संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-1: विश्व के भौतिक भूगोल की महत्वपूर्ण विशेषताएँ; महत्वपूर्ण भू-भौतिकी घटनाएँ।
सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन।
संदर्भ: वैश्विक जलवायु मॉडल वर्ष 2026 के उत्तरार्ध में अल नीनो स्थितियों के उद्भव की बढ़ती संभावना की ओर संकेत कर रहे हैं, जो अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) चक्र में एक संभावित परिवर्तन को चिह्नित करता है।
अन्य संबंधित जानकारी
• नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने अपने नवीनतम ‘अल नीनो-दक्षिणी दोलन’ (ENSO) बुलेटिन में अनुमान लगाया है कि जून-अगस्त 2026 के दौरान अल नीनो के उभरने की लगभग 62% संभावना है और यह 2026 के अंत तक बना रह सकता हैं।
• भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी संकेत दिया है कि इस वर्ष जुलाई के बाद अल नीनो की स्थिति बन सकती है, किंतु यह अप्रैल माह में ही स्पष्ट हो पाएगा।
• नवीनतम जलवायु मॉडल जून के बाद भारत में अल नीनो के विकसित होने की 50% से अधिक संभावना दर्शाते हैं, जो जुलाई, अगस्त और सितंबर के दौरान बढ़कर लगभग 70% तक हो जाती है।
• अल नीनो का समय भारत के मुख्य मानसून महीनों (जून-सितंबर) के समान हो सकता है, जब वार्षिक वर्षा की लगभग 70% वर्षा होती है। इससे वर्षा आधारित कृषि की संवेदनशीलता बढ़ सकती है।
• पिछले चक्रों से ज्ञात होता है कि ENSO की घटनाएं प्रत्येक 2 से 7 वर्षों में दोहराई जाती हैं। ऐतिहासिक रूप से, भारत में लगभग 60% अल नीनो वर्ष सामान्य से कम वर्षा से जुड़े रहे हैं।
- पिछला प्रमुख अल नीनो (2023-24) भारतीय मानसून में सामान्य से कम वर्षा के साथ सह-संबंधित था।
अल नीनो और ला नीना के बारे में
• अल नीनो-दक्षिणी दोलन एक आवधिक जलवायु परिघटना है। इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान (SST) और वायुमंडलीय परिसंचरण में होने वाले बदलाव सम्मिलित होते हैं।
• सामान्य स्थिति
- व्यापारिक पवनें सामान्यतः भूमध्य रेखा के अनुदिश पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं।
- इन पवनों के प्रभाव से प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग (इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के निकट) में उष्ण सतही जल का संचय होता है जबकि ठंडे, पोषक-समृद्ध जल दक्षिण अमेरिका के निकट उर्ध्वगामी प्रवाह होता है।
- इसके विपरीत, दक्षिण अमेरिका (विशेषकर पेरू के तट) के निकट पूर्वी प्रशांत महासागर में, गहरे समुद्र से ठंडे और पोषक तत्वों से समृद्ध जल का ऊपर आना (अपवेलिंग) जारी रहता है।
• अल नीनो अवधि (गर्म अवधि)
- व्यापारिक पवनों का मंद पड़ना या उत्क्रमित होना
- गर्म जल का पूर्व की ओर स्थानांतरण
- अपवेलिंग में कमी जिससे वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण में व्यवधान आता है।
- इसे ऐसी स्थिति के रूप में परिभाषित किया जाता है जब समुद्र की सतह का तापमान (SST) निरंतर अवधि के लिए सामान्य से कम से कम 0.5°C अधिक बढ़ जाता है।
• ला नीना की अवधि (शीत अवधि)
- व्यापारिक पवनों का मजबूत होना
- संवर्धित अपवेलिंग से पूर्वी प्रशांत में समुद्री सतह का तापमान समय से ठंडा हो जाता है।
- सामान्य परिसंचरण पैटर्न का सुदृढ़ होना
अल नीनो के प्रभाव
• वैश्विक:
- अतिरिक्त समुद्री ऊष्मा के मुक्त होने के कारण, अल नीनो वर्ष अक्सर रिकॉर्ड स्तर पर सर्वाधिक गर्म वर्षों में से एक होते हैं।
- यह परिघटना वॉकर परिसंचरण को परिवर्तित कर देती है, जिसके कारण भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा पड़ता है, अमेरिका (महाद्वीप) में बाढ़ आती है और विश्व स्तर पर हीटवेव की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
- वॉकर परिसंचरण (या वॉकर सेल) उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में एक प्रमुख पूर्व-पश्चिम वायुमंडलीय परिसंचरण पैटर्न है। यह मुख्य रूप से प्रशांत महासागर के आर-पार सतह के तापमान में होने वाले अंतर द्वारा संचालित होता है।
- अल नीनो के दौरान अपवेलिंग (नीचे से ठंडे और पोषक तत्वों से भरपूर जल का ऊपर आना) की प्रक्रिया बाधित होती है। इसके परिणामस्वरूप मत्स्य भंडार और समुद्री जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, विशेष रूप से प्रशांत महासागर के क्षेत्रों में।
• भारत पर प्रभाव:
- अल नीनो का संबंध प्रायः सामान्य से कम दक्षिण-पश्चिम मानसून वर्षा से होता है, जो चावल और दालों जैसी खरीफ की फसलों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।
- वर्षा में कमी के कारण फसलों की पैदावार में गिरावट, सिंचाई की मांग में वृद्धि और ग्रामीण संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- विशेष रूप से उत्तर और मध्य भारत में हीटवेव की तीव्रता में वृद्धि होने की संभावना रहती है।
- कृषि उत्पादन में कमी से खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, जो समग्र समष्टि आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करती है। इसके अतिरिक्त, वर्षा की कमी से जलाशयों के स्तर, भूजल पुनर्भरण और पेयजल की उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
SOURCES
India Express
The Hindu
CPC
