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सामान्य अध्ययन-3: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जागरूकता एवं बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषय।

संदर्भ : भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता, आपूर्ति श्रृंखला की सुदृढ़ता, नवाचार तथा वैश्विक प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए एकीकृत अर्धचालक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर रहा है।

भारत का अर्धचालक पारिस्थितिकी तंत्र

  • भारत अर्धचालक मिशन दिसंबर 2021 में शुरू किया गया था। इसके अंतर्गत सेमीकॉन 1.0 कार्यक्रम के लिए 76,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया, जिसका उद्देश्य चिप डिजाइन, चिप निर्माण, पैकेजिंग, परीक्षण, उपकरण, सामग्री और कुशल मानव संसाधन सहित भारत के अर्धचालक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना था।
  • सेमीकॉन 2.0 को जुलाई 2026 में 1,27,500 करोड़ रुपये के प्रावधान के साथ मंजूरी दी गई। इसके तहत चिप डिजाइन, अर्धचालक उपकरण एवं सामग्री, चिप निर्माण संयंत्र, उन्नत पैकेजिंग, अनुसंधान एवं विकास तथा मानव संसाधन विकास पर अधिक ध्यान दिया गया है।
  • विनिर्माण एवं डिजाइन क्षमता: छह राज्यों में 12 अर्धचालक परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धता है। इनमें से तीन संयंत्रों में वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हो चुका है।
    • इन परियोजनाओं में सिलिकॉन एवं यौगिक अर्धचालक निर्माण, प्रदर्शन-पटल निर्माण तथा उन्नत पैकेजिंग शामिल हैं। इनसे ऑटोमोबाइल, दूरसंचार, एयरोस्पेस, विद्युत इलेक्ट्रॉनिक्स और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों को सहायता मिलेगी।
  • स्वदेशी चिप डिजाइन: डिजाइन-आधारित प्रोत्साहन योजना दिसंबर 2021 में शुरू की गई, जबकि चिप्स टू स्टार्ट-अप कार्यक्रम वर्ष 2022 में शुरू किया गया। इनका उद्देश्य स्वदेशी अर्धचालक डिजाइन क्षमता और कौशल विकास को मजबूत करना है।
    • 16 टेप-आउट में से 7 चिप सफलतापूर्वक निर्मित की जा चुकी हैं, जिनमें 12 नैनोमीटर जैसी उन्नत प्रौद्योगिकी पर आधारित डिजाइन भी शामिल हैं।
  • वैश्विक साझेदारियाँ: भारत की अर्धचालक संबंधी महत्वाकांक्षाओं को संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, सिंगापुर, नीदरलैंड, जर्मनी और यूरोपीय संघ के साथ साझेदारियों से समर्थन मिल रहा है।
    • सेमीकॉन इंडिया 2025 में 48 देशों और क्षेत्रों के 350 से अधिक प्रदर्शकों एवं प्रतिभागियों ने भाग लिया। इस दौरान 12 समझौता ज्ञापन घोषित किए गए।

भारत का कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र

  • इंडियाएआई मिशन को मार्च 2024 में मंजूरी दी गई थी। इसके लिए पाँच वर्षों में 10,371.92 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य एक मजबूत और समावेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।
  • इस मिशन के सात प्रमुख स्तंभ हैं — कृत्रिम बुद्धिमत्ता संगणना, आधारभूत मॉडल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता संबंधी आँकड़ा-संग्रह, अनुप्रयोग विकास, भविष्य के कौशल, नवाचार प्रारंभिक उद्यमों के लिए वित्तपोषण तथा सुरक्षित एवं विश्वसनीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता संगणना एवं अवसंरचना: साझा संगणन क्षमता बढ़कर 45,000 से अधिक ग्राफिक्स प्रसंस्करण इकाइयों तक पहुँच गई है। इससे भारतीय नवाचार प्रारंभिक उद्यमों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों को उच्च-प्रदर्शन संगणना तक किफायती पहुँच मिल रही है तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता में नवाचार को अधिक व्यापक बनाने में सहायता मिल रही है।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए तैयार आँकड़े एवं बहुभाषी कृत्रिम बुद्धिमत्ता: एआईकोश कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए तैयार आँकड़ा-संग्रह और कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल तक पहुँच प्रदान करता है।  भाषिणी बहुभाषी आँकड़ा-संग्रह और भाषा प्रौद्योगिकियाँ उपलब्ध कराती है, जिससे भारत की भाषाई विविधता के अनुरूप कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुप्रयोगों को विकसित करने में सहायता मिलती है।
  • स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षमता: भारत स्वदेशी आधारभूत कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल विकसित करने का समर्थन कर रहा है। इसमें भारतजेन जैसी पहल शामिल हैं, जिनका उद्देश्य भारतीय भाषाओं, आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप बहुभाषी एवं बहु-माध्यमीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित करना है।
  • उत्तरदायी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुसंधान एवं कौशल: सुरक्षित एवं विश्वसनीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्तंभ के अंतर्गत पूर्वाग्रह, कृत्रिम रूप से निर्मित भ्रामक सामग्री, निजता, व्याख्येयता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े जोखिमों जैसे विषयों पर परियोजनाएँ संचालित की जा रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान और कौशल को मजबूत करने के लिए 58 कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्कृष्टता केंद्र तथा 543 आँकड़ा एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रयोगशालाएँ विकसित की जा रही हैं।

