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सामान्य अध्ययन-3: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियाँ और उनका प्रबंधन; संगठित अपराध का आतंकवाद से संबध।
संदर्भ: हाल ही में, गृह मंत्रालय ने भारत की पहली राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति और रणनीति ‘प्रहार’ (PRAHAAR) का अनावरण किया। यह एक एकीकृत और सक्रिय आतंकवाद-रोधी सिद्धांत को संस्थागत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
‘प्रहार’ के बारे में
- यह निवारण, अनुक्रिया, लचीलापन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को एकीकृत करने वाली पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति है।
- ‘प्रहार’ शब्द (जिसका अर्थ हमला करना है) आतंकी इकोसिस्टम को ध्वस्त करने वाले एक सक्रिय और निर्णायक दृष्टिकोण का प्रतीक है।
- यह नीति आतंकवाद-रोधी प्रयासों के प्रमुख प्रयास के रूप में खुफिया अभियानों को संस्थागत बनाती है।
- यह कानूनी, तकनीकी, परिचालन और संस्थागत क्षमताओं को मजबूती प्रदान करती है।
- यह वामपंथी उग्रवाद के लिए राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना (2015) जैसे पूर्ववर्ती ढांचों पर आधारित है।
- यह ‘संपूर्ण-सरकार’ और ‘संपूर्ण-समाज’ दृष्टिकोण को रेखांकित करती है।
‘प्रहार’ का मूल दर्शन
- शून्य सहिष्णुता की नीति: प्रहार नीति आतंकवाद के प्रति शून्य-सहिष्णुता (ज़ीरो टॉलरेंस) के दृष्टिकोण पर आधारित है। यह ‘अच्छे’ और ‘बुरे’ आतंकवादियों के बीच कोई भेद नहीं करती और राज्य-प्रायोजित आतंकवाद तथा सीमा पार आतंकी नेटवर्क के विरुद्ध सख्त रुख अपनाती है।
- प्रतिक्रिया की तुलना में निवारण को प्राथमिकता: यह हमले के बाद की प्रतिक्रिया के बजाय खुफिया-अभियानों के माध्यम से आतंकवाद के निवारण को प्राथमिकता देती है, जिससे समन्वित नोडल तंत्र के माध्यम से रियल टाइम में खुफिया जानकारी साझाकरण सुनिश्चित होता है।
- विधि का शासन और मानवाधिकार: सभी आतंकवाद-रोधी अभियान संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों के अंतर्गत संचालित किए जाते हैं, जिससे मूल अधिकारों की सुरक्षा और कठोर न्यायिक निरीक्षण सुनिश्चित होता है।
- आतंकी इकोसिस्टम में व्यवधान: यह रणनीति वित्तपोषण, रसद, भर्ती, दुष्प्रचार और सुरक्षित ठिकानों को लक्षित करके पूरे आतंकी इकोसिस्टमको ध्वस्त करने पर केंद्रित है।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: आतंकवाद को एक पार-राष्ट्रीय खतरे के रूप में पहचानते हुए, प्रहार नीति वैश्विक संरेखण को बढ़ावा देने और सहयोगात्मक अंतरराष्ट्रीय प्रयासों पर जोर देती है।
‘प्रहार’ के सात स्तंभ
- निवारण (खुफिया अभियान): यह MAC और JTFI को सशक्त बनाकर ऑनलाइन कट्टरपंथ को रोकने के लिए साइबर निगरानी बढ़ाकर और उन्नत तकनीकों के माध्यम से सीमाओं एवं महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा में सुधार करने पर केंद्रित है।
- अनुक्रिया (त्वरित एवं सुसंगत): स्थानीय पुलिस ‘प्रथम प्रत्युत्तरकर्ता’ के रूप में कार्य करती है, जिन्हें विशेष राज्य बलों और NSG का सहयोग प्राप्त होता है। समयबद्ध और यथोचित कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए जांच का नेतृत्व NIA द्वारा किया जाता है।

- क्षमता निर्माण और आधुनिकीकरण का संयोजन: यह स्तंभ उन्नत हथियारों, फॉरेंसिक और साइबर क्षमताओं के उन्नयन पर जोर देता है, साथ ही BPR&D के माध्यम से सभी राज्यों में प्रशिक्षण को मानकीकृत करता है।
- मानवाधिकार और कानूनी ढांचा: आतंकवाद-रोधी प्रयास UAPA, भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, PMLA और शस्त्र एवं विस्फोटक अधिनियमों के तहत किए जाते हैं, जो न्यायिक समीक्षा, उचित प्रक्रिया और नागरिक स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
