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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन।

संदर्भ: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की एक छह सदस्यीय विशेष पीठ ने ग्रेट निकोबार द्वीप मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी (EC) को बरकरार रखा। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि उसे इस अनुमोदन में “हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार” नहीं मिला।

NGT का निर्णय और याचिका की पृष्ठभूमि

  • अधिकरण ने तथा यह रेखांकित किया कि पर्यावरणीय मंजूरी (EC) में ही सुरक्षात्मक उपाय शामिल थे।
  • अधिकरण ने पारिस्थितिक संरक्षण और रणनीतिक विकास के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण पर बल दिया। अधिकरण ने यह स्पष्ट किया कि परियोजना को प्रदान की गई पर्यावरणीय मंजूरी (EC) में व्यापक सुरक्षात्मक उपाय पहले से ही अंतर्निहित हैं, जो संभावित पर्यावरणीय जोखिमों के शमन के लिए पर्याप्त हैं।
  • अधिकरण को ‘द्वीप तटीय विनियमन क्षेत्र’ (ICRZ) अधिसूचना, 2019 के उल्लंघन का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला और उसने पूर्व में गठित एक उच्च-अधिकार प्राप्त समिति (HPC) के निष्कर्षों को संज्ञान में लिया।
  • एनजीटी (NGT) ने तटरेखाओं के संरक्षण, रेतीले प्रजनन तटों के परिरक्षण और वैज्ञानिक प्रवाल पुनर्जनन का निर्देश दिया, जिसके अनुपालन की जिम्मेदारी केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी गई है।
  • पर्यावरणीय मंजूरी मूलतः नवंबर 2022 में ‘सैद्धांतिक वन मंजूरी’ के साथ दी गई थी, जिसके कारण तटीय विनियमन के उल्लंघन, अस्पष्ट EIA (पर्यावरणीय प्रभाव आकलन) डेटा और जनजातीय अधिकारों की चिंताओं का हवाला देते हुए कई याचिकाएं दायर की गईं।
  • 2023 में, एनजीटी ने मुख्य रूप से मंजूरी को बरकरार रखा लेकिन प्रवाल भित्तियों और तटीय क्षेत्रों से संबंधित मुद्दों की जांच के लिए एक उच्च-अधिकार प्राप्त समिति (HPC) का गठन किया; रणनीतिक और सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए इस समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया था।
  • 2026 का निर्णय मुकदमेबाजी के दूसरे दौर को दर्शाता  है, जो पर्यावरणीय मंजूरी की पुनः पुष्टि करता है; हालांकि, वन मंजूरी से जुड़े मुद्दे अभी भी कलकत्ता उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं।

ग्रेट निकोबार द्वीप मेगा परियोजना के बारे में

  • मार्च 2021 में नीति आयोग द्वारा “ग्रेट निकोबार द्वीप का समग्र विकास” पहल के तहत शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य भारत के इस सुदूर दक्षिणी द्वीप को एक रणनीतिक और आर्थिक केंद्र के रूप में रूपांतरित करना है।
  • इसे ‘अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम’ (ANIIDCO) द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है।
  • विभिन्न चरणों में इसकी अनुमानित लागत ₹72,000 से ₹92,000 करोड़ के बीच रहने का अनुमान है।
  • यह परियोजना लगभग 166 वर्ग किमी (द्वीप का लगभग 18%) क्षेत्र को कवर करती है, जिसमें लगभग 130.75 वर्ग किमी वन भूमि और जनजातीय क्षेत्रों के हिस्से शामिल हैं।
  • प्रमुख घटकों में शामिल हैं:
  • गैलेथिया खाड़ी में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) ताकि विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम हो सके।
  • यह कनेक्टिविटी और रणनीतिक परिचालनों के लिए दोहरे उपयोग वाला ‘ग्रीनफील्ड’ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (नागरिक + सैन्य)।
  • इसमें जनसंख्या को लगभग 8,000 से बढ़ाकर 3.5 लाख से अधिक करने के अनुमानित लक्ष्य के साथ वृहद एकीकृत टाउनशिप।
  • बुनियादी ढांचे की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 450 MVA गैस और सौर-आधारित विद्युत संयंत्र।

