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सामान्य अध्ययन-2: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधन से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय; सरकारी नीतियां और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन एवं कार्यान्वयन से संबंधित विषय।

संदर्भ: उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए समता नियमों पर यह कहते हुए रोक लगा दी है कि ये नियम प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और समाज को विभाजित कर सकते है।

अन्य संबंधित जानकारी

• हाल ही में सरकार द्वारा यूजीसी विनियम, 2012 को प्रतिस्थापित करने के लिए यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता का संवर्धन) विनियम, 2026 पेश किया गया था। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के अनुरूप उच्चतर शिक्षण संस्थानों में समानता, समावेशन और भेदभाव मुक्त शैक्षणिक वातावरण को बढ़ावा देना था।

• अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने 2026 के विनियमों को फिलहाल स्थगित कर दिया है और निर्देश दिया है कि यूजीसी विनियम, 2012 ही लागू रहेंगे।

• याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से 2026 विनियमों की धारा 3(1)(c) को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि यह केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदायों के सदस्यों के विरुद्ध जाति या जनजाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को संदर्भित करती है, जबकि सामान्य श्रेणी के लोगों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।

नए विनियमों की आवश्यकता

• यूजीसी के अनुसार, जाति आधारित भेदभाव से संबंधित शिकायतों में पांच वर्षों में 118% से अधिक की वृद्धि हुई है और इनकी संख्या 2019-20 में 173 मामलों से बढ़कर 2023-24 में 378 हो गई है।

• वर्ष 2019-20 से 2023-24 के दौरान, देश भर के 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों से कुल 1,160 शिकायतें प्राप्त हुईं थीं।

विनियमों के प्रमुख प्रावधान

• जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा: भेदभाव को विशेष रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदायों के सदस्यों के खिलाफ होने वाले कृत्यों के रूप में परिभाषित किया गया है।

• भेदभाव की परिभाषा का विस्तार: भेदभाव को व्यापक आधारों पर परिभाषित किया गया है, जैसे कि जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान या विकलांगता के आधार पर अनुचित, पक्षपातपूर्ण या भेदभावपूर्ण व्यवहार (चाहे वह प्रत्यक्ष तौर पर हो या अप्रत्यक्ष)। इसमें वे कार्य भी शामिल हैं जो शिक्षा में समता में बाधा बनते हैं या मानवीय गरिमा का उल्लंघन करते हैं।

• अनिवार्य समाता समितियाँ: प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान (HEI) को एक ‘समता समिति’ का गठन करना होगा, जिसमें OBC, SC, ST, दिव्यांगजन (PwD) और महिलाएँ सदस्य के रूप में शामिल होने चाहिए।

  • 2012 के विनियमों के विपरीत, नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा का विस्तार करके अन्य पिछड़ा वर्ग को भी इसमें शामिल किया गया है।

• समान अवसर केंद्र (EOCs): प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान को एक ‘समान अवसर केंद्र’ भी स्थापित करना होगा, जिसका संचालन समता समिति द्वारा किया जाएगा। 

  • इसका कार्य छात्रों और कर्मचारियों के बीच समानता को बढ़ावा देना,
  • सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता का प्रसार करना,
  • वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों को शैक्षणिक और वित्तीय सहायता प्राप्त करने में मदद करना होगा।

• अनिवार्य अनुपालन: पहली बार, विनियमों का अनुपालन न करने पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया गया है।  दंड में यूजीसी के वित्तपोषण पर रोक लगाना, नए कार्यक्रम शुरू करने पर प्रतिबंध लगाना और यूजीसी-मान्यता प्राप्त संस्थान के रूप में उस संस्थान की मान्यता रद्द करना शामिल है।

• शिकायत निवारण तंत्र: 

  • संस्थानों के लिए जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों की जांच के लिए समय-सीमा आधारित तंत्र का सृजन करना अनिवार्य होगा।
  • केंद्र सरकार भेदभाव की रिपोर्ट करने के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल और सहायता के लिए ‘समता हेल्पलाइन’ का भी संचालन करेगी।

विनियमों के कार्यान्वयन संबंधी मुद्दे और चुनौतियाँ

• असमान संरक्षण और अपवर्जन: जाति-आधारित भेदभाव के दायरे को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित करना, अनारक्षित श्रेणी के विद्यार्थियों के अपवर्जन का मार्ग प्रशस्त करता है, क्योंकि वे स्वयं भी भेदभाव के शिकार हो सकते हैं। इससे असमान संरक्षण की चिंताएँ उत्पन्न होती है।  

• झूठी शिकायतों के लिए दंड की समाप्ति: दुर्भावनापूर्ण या झूठी शिकायतों के खिलाफ स्पष्ट सुरक्षा उपायों या दंड का प्रावधान न होने से अकादमिक संस्थानों के भीतर डर का माहौल बनाने और नियमों का दुरुपयोग होने की आशंकाएं बढ़ गई हैं।

• संवैधानिक उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ये विनियम, संरक्षण के एक ‘पदानुक्रम’ को संस्थागत बनाते हैं और इनमें पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का अभाव है, जिससे ये संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत संविधान द्वारा प्रदत्त ‘समानता के अधिकार’ का उल्लंघन कर सकते हैं।

• अपर्याप्त क्षमता: विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि ये नियम सख्त हैं, परन्तु कई संस्थानों में 24/7 हेल्पलाइन, स्वतंत्र जांच और निरंतर अनुपालन निगरानी सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रशासनिक और वित्तीय क्षमता का अभाव होता है।

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