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सामान्य अध्ययन-3: अंतरिक्ष के क्षेत्र में जागरूकता और संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती; आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें; धन-शोधन और इसे रोकना।
संदर्भ: हालिया घटनाक्रम में IRNSS-1F उपग्रह पर स्थित परमाणु घड़ी के खराब हो जाने के बाद भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली ‘नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन’ (NavIC) की स्थिति निर्धारण क्षमता प्रभावित हुई।
अन्य संबंधित जानकारी
• भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने हाल ही में पुष्टि की है कि IRNSS-1F उपग्रह पर स्थित अंतिम क्रियाशील परमाणु घड़ी ने 13 मार्च, 2026 को काम करना बंद कर दिया है।
• मार्च 2016 में प्रक्षेपित इस उपग्रह ने अपने 10 वर्षों के निर्धारित मिशन जीवन को पहले ही पूरा कर लिया था, और यह पिछले कुछ समय से तीन में से केवल एक ही कार्यशील घड़ी के साथ संचालित हो रहा था।
• यद्यपि यह एक-तरफा संदेश सेवा जारी रख सकता है, लेकिन अब यह स्थिति, नेविगेशन और समय (PNT) सेवाएँ प्रदान करने में सक्षम नहीं है।
• इस विफलता के साथ, वर्तमान में केवल तीन उपग्रह (IRNSS-1B, IRNSS-1L, NVS-01) ही नेविगेशन सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं।
• प्रभावी नेविगेशन कवरेज के लिए न्यूनतम चार उपग्रहों की आवश्यकता होती है, जिससे सेवा की विश्वसनीयता से संबंधित चिंताएँ बढ़ गई हैं।
नाविक (IRNSS) के बारे में
• NavIC (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन), जिसे मूल रूप से भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) के रूप में जाना जाता था, इसरो (ISRO) द्वारा विकसित भारत की स्वदेशी उपग्रह-आधारित नेविगेशन प्रणाली है।
• इस प्रणाली की परिकल्पना 1999 के कारगिल युद्ध के बाद की गई थी, जब भारत को अमेरिका-नियंत्रित जीपीएस (GPS) तक पहुँच से वंचित कर दिया गया था, जिसने एक स्वतंत्र नेविगेशन क्षमता की रणनीतिक आवश्यकता को रेखांकित किया।
• NavIC को सात उपग्रहों वाली एक क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली के रूप में डिज़ाइन किया गया था, जिसका उद्देश्य संपूर्ण भारतीय भू-भाग और भारत की सीमाओं से 1,500 किमी बाहर तक सटीक स्थिति निर्धारण सेवाएँ प्रदान करना है।
• GPS जैसी वैश्विक प्रणालियों के विपरीत, NavIC उपग्रहों को सीधे भारतीय क्षेत्र के ऊपर भू-तुल्यकालिक कक्षाओं में स्थापित किया गया है, जो बेहतर सिग्नल उपलब्धता और सटीकता सुनिश्चित करता है, विशेष रूप से पहाड़ी घाटियों, जंगलों और घने शहरी क्षेत्रों जैसे चुनौतीपूर्ण भूभागों में।
• यह प्रणाली लगभग 10 मीटर की स्थिति सटीकता प्रदान करने में सक्षम है, जो इसे नागरिक और रणनीतिक दोनों अनुप्रयोगों के लिए अत्यधिक विश्वसनीय बनाती है।
• अनुप्रयोग: नेविगेशन (स्थल, वायु, जल), आपदा प्रबंधन, वाहन ट्रैकिंग, सैन्य संचालन, मानचित्रण और भूगणित (geodesy) तथा दूरसंचार और वित्तीय प्रणालियों के लिए समय निर्धारण।
• उपग्रहों की नई पीढ़ी ने L5 और S बैंड के अतिरिक्त L1 आवृत्ति सिग्नल पेश किए हैं, जिससे GPS जैसी वैश्विक प्रणालियों के साथ बेहतर अंतर्संचालनीयता और उपभोक्ता उपकरणों (स्मार्टफोन आदि) को व्यापक तौर पर अपनाया जाना संभव हुआ है।
वर्तमान और पूर्ववर्ती कार्यरत उपग्रह
• भारत ने 2013 से NavIC कार्यक्रम के तहत लगभग 11 उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं, लेकिन इस नक्षत्र को निरंतर विश्वसनीयता संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा है।
- केवल चार उपग्रह PNT सेवाओं के लिए पूर्णतः क्रियाशील थे,
- चार उपग्रहों का उपयोग संदेश प्रसारण के लिए किया जा रहा था,
- एक उपग्रह को सेवामुक्त कर दिया गया था, और