- कट्टरपंथ का शमन (कट्टपंथ रोधी और कट्टपंथ से मुक्ति): यह स्तंभ धार्मिक नेताओं और NGO के साथ सामुदायिक जुड़ाव, कमजोर युवाओं की काउंसलिंग, कारागार कट्टपंथ से मुक्ति कार्यक्रमों को बढ़ावा देता है और शिक्षा एवं रोजगार जैसी सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों से निपटता है।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का संरेखण: भारत MLATs (पारस्परिक कानूनी सहायता संधियाँ), प्रत्यर्पण संधियों, संयुक्त राष्ट्र में सदस्यता और द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से आतंकवाद-रोधी प्रयासों में तेजी लाता है।
- सामान्य स्थिति की बहाली और लचीलापन: यह स्तंभ सार्वजनिक-निजी भागीदारी, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पुनर्वास तथा आतंकी घटनाओं के बाद सामुदायिक विश्वास बहाली के माध्यम से ‘संपूर्ण-समाज’ दृष्टिकोण अपनाता है।
खतरों की प्रकृति
- सीमा पार आतंकवाद एक प्राथमिक खतरा बना हुआ है, जिसमें अल-कायदा और ISIS जैसे वैश्विक संगठन स्लीपर सेल के माध्यम से भारत को लक्षित कर रहे हैं।
- राज्य-प्रायोजित आतंकवाद और विदेशों में बैठे हैंडलर्स द्वारा हमलों को संचालित किए जाने के साक्ष्य।
- ड्रोन, एन्क्रिप्शन टूल, डार्क वेब प्लेटफॉर्म और क्रिप्टोकरेंसी जैसी उन्नत तकनीकों का बढ़ता उपयोग।
- आतंक और संगठित अपराध के बीच बढ़ता गठजोड़, जो रसद, भर्ती और वित्तपोषण की सुविधा प्रदान करता है।
- आपराधिक हैकर्स और शत्रु राष्ट्रों से बढ़ते साइबर खतरे।
- CBRNED (रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल, परमाणु, विस्फोटक, डिजिटल) क्षमताओं तक आतंकवादियों की पहुंच से संबंधित चिंताएं।
- दुष्प्रचार, भर्ती और आतंकवाद के संचालन में समन्वय हेतु सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म का उपयोग।
- विदेशी आतंकी संगठनों द्वारा स्थानीय नेटवर्क और ‘ओवरग्राउंड वर्कर्स’ का शोषण।
- सभी क्षेत्रों थल, वायु, समुद्री और डिजिटल में खतरे।
महत्व
- प्रथम एकीकृत आतंकवाद-रोधी सिद्धांत: प्रहार भारत की पहली औपचारिक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी रणनीति है, जो उभरते आतंकी खतरों और 2025 के पहलगाम हमले जैसी घटनाओं से आकार लेने वाले एक एकीकृत ढांचे को संस्थागत बनाती है।
- निवारक सुरक्षा मॉडल की ओर स्थानांतरण: यह नीति प्रतिक्रियात्मक अनुक्रियाओं से खुफिया-आधारित निवारण, पूर्व-नियोजित व्यवधान और रियल टाइम समन्वय की ओर संक्रमण को चिह्नित करती है।
- आतंकवाद-रोधी ढांचे का विकास: यह 2015 की वामपंथी उग्रवाद (LWE) कार्य योजना जैसी पूर्ववर्ती पहलों पर आधारित है और खंडित प्रतिक्रियाओं को एक एकल राष्ट्रीय सिद्धांत में समेकित करती है।
- संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण: नीति खुफिया एजेंसियों, केंद्रीय बलों, राज्य पुलिस और NIA जैसे विशिष्ट निकायों के बीच अंतर-एजेंसी समन्वय को संस्थागत बनाती है।
- संपूर्ण-समाज की भागीदारी: यह नीति नागरिक समाज और निजी हितधारकों को शामिल करके आतंकवाद-विरोधी प्रयासों का विस्तार सुरक्षा एजेंसियों से आगे तक करती है, ताकि सामाजिक लचीलापन को बढ़ाया जा सके।
- भविष्य के लिए तैयार सुरक्षा संरचना: यह साइबर आतंकवाद, ड्रोन युद्ध और डिजिटल कट्टरपंथ जैसे उभरते खतरों की पहचान करती है, जिससे भारत का सुरक्षा ढांचा प्रौद्योगिकी-संचालित बन जाता है।
- पार-राष्ट्रीय आतंकवाद की पहचान: यह सिद्धांत खुफिया जानकारी साझा करने, प्रत्यर्पण तंत्र और बहुपक्षीय जुड़ाव के माध्यम से वैश्विक सहयोग पर बल देता है।
- नियामक और रणनीतिक महत्व: प्रहार नीति भारत के इस रुख को बल प्रदान करती है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और यह वैश्विक आतंकवाद-रोधी मानकों को आकार देने में भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण मानती है।
