संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन एवं कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
संदर्भ: न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने केंद्रीय विधि सचिव से ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण’ (POCSO) अधिनियम, 2012 के दुरुपयोग को रोकने हेतु आवश्यक कदम उठाने पर विचार करने का आग्रह किया है।
अन्य संबंधित जानकारी:

- यह टिप्पणी ऐसे समय में की गई है जब ‘सहमति की आयु’ (Age of consent) के विवाद से संबंधित एक जनहित याचिका (PIL) पहले से ही न्यायालय में लंबित है।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से यह संकेत मिलता है कि किशोर यौनिकता (Adolescent sexuality) के अपराधीकरण का केवल न्यायिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक समाधान भी किया जाना चाहिए।
‘रोमियो-जूलियट क्लॉज़’ के पक्ष में तर्क
• निकट आयुवर्ग के किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों का संरक्षण: वर्तमान कानूनी ढांचे में 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति से जुड़ी किसी भी यौन गतिविधि का स्वतः ही अपराधीकरण कर दिया जाता है, चाहे वह सहमति से या गैर-शोषणकारी ही क्यों न हो।
- POCSO अधिनियम के तहत, 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को ‘बच्चा’ माना जाता है और यह अधिनियम यौन कृत्यों के लिए नाबालिग की सहमति को मान्यता नहीं देता है।
• न्यायिक चिंता: ‘एनफोल्ड प्रोएक्टिव हेल्थ ट्रस्ट’ और यूनिसेफ (UNICEF) के एक अध्ययन में पाया गया कि, 2016 और 2020 के बीच महाराष्ट्र, असम और पश्चिम बंगाल में POCSO से संबंधित लगभग 25% मामले ‘रोमानी’ (Romantic) प्रकृति के थे, जिसमें पीड़ित और आरोपी आपसी सहमति से रिलेशनशिप में थे।
• गंभीर सामाजिक अंतराल: न्यायालय ने इस ओर भी संकेत किया कि POCSO अधिनियम, जोकि “न्याय की एक गंभीर अभिव्यक्ति” है, का उपयोग अक्सर परिवारों द्वारा युवाओं के बीच संबंधों का विरोध करने के लिए किया जाता है।
- इसके परिणामस्वरूप, जबरदस्ती किए बिना बनाए गए संबंधों के लिए भी युवा लड़कों को POCSO के तहत कारावास की सजा काटनी पड़ती है।
• परिवर्तन की मांग: कानून में संशोधन करने का प्रयास नया नहीं है, अपितु यौन अपराधों के अभियोजन में महिलाओं के संरक्षण और सुरक्षा से संबंधित एक लंबित PIL से इसे और बल मिला है।
• यौन स्वायत्तता: 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोरों में अपनी यौन स्वायत्तता के संबंध में निर्णय लेने की “क्षमता विकसित” होती हैं।
- कॉमन लॉ का ‘मैच्योर माइनर’ (परिपक्व नाबालिग) सिद्धांत, वैज्ञानिक वास्तविकता और यौवन (Puberty) के जैविक आगमन की उपेक्षा करते हुए 18 वर्ष से कम आयु के सभी युवाओं को सहमति देने के लिए अक्षम मानता है।
• “निकट आयुवर्ग” (Close-in-age) अपवाद: यह सुनिश्चित करना कि यदि दोनों पक्ष किशोर हैं और कृत्य सहमति से किया गया है, तो उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।
• स्वास्थ्य पर प्रभाव: POCSO में अनिवार्य रिपोर्टिंग का प्रावधान है जिससे चिकित्सकों को विवश होकर कम उम्र की गर्भावस्था या यौन गतिविधि की सूचना पुलिस को देनी पड़ती है। अभियोजन के डर से किशोर आवश्यक यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेने में संकोच करते हैं।
इस विषय पर केंद्र सरकार का रुख
• आयु में वैधानिक कमी का विरोध: केंद्र सरकार ने सहमति की आयु कम करने या विधायी अपवादों को शामिल करने का विरोध किया है।
- सरकार ने तर्क दिया कि 18 वर्ष की आयु एक “सुविचारित” विधायी विकल्प है जिसका उद्देश्य बच्चों के लिए एक गैर-परक्राम्य (Non-Negotiable) “सुरक्षा कवच” का निर्माण करना है।
• सहमति की अप्रासंगिकता: सरकार का तर्क है कि नाबालिगों में सार्थक सहमति देने के लिए कानूनी और विकासात्मक क्षमता नहीं होती है। इसने तर्क दिया कि जहाँ सहमति अप्रासंगिक हो, वहाँ एक ‘कठोर उत्तरदायित्व ढांचा’ होना आवश्यक है क्योंकि बच्चे जिन वयस्कों पर विश्वास करते हैं उनके द्वारा ही उन्हें गुमराह किया जा सकता है या उनके साथ जबरदस्ती की जा सकती है।
• दुरुपयोग की आशंका: सरकार ने आशंका व्यक्त की है कि अपवादों को शामिल करने से या सहमति की आयु कम करने से सहमतिपूर्ण संबंधों की आड़ में बाल शोषण और तस्करी का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
• मूल उद्देश्य की प्राप्ति न होना: चूंकि यह अधिनियम बाल शोषण जैसी बुराई को दूर करने के लिए बनाया गया था, अतः आयु सीमा को शिथिल करना उसी समस्या को पुनः जन्म दे सकता है जिसे हल करने का कानून ने प्रयास किया था।
आगे की राह
• सावधानीपूर्वक तैयार किया गया ‘निकट आयुवर्ग’ अपवाद: ‘न्यायमित्र’ के रूप में न्यायालय की कार्यवाही में सहायता कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सहमति की आयु को सीमित करने या आयु में छूट देने का समर्थन किया है।
- उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान पूर्ण अपराधीकरण संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत किशोरों के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है।
- हालांकि, 2023 में भारतीय विधि आयोग ने सहमति की आयु को घटाकर 16 करने के विपक्ष में अपनी राय दी थी।
• विवेकपूर्ण दृष्टिकोण की आवश्यकता: ‘निकट आयुवर्ग’ रक्षा तंत्र को लागू करना और स्नेहपूर्ण या हानिरहित अंतःक्रियाओं को अभियोजन से बचाने के लिए परिपक्वता-आधारित, बाल-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना।
• उत्तरदायी न्यायिक विवेक: स्पष्ट रूप से सहमतिपूर्ण मामलों में न्यायालय दंडादेश विवेक का उपयोग कर सकते हैं और जमानत, मामले को रद्द करने या सजा के स्तर पर राहत प्रदान कर सकते हैं।