महत्व

  • रणनीतिक महत्व:
    • यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश द्वार के निकट स्थित है, जहाँ से वैश्विक व्यापार का लगभग 40% हिस्सा गुजरता है। यह भारत की समुद्री निगरानी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उपस्थिति को सुदृढ़ करता है।
    • यह हिंद महासागर क्षेत्र में एक अग्रिम परिचालन आधार प्रदान करता है, जिससे बढ़ती चीनी रणनीतिक गतिविधियों के बावजूद यहाँ भारत की स्थिति मजबूत है।
    • यह परियोजना मैरीटाइम इंडिया विजन 2030, अमृत काल विजन 2047 और भारत की व्यापक हिंद-प्रशांत रणनीति के अनुरूप है।
  • आर्थिक महत्व:
    • वर्तमान में भारत के ‘ट्रांसशिपमेंट कार्गो’ का लगभग 75% विदेशी बंदरगाहों द्वारा नियंत्रित होता है, जो देश की उच्च बाह्य निर्भरता को दर्शाता है। इस परियोजना का लक्ष्य कोलंबो और सिंगापुर जैसे केंद्रों पर निर्भरता कम करना है।
    • इसका उद्देश्य वैश्विक ट्रांसशिपमेंट राजस्व प्राप्त करना और व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए दीर्घकालिक समुद्री बुनियादी ढांचे का निर्माण करना है।
  • विधिक महत्व:
    • 2022 में दी गई पर्यावरणीय मंजूरी और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा इसे 2026 में बरकरार रखा जाना, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में रणनीतिक बुनियादी ढांचे के विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के बीच संतुलन स्थापित करने हेतु न्यायिक मिसाल बन सकता है।

चुनौतियां और चिंताएं

  • पारिस्थितिक संवेदनशीलता: ग्रेट निकोबार वर्षावनों, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियाँ और स्थानिक प्रजातियों के साथ एक जैव-विविधता हॉटस्पॉट है। इससे वनों की कटाई, आवास विनाश और लेदरबैक कछुआ, निकोबार मेगापोड तथा रॉबर क्रैब जैसी प्रजातियों के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है।
  • समुद्री और पर्यावरणीय जोखिम: 20,000 से अधिक प्रवाल कॉलोनियों को संभावित नुकसान और केवल एक मौसम के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) डेटा पर निर्भरता ने कम आंके गए पारिस्थितिक प्रभावों और ‘कोरल ट्रांसलोकेशन’ (प्रवाल स्थानांतरण) जैसे विवादित शमन उपायों से संबंधित चिंताएं बढ़ा दी हैं।
  • जनजातीय और सामाजिक प्रभाव: शोंपेन (PVTG) और निकोबारी जैसे स्वदेशी समुदायों को विस्थापन, सिमटते आवास, बीमारियों के जोखिम और अनुमानित जनसांख्यिकीय विस्तार के बीच पारंपरिक जीवनशैली के बाधित होने के खतरों का सामना करना पड़ रहा है।
  • अधिकार और सहमति के मुद्दे: आरोपों में वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत उनसे पूर्ण मंजूरी न लेने और भूमि त्यागने के लिए जबरदस्ती करने का दावा किया गया हैं।
  • निरंतर विधिक विवाद: एनजीटी के फैसले के बावजूद, वन मंजूरी अभी भी न्यायिक संवीक्षा के अधीन है। साथ ही, पर्यावरण संरक्षण समूह दीर्घकालिक पारिस्थितिक सुरक्षा उपायों की प्रभावकारिता को लेकर निरंतर प्रतिवाद कर रहे हैं।

SOURCES:
The Hindu
The Hindu
Indian Express
Economic Times

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