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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: हाल ही में, केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को वैश्विक बाजारों के लिए सशक्त बनाने हेतु निर्यात प्रोत्साहन मिशन (Export Promotion Mission – EPM) के अंतर्गत सात अतिरिक्त हस्तक्षेपों का शुभारंभ किया।
अन्य संबंधित जानकारी
- ये हस्तक्षेप भारतीय निर्यातकों द्वारा सामना की जाने वाली प्रमुख चुनौतियों का समाधान करने, व्यापक और समावेशी निर्यात वृद्धि को बढ़ावा देने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी निर्यात केंद्र के रूप में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए विकसित किए गए हैं।
- उनका उद्देश्य MSMEs द्वारा सामना की जाने वाली संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना है, जिसमें पूंजी की उच्च लागत, विविध व्यापार वित्त साधनों तक सीमित पहुंच, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनुपालन का बोझ, रसद संबंधी कमियां और बाजार प्रवेश में बाधाएं शामिल हैं।
- यह घोषणा विश्व सामाजिक न्याय दिवस के अवसर पर समावेशी विकास और हाशिए पर रहने वाले वर्गों के सशक्तिकरण पर जोर देते हुए की गई थी।
- केंद्रीय मंत्री ने रेखांकित किया कि नौ संपन्न मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के माध्यम से वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 70% और वैश्विक व्यापार का दो-तिहाई हिस्सा अब भारत के लिए सुलभ है।
निर्यात प्रोत्साहन मिशन (EPM) के तहत सात हस्तक्षेप
निर्यात प्रोत्साहन वित्तीय सहायता
- वैकल्पिक व्यापार साधनों के लिए सहायता (निर्यात फैक्टरिंग): यह MSMEs के लिए कार्यशील पूंजी समाधान के रूप में ‘निर्यात फैक्टरिंग’ को बढ़ावा देता है, जिसमें 2.75% ब्याज सहायता और डिजिटल दावा तंत्र के माध्यम से ₹50 लाख की वार्षिक सहायता सीमा निर्धारित है।
- ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए ऋण सहायता: यह ब्याज सहायता और आंशिक गारंटी के साथ संरचित ऋण प्रदान करता है। इसमें प्रत्यक्ष ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए ₹50 लाख तक और विदेशी इन्वेंट्री वित्तपोषण के लिए ₹5 करोड़ तक की सहायता शामिल है।
- उभरते निर्यात अवसरों के लिए सहायता: यह निर्यातकों को साझा जोखिम और ऋण-आधारित वित्तीय साधनों के माध्यम से नए या उच्च-जोखिम वाले बाजारों में प्रवेश करने में सक्षम बनाता है।
निर्यात दिशा इकोसिस्टम समर्थन
- TRACE (व्यापार विनियम, प्रत्यायन और अनुपालन सक्षमता): यह अंतरराष्ट्रीय परीक्षण, निरीक्षण और प्रमाणन आवश्यकताओं को पूरा करने में निर्यातकों की सहायता करता है, जिसमें प्रति IEC (आयात-निर्यात कोड) ₹25 लाख की वार्षिक सीमा के साथ 75% तक प्रतिपूर्ति दी जाती है।
- FLOW (रसद, विदेशी भंडारण और पूर्ति की सुविधा): यह विदेशी भंडारण और पूर्ति बुनियादी ढांचे के लिए अधिकतम तीन वर्षों के लिए अनुमोदित परियोजना लागत के 30% तक सहायता प्रदान करता है।
- LIFT (माल ढुलाई और परिवहन के लिए रसद हस्तक्षेप): यह कम निर्यात तीव्रता वाले जिलों के निर्यातकों के लिए पात्र माल ढुलाई व्यय की 30% तक प्रतिपूर्ति प्रदान करता है, जिसकी सीमा ₹20 लाख प्रति IEC प्रति वर्ष है।
