संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।
संदर्भ: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 में संशोधन करते हुए प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2026 अधिसूचित किए।
2026 संशोधन नियमों की मुख्य विशेषताएँ
• EPR लक्ष्यों की समयसीमा को गे बढ़ाना: जो कंपनियाँ वर्ष 2025-26 में पुनर्चक्रण लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही हैं, वे इन लक्ष्यों को आगामी 3 वर्षों (2026-27 से) के लिए आगे बढ़ा सकती हैं, बशर्ते कि वे प्रतिवर्ष इस कमी का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा पूरा करें।
- यह कठोर वार्षिक अनुपालन से हटकर लचीले बहु-वर्षीय अनुपालन की ओर बदलाव को दर्शाता है।
• पुनर्चक्रित प्लास्टिक का अनिवार्य उपयोग: उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों के लिए पैकेजिंग में पुनर्चक्रित प्लास्टिक का उपयोग अनिवार्य है। इसके लिए श्रेणीवार प्रगतिशील लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं: श्रेणी I (कठोर प्लास्टिक): 2028-29 तक 30% से बढ़ाकर 60%। श्रेणी II (लचीला प्लास्टिक): 10% से बढ़ाकर 20%। श्रेणी III (बहु-स्तरीय प्लास्टिक): 5% से बढ़ाकर 10%।
- अनिवार्य लेबलिंग और अंकन (मार्किंग) के माध्यम से पुनर्चक्रित सामग्री के उपयोग को दर्शाना आवश्यक है।
• पुन: उपयोग की बाध्यता: अच्छी पैकेजिंग के लिए विशिष्ट पुन: उपयोग लक्ष्य पेश किए गए हैं, जिसमें छोटे कंटेनरों के लिए लगभग 10% और बड़े वाटर पैकेजिंग के लिए 70% तक का लक्ष्य शामिल है।
- समय के साथ इन लक्ष्यों में धीरे-धीरे वृद्धि की जाएगी।
• व्यापार योग्य EPR प्रमाणपत्र (बाजार तंत्र): एक प्लास्टिक क्रेडिट ट्रेडिंग प्रणाली शुरू की गई है, जहाँ कंपनियाँ उन संस्थाओं से प्रमाणपत्र खरीद सकती हैं जिन्होंने अपने लक्ष्यों से अधिक उपलब्धि प्राप्त की है। यह लागत-कुशल अनुपालन को सक्षम बनाता है, किंतु प्रत्यक्ष जिम्मेदारी को कम करता है।
• जीवन-अंत निपटान (End-of-Life Disposal) की अनुमति: इन नियमों में स्पष्ट रूप से ‘अपशिष्ट से ऊर्जा’, सीमेंट और इस्पात उद्योगों में सह-प्रसंस्करण, अपशिष्ट से तेल रूपांतरण और सड़क निर्माण में उपयोग जैसे ऊर्जा प्राप्ति के तरीकों को शामिल किया गया है।
• लक्ष्यों से छूट: खाद्य सुरक्षा मानकों और औषधि विनियमों द्वारा प्रतिबंधित स्थानों पर पुनर्चक्रित सामग्री के उपयोग के लक्ष्य लागू नहीं होंगे।
- इसकी निगरानी भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) तथा केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) द्वारा की जाएगी।
• सुदृढ़ निगरानी और शासन: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा एक केंद्रीकृत रिपोर्टिंग प्रणाली लागू की जाएगी। साथ ही, राज्य/केंद्र शासित प्रदेश स्तर की निगरानी समितियों और स्थानीय निकायों को प्रवर्तन अधिकारियों के रूप में नियुक्त किया गया है। अनुपालन की ट्रैकिंग एक डिजिटल पोर्टल के माध्यम से की जाएगी।
• EPR ढांचे की निरंतरता (2022 से): ये नियम 100% संग्रह लक्ष्य (2024-25 तक) और पुनर्चक्रण एवं पुन: उपयोग में चरणबद्ध वृद्धि को बरकरार रखते हैं।
- इसकी शुरुआत से अब तक 20.7 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का पुनर्चक्रण किया जा चुका है।
चिंताएँ / चुनौतियाँ
• जवाबदेही में कमी: लक्ष्यों की समयसीमा को आगे बढ़ाने के प्रावधान को कंपनियों के लिए एक “निकास मार्ग” के रूप में देखा जा रहा है, जिससे प्रमुख एफएमसीजी (FMCG) कंपनियों द्वारा की जाने वाली वास्तविक कार्रवाई में देरी हो सकती है।
• अपशिष्ट से ऊर्जा की संदिग्ध प्रभावशीलता: प्लास्टिक को जलाने का संबंध विषाक्त उत्सर्जन (जैसे डाइऑक्सिन, फ्यूरान, भारी धातुएं) और माइक्रो/नैनो-प्लास्टिक प्रदूषण से है। वैज्ञानिक आधार न होने के कारण इस पद्धति की आलोचना की जाती है।
• खराब अनुपालन और डेटा अंतराल: 100% ईपीआर (EPR) संग्रह लक्ष्य प्राप्त करने का कोई सत्यापित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह प्रणाली काफी हद तक स्व-रिपोर्टिंग पर निर्भर है और इसमें लगभग 6 लाख फर्जी ईपीआर प्रमाणपत्रों के मामले भी सामने आए हैं।
• सीमित पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग क्षमता: भारत में बड़े पैमाने पर पुन: उपयोग प्रणालियों और कुशल पृथक्करण एवं प्रसंस्करण के लिए बुनियादी ढांचे का अभाव है। वर्तमान में पैकेजिंग (प्लास्टिक उपयोग का लगभग 40%) काफी हद तक ‘सिंगल-यूज़’ (एकल-उपयोग) बनी हुई है।
• छूट से लक्ष्यों पर प्रभाव: खाद्य और फार्मास्युटिकल क्षेत्रों को बाहर रखने से चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण का दायरा सीमित हो जाता है।
• क्रेडिट ट्रेडिंग के जोखिम: कंपनियाँ वास्तविक पुनर्चक्रण के बजाय क्रेडिट खरीद सकती हैं, जिससे “प्रदूषक भुगतान करे” का सिद्धांत हतोत्साहित हो सकता है।
महत्व
• चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना: पुनर्चक्रित सामग्री के अनिवार्य उपयोग और पुन: उपयोग की बाध्यता से संसाधन दक्षता को बढ़ावा मिलता है तथा ‘वर्जिन प्लास्टिक’ (नया प्लास्टिक) के उपयोग में कमी आती है।
• बाजार-आधारित पर्यावरणीय शासन: व्यापार योग्य प्रमाणपत्र प्रणाली लचीलापन और लागत-कुशलता लाती है, जो वैश्विक कार्बन और क्रेडिट ट्रेडिंग मॉडल के अनुरूप है।
• संस्थागत सुदृढ़ीकरण: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और स्थानीय निकायों को शामिल करने वाली एक बहु-स्तरीय शासन प्रणाली, निगरानी और जवाबदेही को बढ़ाती है।
• विकास के साथ नीतिगत निरंतरता: यह संशोधन ईपीआर (EPR) ढांचे (2022) पर आधारित है और एक अधिक संरचित एवं लचीली अनुपालन प्रणाली का मार्ग प्रशस्त करता है।
