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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन|

संदर्भ: हाल ही में, भारत ने जैविक विविधता अभिसमय (CBD) के अंतर्गत ‘आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच और लाभ साझाकरण’ (ABS) पर नागोया प्रोटोकॉल के कार्यान्वयन के संबंध में अपनी पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट (NR1) प्रस्तुत की।

अन्य संबंधित जानकारी

  • यह रिपोर्ट पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) के सहयोग से CBD सचिवालय को अनुच्छेद 29 (निगरानी और रिपोर्टिंग) के तहत सौंपी गई है।
  • यह रिपोर्ट 1 नवंबर 2017 से 31 दिसंबर 2025 तक की अवधि को कवर करती है। यह ABS प्रावधानों को लागू करने में भारत की प्रगति का आकलन करती है और अद्यतन राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP) के लक्ष्य 13 में योगदान देती है।
  • इससे पहले भारत ने नवंबर 2017 में एक अंतरिम राष्ट्रीय रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।
  • भारत का ABS फ्रेमवर्क जैविक विविधता अधिनियम 2002 जैविक विविधता नियम 2024, ABS विनियम, 2025 द्वारा शासित होता है।
  • यह फ्रेमवर्क एक त्रिस्तरीय संस्थागत संरचना द्वारा संचालित होता है।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA)
    • राज्य जैवविविधता बोर्ड (SBBs)/केंद्र शासित प्रदेश  जैवविविधता परिषदें
    • स्थानीय स्तर पर जैवविविधता प्रबंधन समितियाँ (BMCs)
  • पूरे देश में 2,76,653 से अधिक जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) की स्थापना की जा चुकी है जो जैव विविधता शासन और लाभ साझाकरण में सशक्त सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करता है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु  

  • ABS अनुमोदन और विनियामक ढांचा: वर्ष 2017-2025 के दौरान कुल 12,830 ABS अनुमोदन प्रदान किए गए, जिनमें राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) द्वारा (विदेशी संस्थाओं और गतिविधियों के लिए) दिए गए 5,913 अनुमोदन और राज्य जैव विविधता बोर्डों (SBBs/UTBCs) द्वारा धारा 7 के तहत भारतीय संस्थाओं को वाणिज्यिक उपयोग के लिए दिए गए 6,917 अनुमोदन शामिल हैं।
  • वैश्विक अनुपालन में नेतृत्व (IRCCs): भारत ने ABS ‘क्लियरिंग-हाउस’ पर 3,556 अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अनुपालन प्रमाण पत्र (IRCCs) प्रकाशित किए हैं। यह वैश्विक कुल योग का 60% से अधिक है, जो पारदर्शिता और अनुपालन तंत्र में भारत के वैश्विक नेतृत्व को रेखांकित करता है।
  • लाभ साझाकरण के परिणाम: NBA अनुमोदनों के माध्यम से ₹216.31 करोड़ की राशि जुटाई गई, जिसमें से ₹139.69 करोड़ लाभ के दावेदारों को वितरित किए गए; साथ ही SBB/UTBC अनुमोदनों से ₹51.96 करोड़ प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त, 395 अनुमोदनों में गैर-मौद्रिक लाभ शामिल थे, जैसे क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और सहयोगात्मक अनुसंधान।
  • विदेशी जैविक संसाधनों का विनियमन: भारत विदेशी स्रोतों से प्राप्त जैविक संसाधनों और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान के उपयोग की निगरानी करता है, जिसके तहत जैविक विविधता ढांचे के अनुसार फॉर्म 10 के अंतर्गत 41 घोषणाएं प्राप्त हुई हैं।
  • क्षमता निर्माण और जागरूकता: 3,724 कार्यशालाओं और 600 से अधिक राष्ट्रव्यापी क्षमता निर्माण पहलों के माध्यम से कुल 2,56,393 व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया गया है।
  • संस्थागत शक्ति और सामुदायिक भागीदारी: जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) के व्यापक नेटवर्क ने जमीनी स्तर पर जैव विविधता शासन को सुदृढ़ किया है, जो संरक्षण, आजीविका सहायता और पारंपरिक ज्ञान धारकों के समावेश में योगदान दे रहा है