- INSIGHT (व्यापार सूचना और सुविधा के लिए एकीकृत सहायता): यह निर्यातकों की क्षमता निर्माण और व्यापार सूचना प्रणालियों को मजबूत करता है। इसमें परियोजना लागत का 50% और सरकारी संस्थानों व विदेशों में भारतीय मिशनों के लिए 100% तक वित्तीय सहायता दी जाती है।
निर्यात प्रोत्साहन मिशन के बारे में

- इस मिशन की घोषणा केंद्रीय बजट 2025-26 में एक बड़े संरचनात्मक सुधार के रूप में की गई थी, जो कई खंडित निर्यात सहायता योजनाओं को एक एकल परिणाम-आधारित और डिजिटल रूप से सक्षम ढांचे में विलय करता है।
- वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31 की अवधि के लिए इस मिशन का कुल वित्तीय परिव्यय ₹25,060 करोड़ है।
- इस मिशन का उद्देश्य किफायती व्यापार वित्त (Trade Finance) तक पहुँच में सुधार करके और विभिन्न क्षेत्रों तथा प्रदेशों में वैश्विक बाजार तत्परता और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाकर भारत के निर्यात इकोसिस्टम को सुदृढ़ करना है।
- यह मिशन निरंतर और समावेशी निर्यात वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए एक एकीकृत (Unified) और प्रदर्शन-संचालित तंत्र बनाने पर केंद्रित है।
- यह मिशन एक ऐसे संस्थागत ढांचे पर आधारित है जिसमें वाणिज्य विभाग, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, निर्यात संवर्धन परिषदें, पण्य बोर्ड (Commodity Boards), वित्तीय संस्थान, उद्योग संघ और राज्य सरकारें शामिल हैं।
- निर्यात प्रोत्साहन मिशन, ‘निर्यात प्रोत्साहन’ के तहत वित्तीय सक्षमकर्ताओं और ‘निर्यात दिशा’ के तहत व्यापार इकोसिस्टम समर्थकों को संयोजित करके एक समग्र इकोसिस्टम दृष्टिकोण अपनाता है।
- निर्यात प्रोत्साहन (वित्तीय सक्षमकर्ता): यह उप-योजना विभिन्न साधनों के माध्यम से MSME निर्यातकों के लिए वहनीय व्यापार वित्त तक पहुँच में सुधार करने पर केंद्रित है, जैसे— शिपमेंट पूर्व और शिपमेंट पश्चात ऋण पर ब्याज सहायता, निर्यात-फैक्टरिंग और डीप-टियर फाइनेंसिंग, ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए क्रेडिट कार्ड, निर्यात ऋण हेतु संपार्श्विक सहायता और नए या उच्च-जोखिम वाले बाजारों के लिए ऋण-संवर्द्धन।
- निर्यात दिशा (गैर-वित्तीय सक्षमकर्ता): इस उप-योजना का उद्देश्य निर्यात गुणवत्ता और अनुपालन (परीक्षण, प्रमाणन, ऑडिट), अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग और पैकेजिंग सहायता, व्यापार मेलों और क्रेता-विक्रेता सम्मेलनों में भागीदारी, निर्यात भंडारण और रसद, दूरस्थ-जिला निर्यातकों के लिए अंतर्देशीय परिवहन प्रतिपूर्ति, और समूहों, संघों तथा जिला-स्तरीय सुविधा केंद्रों में क्षमता निर्माण के माध्यम से बाजार तत्परता और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है।
निर्यात प्रोत्साहन मिशन का महत्व
- यह मिशन वित्तीय और गैर-वित्तीय सहायता को एक एकल, डिजिटल-संचालित ढांचे में एकीकृत करके भारत के निर्यात इकोसिस्टम को सुदृढ़ता प्रदान करता है।
- यह किफायती व्यापार वित्त तक पहुंच में सुधार और अनुपालन लागत को कम करके MSME की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाता है।
- यह वैश्विक टैरिफ वृद्धि से प्रभावित क्षेत्रों जैसे वस्त्र, चमड़ा, इंजीनियरिंग सामान और समुद्री उत्पादों में रोजगार और निर्यात आदेशों की रक्षा करने में मदद करता है।
यह उच्च रसद लागत, कमजोर निर्यात ब्रांडिंग और खंडित बाजार पहुंच जैसी संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान करता है, जिससे दीर्घकालिक निर्यात लचीलापन सुनिश्चित होता है।
