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सामान्य अध्ययन -3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय; समावेशी विकास और उससे संबंधित विषय।
संदर्भ: हाल ही में, संसद ने औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 द्वारा प्रतिस्थापित पूर्ववर्ती श्रम कानूनों के निरसन के संबंध में अस्पष्टता को दूर करने के लिए औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया।
अन्य संबंधित जानकारी
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 में संशोधन हेतु यह विधेयक 11 फरवरी, 2026 को पेश किया गया था।
- लोकसभा और राज्यसभा ने 12 फरवरी, 2026 को ‘औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित कर दिया।
- यह विधेयक स्पष्ट करता है कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 द्वारा प्रतिस्थापित पिछले तीन अधिनियम 21 नवंबर, 2025 से निरस्त माने जाएंगे।
- सरकार का कहना है कि इस संशोधन का उद्देश्य निरसन प्रावधानों के संबंध में भविष्य में होने वाली कानूनी जटिलताओं पर रोक लगाना है।
संशोधन के मुख्य प्रावधान
- यह विधेयक औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 104(1) को प्रतिस्थापित करता है।
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की धारा 104(1) निरसन और व्यावृत्ति प्रावधानों को रेखांकित करती है, जिसमें यह निर्दिष्ट था कि केंद्र सरकार ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926, औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के निरसन को अधिसूचित कर सकती है।
- यह संशोधन स्पष्ट करता है कि निरसन ‘विधि के प्रवर्तन’ द्वारा उसी तारीख से प्रभावी हुआ जो आई.आर. कोड (IR Code) की धारा 1(3) के तहत अधिसूचित की गई थी (अर्थात 21 नवंबर, 2025), न कि कार्यकारी प्रत्यायोजन के माध्यम से।
- यह इस भ्रम की गुंजाइश को भी समाप्त करता है कि निरसन की शक्ति कार्यपालिका को सौंपी गई थी।
औद्योगिक संबंध संहिता, 2020
यह एक प्रमुख श्रम कानून सुधार है जो निम्नलिखित तीन केंद्रीय कानूनों को समेकित और प्रतिस्थापित करता है:
- ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926: जो ट्रेड यूनियनों के पंजीकरण और मान्यता से संबंधित था।
- औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946: जो औद्योगिक प्रतिष्ठानों में रोजगार की शर्तों को विनियमित करता था।
- औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947: जो औद्योगिक विवादों की जांच और निपटान को नियंत्रित करता था।
औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की मुख्य विशेषताएँ
- परिभाषाओं का विस्तार:
- श्रमिक (Worker): यह सुनिश्चित करने के लिए कि अधिक श्रमिकों को बुनियादी श्रम अधिकारों तक पहुंच प्राप्त हो, ‘श्रमिक’ की एक समावेशी परिभाषा दी गई है। श्रमिक की परिभाषा में अब स्पष्ट रूप से बिक्री संवर्धन (sales promotion) कर्मचारी, कामकाजी पत्रकार और 18,000 रुपये प्रति माह तक कमाने वाले पर्यवेक्षी कर्मचारी शामिल हैं।
- हड़ताल (Strike): इसकी परिभाषा का विस्तार करके इसमें एक ही दिन में 50% या उससे अधिक श्रमिकों द्वारा लिए गए “सामूहिक आकस्मिक अवकाश” को शामिल किया गया है।
- नियत अवधि रोजगार (Fixed-Term Employment – FTE): यह औपचारिक रूप से समय-बद्ध अनुबंधों की शुरुआत करता है जहाँ श्रमिक स्थायी कर्मचारियों के समान वेतन और लाभों के हकदार होते हैं, जिसमें एक वर्ष की सेवा के बाद यथानुपात ग्रेच्युटी भी शामिल है।
- उच्च अनुपालन सीमाएँ:
- स्थायी आदेश: केवल 300 या अधिक श्रमिकों (100 से बढ़ाकर) वाले प्रतिष्ठानों के लिए रोजगार की शर्तों को नियंत्रित करने वाले औपचारिक स्थायी आदेश तैयार करना आवश्यक है।
- ले-ऑफ और छंटनी: 300 या अधिक श्रमिकों वाले प्रतिष्ठानों को अब ले-ऑफ (Lay-off), छंटनी (Retrenchment) या बंदी (Closure) के लिए सरकार से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है।
- ट्रेड यूनियन मान्यता:
- यह “वार्ताकार संघ” या “वार्ताकार परिषद” का प्रावधान करता है। 51% सदस्यता वाले संघ को एकमात्र सौदेबाजी का अधिकार मिलता है; यदि कोई भी संघ इस तक नहीं पहुंचता है, तो कम से कम 20% सदस्यता वाले संघों से मिलकर एक परिषद बनाई जाती है।
- श्रमिक पुन: कौशल निधि:
- नियोक्ताओं के लिए यह एक नई शर्त है कि वे प्रत्येक छंटनी किए गए श्रमिक के लिए 15 दिनों के वेतन के बराबर राशि का अंशदान दें ताकि भविष्य के रोजगार के लिए उनके कौशल को उन्नत (upgrade) करने में मदद मिल सके।
- विवाद समाधान:
- एकल-सदस्यीय न्यायाधिकरणों के स्थान पर दो-सदस्यीय औद्योगिक न्यायाधिकरण (एक न्यायिक और एक प्रशासनिक सदस्य) स्थापित किए जाएंगे।
- सार्वजनिक उपयोगिताओं के साथ-साथ अब सभी उद्योगों में हड़ताल और तालाबंदी के लिए 60 दिनों की नोटिस अवधि अनिवार्य कर दी गई है।