अर्धचालक एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्रांति का महत्व

  • तकनीकी आत्मनिर्भरता एवं सुदृढ़ता: घरेलू अर्धचालक निर्माण, स्वदेशी चिप डिजाइन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षमताएँ विदेशी निर्भरता को कम करने तथा आपूर्ति श्रृंखला की सुदृढ़ता बढ़ाने में सहायता कर सकती हैं।
  • सामरिक एवं आर्थिक महत्व: अर्धचालक अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए आवश्यक हैं, जबकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान, नवाचार, शासन और सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में लगातार अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है।
  • नवाचार एवं रोजगार: इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन स्वचालन उपकरण, ग्राफिक्स प्रसंस्करण इकाइयों, आँकड़ा-संग्रह, कृत्रिम बुद्धिमत्ता अवसंरचना और अनुसंधान सुविधाओं तक पहुँच से नए उद्यमों के लिए प्रवेश की बाधाएँ कम हो सकती हैं और उच्च-मूल्य वाले रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
  • वैश्विक तकनीकी नेतृत्व: चिप निर्माण, स्वदेशी डिजाइन, उन्नत संगणना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल, आँकड़े और अनुसंधान को एकीकृत करने से भारत की तकनीकी क्षमताएँ मजबूत होंगी तथा विकसित भारत के लक्ष्य को समर्थन मिलेगा।

अर्धचालक एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्रांति की चुनौतियाँ

  • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता: भारत अभी भी महत्वपूर्ण अर्धचालक उपकरणों, सामग्रियों तथा उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता संगणना हार्डवेयर के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर है।
  • उच्च पूँजी एवं अवसंरचनात्मक आवश्यकताएँ: अर्धचालक निर्माण तथा उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए विनिर्माण, आँकड़ा केंद्रों, संगणना, ऊर्जा और विशेषीकृत अवसंरचना में बड़े निवेश की आवश्यकता होती है।
  • प्रौद्योगिकी एवं प्रतिभा का अभाव: भारत को अर्धचालक निर्माण, उन्नत पैकेजिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान, चिप डिजाइन तथा उच्च-प्रदर्शन संगणना के क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं को और गहरा करने की आवश्यकता है।
  • आँकड़ा एवं उत्तरदायी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े जोखिम: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए तैयार आँकड़ों की सीमित उपलब्धता, निजता संबंधी चिंताएँ, अल्गोरिथ्मिक पूर्वाग्रह, कृत्रिम रूप से निर्मित भ्रामक सामग्री, गलत सूचना तथा साइबर सुरक्षा जोखिम सुरक्षित कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपनाने में बाधा डाल सकते हैं।

आगे की राह

  • संपूर्ण मूल्य श्रृंखला का विकास: भारत को चिप डिजाइन और निर्माण से लेकर पैकेजिंग, परीक्षण, उपकरण तथा सामग्री तक अर्धचालक मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना चाहिए तथा इसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ एकीकृत करना चाहिए।
  • स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करना: रणनीतिक निर्भरता कम करने के लिए ग्राफिक्स प्रसंस्करण इकाइयों, प्रोसेसर, त्वरक, अर्धचालक उपकरण, बौद्धिक संपदा और उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रौद्योगिकियों के विकास पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
  • अनुसंधान एवं प्रतिभा का विस्तार: गहन प्रौद्योगिकी क्षमताओं और भविष्य के लिए तैयार कौशल विकसित करने हेतु सरकार, उद्योग, विश्वविद्यालयों, नवाचार प्रारंभिक उद्यमों और अनुसंधान संस्थानों के बीच अधिक मजबूत सहयोग आवश्यक है।
  • विश्वसनीय वैश्विक एकीकरण को बढ़ावा देना: भारत को प्रौद्योगिकी, निवेश, आपूर्ति श्रृंखला की सुदृढ़ता, अनुसंधान और वैश्विक मानकों के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को मजबूत करना चाहिए, साथ ही उत्तरदायी एवं सुरक्षित कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
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