पहुँच और लाभ साझाकरण (ABS) पर नागोया प्रोटोकॉल के बारे में

  • इसे 5 जून 1992 को रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन (में हस्ताक्षर के लिए खोला गया था और यह 29 दिसंबर 1993 को प्रभावी हुआ।
  • यह जैव विविधता को संबोधित करने वाला एकमात्र व्यापक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जो तीन मुख्य उद्देश्यों पर निर्मित है: जैविक विविधता का संरक्षण, इसके घटकों का सतत उपयोग, और आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त होने वाले लाभों का न्यायोचित और समान साझाकरण।
  • हालाँकि, तीसरे उद्देश्य—लाभ साझाकरण का प्रभावी क्रियान्वयन एक चुनौती बना रहा।
  • इस अंतराल को पाटने के लिए, सतत विकास पर विश्व शिखर सम्मेलन (2002) में पहुँच और लाभ साझाकरण (ABS) पर एक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था बनाने का आह्वान किया गया।
  • इसके पश्चात, वर्ष 2004 में CBD के पक्षकारों के सम्मेलन (COP-7) ने ABS पर एक ‘तदर्थ मुक्त कार्य समूह’ (Ad Hoc Open-ended Working Group) के माध्यम से औपचारिक वार्ता शुरू की। इसका मुख्य ध्यान अनुच्छेद 15 (आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच) और अनुच्छेद 8(j) (पारंपरिक ज्ञान) के कार्यान्वयन पर केंद्रित था।
  • लगभग छह वर्षों की वार्ता के बाद, यह प्रक्रिया 29 अक्टूबर 2010 को जापान के नागोया में आयोजित COP-10 के दौरान नागोया प्रोटोकॉल को अपनाए जाने के साथ संपन्न हुई। यह आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त लाभों के न्यायोचित और समान साझाकरण को सुनिश्चित करने के लिए एक विधिक ढांचा प्रदान करता है।
  • प्रोटोकॉल के उद्देश्य:
    • इस प्रोटोकॉल का उद्देश्य आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से उत्पन्न होने वाले लाभों का न्यायोचित और समान साझाकरण सुनिश्चित करना है। इसे समुचित पहुँच, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और पर्याप्त वित्तपोषण तंत्र के माध्यम से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है।
    • यह जैव विविधता के संरक्षण और इसके घटकों के सतत उपयोग में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
  • मुख्य विशेषताएँ और प्रावधान:
    • कानूनी निश्चितता और पारदर्शिता: यह प्रोटोकॉल आनुवंशिक संसाधनों के प्रदाताओं और उपयोगकर्ताओं दोनों के लिए एक सुदृढ़ और पूर्वानुमेय ढांचा प्रदान करता है, जिससे पहुँच की शर्तें पारदर्शी और स्पष्ट बनी रहती हैं।
    • पहुँच और लाभ साझाकरण (ABS) तंत्र: यह सुनिश्चित करता है कि जब आनुवंशिक संसाधनों का उपयोग प्रदाता देश के बाहर किया जाता है, तो उनसे प्राप्त होने वाले लाभों का न्यायोचित और समान वितरण हो।
    • अनुपालन प्रावधान: उपयोगकर्ताओं के लिए प्रदाता देश के घरेलू कानूनों और पारस्परिक रूप से सहमत शर्तों (MAT) का अनुपालन करना अनिवार्य है। यह इस प्रोटोकॉल का एक प्रमुख और अभिनव पक्ष है।
    • पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण: प्रोटोकॉल स्वदेशी और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को मान्यता देता है। यह सुनिश्चित करता है कि जब उनके पारंपरिक ज्ञान का उपयोग किया जाए, तो उसका लाभ उन समुदायों के साथ साझा किया जाए।
    • संरक्षण के लिए प्रोत्साहन: आनुवंशिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के उपयोग को बढ़ावा देकर, यह जैव विविधता के संरक्षण और इसके सतत उपयोग के लिए आर्थिक और सामाजिक प्रोत्साहन प्रदान करता है।

SOURCES
PIB
Economic Time
DD News

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