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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन; बुनियादी ढाँचा: बंदरगाह।
संदर्भ: समुद्री क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कांडला में अपनी पहली बंदरगाह-आधारित ई-मेथनॉल उत्पादन सुविधा की आधारशिला रखी, जिसमें ₹2,300 करोड़ का निवेश किया जाएगा।
भारत के पहले पोर्ट-आधारित ई-मेथनॉल संयंत्र के बारे में
• स्थान और क्षमता: यह संयंत्र दीनदयाल पोर्ट प्राधिकरण (DPA), कांडला, गुजरात में स्थापित किया जा रहा है, जिसकी कुल उत्पादन क्षमता प्रतिदिन 150 टन ई-मेथनॉल होगी, जिससे यह भारत की सबसे बड़ी ई-मेथनॉल उत्पादन सुविधाओं में से एक बन जाएगा।
• भागीदार और निवेश: ₹2,300 करोड़ की यह परियोजना दीनदयाल पोर्ट प्राधिकरण (DPA) और असम पेट्रो-केमिकल्स लिमिटेड (APCL), नमरूप की संयुक्त पहल है, जिसमें DPA और APCL के बीच पूंजी योगदान का अनुपात 76:24 है।
• चरणबद्ध विकास: चरण-I के तहत ₹1,200 करोड़ के निवेश से प्रतिदिन 50 टन उत्पादन क्षमता जोड़ी जाएगी और इसे जनवरी 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य है, जबकि चरण-II के तहत ₹1,100 करोड़ के निवेश से मार्च 2027 तक प्रतिदिन अतिरिक्त 100 टन उत्पादन क्षमता जोड़ी जाएगी।
• इनपुट और अवसंरचना: संयंत्र में नवीकरणीय ऊर्जा, जल और जैवजनित CO₂ का उपयोग करके ई-मेथनॉल का उत्पादन किया जाएगा, जबकि DPA द्वारा ₹567.32 करोड़ की इक्विटी, 75 एकड़ भूमि, अलवणीकृत जल और हरित हाइड्रोजन के रूप में नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध कराई जाएगी; इस परियोजना से 3,500 से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की उम्मीद है।
ई-मेथनॉल के बारे में
• ई-मेथनॉल एक निम्न-कार्बन विद्युत-आधारित ईंधन (ई-ईंधन) है, जिसका उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करके हरित हाइड्रोजन को पुनर्चक्रित या जैवजनित CO₂ के साथ संयोजित करके किया जाता है।
• उत्पादन प्रक्रिया: नवीकरणीय विद्युत का उपयोग जल के विद्युत अपघटन के माध्यम से हरित हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए किया जाता है। इसके बाद हरित हाइड्रोजन को CO₂ के साथ संश्लेषण प्रक्रिया में संयोजित करके ई-मेथनॉल का उत्पादन किया जाता है।
• समुद्री ईंधन: ई-मेथनॉल का उपयोग अधिक स्वच्छ समुद्री ईंधन के रूप में किया जा सकता है और यह विशेष रूप से डीकार्बोनाइजेशन के लिए कठिन क्षेत्र (hard-to-abate sector) शिपिंग के लिए प्रासंगिक है। यह जीवन-चक्र के दौरान होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में सहायता करता है।
• बहुआयामी उपयोग: शिपिंग के अलावा, ई-मेथनॉल का उपयोग ई-गैसोलीन, सतत विमानन ईंधन और अन्य रसायनों के उत्पादन के लिए फीडस्टॉक के रूप में किया जा सकता है। साथ ही, यह नवीकरणीय हाइड्रोजन के लिए एक सुविधाजनक तरल वाहक के रूप में भी कार्य कर सकता है।
ई-मेथनॉल संयंत्र का महत्व
• समुद्री डीकार्बोनाइजेशन: यह सुविधा एशिया-यूरोप अंतरराष्ट्रीय व्यापार गलियारे पर संचालित होने वाले जहाजों को ई-मेथनॉल की आपूर्ति करेगी, जिससे अधिक स्वच्छ अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की ओर संक्रमण को समर्थन मिलेगा।
• लागत प्रतिस्पर्धात्मकता: इस परियोजना से लगभग 750 अमेरिकी डॉलर प्रति टन की लागत पर हरित मेथनॉल का उत्पादन होने की उम्मीद है, जबकि वैश्विक दर लगभग 1,300 अमेरिकी डॉलर प्रति टन है। इससे उभरते हरित-ईंधन बाजार में भारत की संभावित प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत होगी।
• हरित-ईंधन निर्यात केंद्र: यह परियोजना कांडला की हरित-ईंधन केंद्र के रूप में भूमिका को मजबूत कर सकती है तथा वैश्विक शिपिंग के लिए हरित ईंधनों का उत्पादक और निर्यातक बनने की भारत की महत्वाकांक्षा को समर्थन दे सकती है।
• हरित ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र: इस संयंत्र से कांडला के आसपास व्यापक हरित-ऊर्जा मूल्य शृंखला को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है, जिसमें परिवहन, भंडारण, आपूर्ति और संबंधित सहायक गतिविधियाँ शामिल हैं। साथ ही, यह भारत के 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और मेक इन इंडिया को समर्थन देगा।
समुद्री डीकार्बोनाइजेशन की दिशा में सरकारी पहल
• राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (2023): जनवरी 2023 में शुरू किया गया यह मिशन भारत को हरित हाइड्रोजन और इसके व्युत्पन्न उत्पादों के उत्पादन, उपयोग तथा निर्यात के लिए एक वैश्विक केंद्र बनाने का लक्ष्य रखता है। इसमें शिपिंग जैसे क्षेत्रों के लिए हरित ईंधन भी शामिल हैं।
• हरित सागर ग्रीन पोर्ट दिशानिर्देश (2023): 2023 में शुरू किए गए ये दिशानिर्देश नवीकरणीय ऊर्जा, तट-से-जहाज विद्युत आपूर्ति, बंदरगाह उपकरणों का विद्युतीकरण, हरित पट्टियों और सतत अपशिष्ट प्रबंधन के माध्यम से सतत बंदरगाह विकास को बढ़ावा देते हैं।
• ग्रीन टग ट्रांजिशन कार्यक्रम (2024): पंच कर्म संकल्प के अंतर्गत 2024 में शुरू किया गया यह कार्यक्रम पारंपरिक ईंधन-आधारित हार्बर टग को अधिक हरित विकल्पों में परिवर्तित करने को बढ़ावा देता है तथा घरेलू विनिर्माण को समर्थन प्रदान करता है।
• मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 (2021) और मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047 (2023): ये दीर्घकालिक समुद्री रोडमैप हरित बंदरगाहों, वैकल्पिक ईंधनों, हरित शिपिंग गलियारों, सतत पोत निर्माण और अधिक स्वच्छ समुद्री अवसंरचना को बढ़ावा देते हैं।
