता नहीं दी है और वह इसे अवैध एवं अमान्य मानता है।
चीन-पाकिस्तान सीमा प्रश्न पर भारत का पक्ष
- भारत का मानना है कि जिन क्षेत्रों से होकर कथित पाकिस्तान-चीन सीमा गुजरती है, वे पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा थे और वर्तमान में भारत के जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख संघ राज्य क्षेत्रों का हिस्सा हैं।
- भारत के अनुसार, पाकिस्तान को उसके अवैध और बलपूर्वक कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र के संबंध में किसी प्रकार की व्यवस्था या समझौता करने का कोई अधिकार नहीं है।
- इसी आधार पर भारत ऐसे क्षेत्रों से संबंधित किसी भी चीन-पाकिस्तान सीमा सहयोग को स्वीकार नहीं करता।
- भारत इसी कारण 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा करार तथा उसके अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों से संबंधित बाद की व्यवस्थाओं को भी अस्वीकार्य मानता है।
विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

- 1963 का चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता: चीन और पाकिस्तान ने 2 मार्च, 1963 को चीन-पाकिस्तान सीमा करार पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य चीन के शिनजियांग तथा पाकिस्तान के वास्तविक नियंत्रण वाले समीपवर्ती क्षेत्रों के बीच सीमा का परिसीमन एवं सीमांकन करना था।
- शक्सगाम घाटी: इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी, जिसे ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट भी कहा जाता है, चीन को सौंप दिया।भारत इस क्षेत्र को अपने भू-भाग का हिस्सा मानता है।भारत सरकार के अनुसार, पाकिस्तान ने लगभग 5,180 वर्ग किमी भारतीय भू-भाग चीन को अवैध रूप से सौंपा था।
- अनुच्छेद 6: समझौते के अनुच्छेद 6 में प्रावधान किया गया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद का समाधान होने के बाद संबंधित संप्रभु प्राधिकारी चीन के साथ पुनः वार्ता करेगा तथा वर्तमान व्यवस्था के स्थान पर औपचारिक सीमा संधि संपन्न करेगा।
- भारत की प्रतिक्रिया: भारत ने उस समय भी इस समझौते का विरोध किया था और लगातार यह पक्ष रखा है कि पाकिस्तान के पास भारत द्वारा दावा किए जाने वाले क्षेत्र की स्थिति में परिवर्तन करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं था।
- इसी कारण भारत 1963 के समझौते को मान्यता नहीं देता और इसे अवैध एवं अमान्य मानता है।
शक्सगाम घाटी का भूगोल एवं सामरिक महत्त्व
- अवस्थिति: शक्सगाम घाटी अथवा ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट काराकोरम क्षेत्र में काराकोरम पर्वतमाला के उत्तर में स्थित है।यह चीन के शिनजियांग क्षेत्र तथा पाकिस्तान के नियंत्रण वाले गिलगित-बाल्टिस्तान से सटा हुआ है।इसकी अवस्थिति इसे पश्चिमी हिमालय में भारत-चीन-पाकिस्तान के सामरिक क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनाती है।
- सामरिक महत्त्व : इस क्षेत्र की सियाचिन क्षेत्र, काराकोरम मार्गों तथा चीन-पाकिस्तान संपर्क गलियारे से निकटता इसे भारत के उत्तरी सुरक्षा परिवेश के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण बनाती है।
- व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ: भारत के अनुसार, लद्दाख में लगभग 38,000 वर्ग किमी भारतीय भू-भाग चीन के कब्जे में है। इसके अतिरिक्त, भारत का कहना है कि पाकिस्तान ने 1963 के सीमा करार के अंतर्गत लगभग 5,180 वर्ग किमी भारतीय भू-भाग चीन को सौंप दिया था।
चीन-पाकिस्तान संपर्क और CPEC
- चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा: चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) की एक प्रमुख परियोजना है। यह चीन के शिनजियांग स्थित काशगर को पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित ग्वादर बंदरगाह से जोड़ता है और इसका मार्ग गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है।
- खुंजेराब संपर्क: खुंजेराब गलियारा इस क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान के बीच प्रमुख स्थलीय संपर्क प्रदान करता है। इस कारण सीमा प्रबंधन, वस्तुओं और लोगों की आवाजाही तथा आधारभूत संरचना का विकास भारत के लिए सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
- भारत की आपत्ति: भारत CPEC का विरोध करता है क्योंकि इस परियोजना के कुछ हिस्से पाकिस्तान के नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं, जिन्हें भारत अपना क्षेत्र मानता है।
भारत की प्रमुख चिंताएँ
- क्षेत्रीय संप्रभुता: भारत की चिंता है कि उसके द्वारा दावा किए जाने वाले क्षेत्रों पर चीन-पाकिस्तान की संस्थागत व्यवस्थाएँ 1963 की क्षेत्रीय व्यवस्था तथा शक्सगाम घाटी पर उसके बाद स्थापित नियंत्रण को सामान्य अथवा वैध स्वरूप दे सकती हैं। हालाँकि भारत का स्पष्ट पक्ष है कि ऐसी कोई भी व्यवस्था उसकी संप्रभुता को प्रभावित नहीं कर सकती।
- चीन-पाकिस्तान सामरिक निकटता: यह आयोग व्यापक चीन-पाकिस्तान सामरिक साझेदारी में एक अतिरिक्त संस्थागत आयाम जोड़ता है और पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में सहयोग को नियमित सीमा प्रबंधन तक विस्तृत करता है।
- संपर्क एवं सुरक्षा: खुंजेराब–गिलगित-बाल्टिस्तान–CPEC अक्ष पर बढ़ता चीन-पाकिस्तान संपर्क भारत के उत्तरी एवं पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र के निकट आधारभूत संरचना और रसद संपर्क को मजबूत कर सकता है।
- द्वि-मोर्चा संदर्भ: यह घटनाक्रम भारत के व्यापक सामरिक परिवेश में चीन और पाकिस्तान दोनों के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि सीमा संयुक्त आयोग मूलतः सीमा-प्रबंधन से संबंधित तंत्र है, न कि सैन्य व्यवस्था।
आगे की राह
- क्षेत्रीय स्थिति पर निरंतरता: भारत को अपनी स्थापित कानूनी एवं कूटनीतिक स्थिति को स्पष्ट रूप से दोहराते रहना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख भारत के अभिन्न हिस्से हैं तथा किसी तीसरे पक्ष की व्यवस्था भारत की संप्रभुता संबंधी स्थिति को परिवर्तित नहीं कर सकती।
- कूटनीतिक संवाद बनाए रखना: भारत को उपयुक्त कूटनीतिक माध्यमों से अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराते हुए पाकिस्तान और चीन के साथ अपने अलग-अलग क्षेत्रीय एवं सीमा संबंधी मुद्दों को संबंधित द्विपक्षीय तंत्रों के माध्यम से उठाना जारी रखना चाहिए।
- सामरिक संपर्क की निगरानी: भारत को शक्सगाम–गिलगित-बाल्टिस्तान–खुंजेराब–CPEC अक्ष पर आधारभूत संरचना एवं संपर्क से संबंधित गतिविधियों की निरंतर निगरानी करनी चाहिए और उनके क्षेत्रीय अखंडता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभावों का आकलन करना चाहिए।
- सीमा तैयारियों को सुदृढ़ करना: भारत के उत्तरी एवं पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों में सीमा अवसंरचना, निगरानी तथा रसद क्षमताओं को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि व्यापक भारत-चीन-पाकिस्तान सामरिक परिवेश में होने वाले बदलावों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।