- दो उपग्रह अपनी निर्धारित कक्षा में पहुँचने में विफल रहे थे।
• वर्तमान में, नेविगेशन (PNT) सेवाएँ प्रदान करने में सक्षम उपग्रह निम्नलिखित हैं:
- IRNSS-1B
- IRNSS-1L (प्रतिस्थापन उपग्रह)
- NVS-01 (IRNSS-1J, दूसरी पीढ़ी का उपग्रह)
• IRNSS-1A, 1C, 1D, 1E, और 1G जैसे पूर्ववर्ती उपग्रहों में विफलता का मुख्य कारण परमाणु घड़ियों में खराबी थी। IRNSS-1F इस सूची में शामिल होने वाला नवीनतम उपग्रह है।
• इस नवीनतम विफलता से रेलवे ट्रैकिंग, विमानन नेविगेशन, आपदा प्रतिक्रिया और सैन्य संचालन जैसे महत्वपूर्ण अनुप्रयोगों के प्रभावित होने की आशंका है, जहाँ NavIC को तेज़ी से एकीकृत किया गया है।
नाविक में मुद्दे और चुनौतियाँ
• परमाणु घड़ियों में खराबी: कई उपग्रहों (कम से कम छह) को परमाणु घड़ी की खराबी का सामना करना पड़ा है; आयातित घड़ियों पर प्रारंभिक निर्भरता के कारण बार-बार तकनीकी खराबियाँ आई हैं।
• पुराना होता उपग्रह नक्षत्र: पहली पीढ़ी के कई उपग्रह अपने 10 साल के निर्धारित मिशन जीवन के करीब पहुँच चुके हैं या उसे पार कर चुके हैं, जिससे प्रणाली की विश्वसनीयता कम हो गई है।
• कम परिचालन शक्ति: यह प्रणाली वर्तमान में न्यूनतम आवश्यक उपग्रह संख्या से कम शक्ति के साथ कार्य कर रही है, जिसमें केवल कुछ ही उपग्रह पूर्णतः क्रियाशील हैं। यह स्थिति सटीकता और कवरेज (क्षेत्रीय विस्तार) को प्रभावित कर रही है।
• प्रक्षेपण विफलताएँ और विलंब: पीएसएलवी (PSLV) मिशन की बाधाओं और कक्षीय समस्याओं (जैसे NVS-02) के कारण समय पर प्रतिस्थापन और नक्षत्र के विस्तार में विलंब हुआ है।
• संस्थागत और विकासात्मक विलंब: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG, 2018) ने उपयोगकर्ता रिसीवर विकास में देरी को चिह्नित किया था, जिससे उपलब्ध उपग्रह क्षमता का अल्प उपयोग हुआ है।
• सीमित अंगीकरण: बढ़ते उपयोग (रेलवे, स्मार्टफोन) के बावजूद, व्यापक अंगीकरण के मामले में NavIC अभी भी GPS जैसी वैश्विक प्रणालियों से पिछड़ा हुआ है।
परमाणु घड़ियों के बारे में और उनका महत्व
• परमाणु घड़ियाँ NavIC सहित किसी भी उपग्रह नेविगेशन प्रणाली का मुख्य आधार होती हैं।
• ये अत्यधिक सटीक समय मापन प्रदान करती हैं, जो उपयोगकर्ता के स्थान का निर्धारण करने के लिए अनिवार्य है।
• उपग्रह नेविगेशन, उपग्रहों से पृथ्वी पर स्थित रिसीवर तक संकेतों के पहुँचने में लगने वाले समय की गणना करके कार्य करता है।
• चूँकि संकेत प्रकाश की गति से यात्रा करते हैं, इसलिए समय मापन में एक छोटी सी त्रुटि भी स्थिति निर्धारण में बड़ी त्रुटियों का कारण बन सकती है, जो कभी-कभी सैकड़ों किलोमीटर तक हो सकती है।
• प्रत्येक NavIC उपग्रह में अतिरिक्तता (redundancy) और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए तीन परमाणु घड़ियाँ (आमतौर पर रूबिडियम घड़ियाँ) लगी होती हैं।
• ये घड़ियाँ सटीक समय निर्धारण संकेत उत्पन्न करती हैं, जो नेविगेशन गणनाओं के लिए संदर्भ के रूप में कार्य करते हैं।
• घड़ी के खराब होने के प्रभाव:
- सटीक स्थिति निर्धारण क्षमता की कमी
- उपग्रह नेविगेशन के लिए अनुपयोगी हो जाता है (यद्यपि सीमित संचार कार्य जारी रह सकते हैं)
• इसरो (ISRO) द्वारा स्वदेशी परमाणु घड़ियों को विकसित किया जा रहा है, जिन्हें अब NVS-01 जैसे दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों में निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए तैनात किया गया है:
- विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करना
- प्रणाली की विश्वसनीयता में सुधार
- लागत में कमी
• परमाणु घड़ी निगरानी इकाई (ACMU) जैसी तकनीकें आवृत्ति विचलन को सही करके और उच्च समय स्थिरता बनाए रखकर परमाणु घड़ियों के प्रदर्शन को बेहतर करती हैं।
Sources:
India Express
India Express
The Hindu
Ecomomic Times
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