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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।
संदर्भ: यह क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) के कायाकल्प की दिशा में एक रणनीतिक कदम है। वित्तीय सेवा विभाग (DFS) द्वारा अनुमोदित व्यवहार्यता योजना 2.0 का मुख्य उद्देश्य इन बैंकों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी और आधुनिक बनाना है।
व्यवहार्यता योजना 2.0 के प्रमुख बिन्दु
- व्यवहार्यता योजना 2.0 में 30 प्रदर्शन मानकों को शामिल किया गया है, जिन्हें क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) के कामकाज और उनके वित्तीय स्वास्थ्य का समग्र मूल्यांकन करने के लिए तैयार किया गया है।
- यह योजना मुख्य रूप से चार स्तंभों पर आधारित है: परिचालन उत्कृष्टता (Operational Excellence), परिसंपत्ति गुणवत्ता (Asset Quality), लाभप्रदता (Profitability), और संवृद्धि (Growth)।
- इन चारों स्तंभों के अंतर्गत प्रमुख महत्वपूर्ण संकेतकों में शामिल हैं: पूँजी से जोखिम भारित परिसंपत्ति अनुपात (CRAR), ऋण-जमा अनुपात, डिजिटल अंगीकरण, गैर–निष्पादित आस्ति (NPA) स्तर, वसूली प्रदर्शन, लाभप्रदता अनुपात और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रदर्शन।
- इस संशोधित ढांचे को वित्तीय वर्ष 2025–26 से वित्तीय वर्ष 2027–28 तक तीन वर्ष की अवधि के लिए लागू किया जाएगा।
- यह योजना वित्तीय वर्ष 2021–22 से वित्तीय वर्ष 2024–25 के दौरान लागू की गई पिछली व्यवहार्यता योजना पर आधारित है, जिसका मुख्य उद्देश्य प्रदर्शन की निगरानी को संस्थागत बनाना और शासन मानकों में सुधार करना था।
योजना का महत्व
- ग्रामीण ऋण वितरण का सुदृढ़ीकरण: व्यवहार्यता योजना 2.0 से क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के वित्तीय स्वास्थ्य में सुधार होने की अपेक्षा है, जिससे कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों को समय पर और किफायती ऋण प्रदान करने की उनकी क्षमता में वृद्धि होगी।
- वित्तीय समावेशन को बढ़ावा: डिजिटल अंगीकरण और परिचालन दक्षता पर बल देकर, यह ढांचा अल्प-सेवा वाले ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं की पहुँच को मजबूत कर सकता है।
- शासन और जवाबदेही में सुधार: मापने योग्य प्रदर्शन संकेतकों की शुरुआत से RRBs में पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत निगरानी में सुधार होगा।
- ग्रामीण आर्थिक विकास का समर्थन: सशक्त RRB ग्रामीण उद्यमों, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और MSMEs के वित्तपोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जिससे रोजगार सृजन और स्थानीय आर्थिक विकास में योगदान मिलेगा।
- वित्तीय सुभेद्यताओं में कमी: परिसंपत्ति गुणवत्ता और वसूली प्रदर्शन पर अधिक ध्यान देने से NPA को कम करने और ग्रामीण बैंकिंग संस्थानों की दीर्घकालिक स्थिरता में सुधार करने में मदद मिल सकती है।
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक के बारे में
- क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) की स्थापना सबसे पहले 1975 में नरसिम्हम कार्य समूह (1975) की सिफारिशों पर की गई थी, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण के अंतर को कम किया जा सके और समाज के कमजोर वर्गों को सहायता दी जा सके।
- इन्हें क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 के तहत वैधानिक मान्यता प्रदान की गई थी।
- RRBs का स्वामित्व संयुक्त रूप से निम्नलिखित के पास होता है:
- भारत सरकार (50%)
- संबंधित राज्य सरकार (15%)
- प्रायोजक बैंक (35%)
- इनका प्राथमिक उद्देश्य निम्नलिखित को किफायती ऋण प्रदान करना है:
- छोटे और सीमांत किसान
- कृषि श्रमिक
- ग्रामीण कारीगर
- MSMEs और ग्रामीण उद्यमी
- RRB भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) के विनियामक पर्यवेक्षण के तहत कार्य करते हैं।
- RBI उनके बैंकिंग परिचालन और विवेकपूर्ण मानदंडों को विनियमित करता है।
- NABARD उनके कामकाज का पर्यवेक्षण करता है और क्षमता निर्माण तथा ग्रामीण ऋण योजना में सहायता करता है।
- वाणिज्यिक बैंकों के समान, RRBs के लिए भी RBI के पास नकद आरक्षित अनुपात (CRR) और निर्धारित तरल संपत्तियों में सांविधिक तरलता अनुपात (SLR) बनाए रखना अनिवार्य है।
- RRBs पर उनके समायोजित शुद्ध बैंक ऋण (ANBC) का 75% प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण (PSL) मानदंड लागू होता है, जिसमें ऋण का एक बड़ा हिस्सा कृषि और संबद्ध ग्रामीण गतिविधियों की ओर निर्देशित होता है।
- समेकन के कई चरणों के बाद, RRBs की संख्या में काफी कमी आई है और वर्तमान में पूरे भारत में 28 RRB कार्यरत हैं।
