संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।

सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण ।

अन्य संबंधित जानकारी:

  • सरकार ने सभी राज्य और केंद्रीय अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे 31 दिसंबर, 2027 के बाद HFC के नए या अतिरिक्त उत्पादन के लिए पर्यावरण मंजूरी देना बंद कर दें।
  • 1 जनवरी, 2028 से भारत HFC के उपभोग और उत्पादन को आधारभूत स्तर (Baseline levels) पर स्थिर कर देगा। यह इसके चरणबद्ध कटौती के प्रक्षेपवक्र की शुरुआत होगी।
  • इस नीति को ओजोन क्षयकारी पदार्थ (विनियमन और नियंत्रण) नियमावली में संशोधन के माध्यम से लागू किए जाने की संभावना है, जिससे HFCs पर नियामक नियंत्रण का विस्तार किया जा सके।
  • यह निर्देश किगाली संशोधन के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है। HFCs शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं जिनका उपयोग प्रशीतन और वातानुकूलन में किया जाता है।

HFCs (हाइड्रोफ्लोरोकार्बन) के बारे में

  • हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) संश्लेषित प्रशीतक गैसें हैं, जिनका उपयोग मुख्य रूप से वातानुकूलन, प्रशीतन, एरोसोल और अग्नि शमन प्रणालियों में उपयोग किया जाता है।
  • इन्हें क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) जैसे ओजोन क्षयकारी पदार्थों के विकल्प के रूप में पेश किया गया था। ध्यातव्य है कि CFCs और HCFCs को 1989 के ऐतिहासिक मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया गया था।
  • हालांकि HFCs की ओजोन क्षय क्षमता (ODP) शून्य होती है, परन्तु ओजोन परत के लिए सुरक्षित होने के बावजूद, इनकी ग्लोबल वार्मिंग क्षमता अत्यधिक उच्च होती है। 100 वर्षों की अवधि में, इनकी ऊष्मण क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की तुलना में 14,800 गुना तक अधिक हो सकती है। यही कारण है कि ये जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारकों में से एक माने जाते हैं।
  • वर्तमान में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में HFCs की हिस्सेदारी लगभग 2% है। हालाँकि, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में इनके बढ़ते उपयोग के कारण, ये जलवायु शमन प्रयासों का केंद्रबिंदु बन गए हैं।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और किगाली संशोधन के बारे में

  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) एक ऐतिहासिक वैश्विक संधि है जिसका उद्देश्य ओजोन क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना है। इसे व्यापक रूप से दुनिया के सबसे सफल पर्यावरण समझौतों में से एक माना जाता है।
  • किगाली संशोधन (2016) ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के दायरे का विस्तार करते हुए इसमें हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) की चरणबद्ध कटौती को शामिल किया। यह निर्णय उनके उच्च जलवायु प्रभाव को देखते हुए लिया गया था।
  • भारत ने 2021 में किगाली संशोधन की पुष्टि की थी, जिसके तहत भारत HFC के उत्पादन और उपभोग में क्रमिक कमी लाने के लिए प्रतिबद्ध है।
  • भारत ने 1 जनवरी, 2028 से चरणबद्ध कटौती की अनुसूची पर सहमति व्यक्त की है। इसके मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित हैं: 2032 तक HFCs के उपयोग में 10% की कटौती तथा 2047 तक कुल कटौती को बढ़ाकर 85% करना।
  • वैश्विक स्तर पर, इस संशोधन से वर्ष 2100 तक वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि में 0.5°C तक की कमी आने की उम्मीद है, जिस कारण यह जलवायु शमन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है।

HFCs को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने हेतु भारत का रोडमैप

कटौती के लक्ष्य:

  • वर्ष 2032 तक 10% की कटौती
  • वर्ष 2037 तक 20% की कटौती
  • वर्ष 2042 तक 30% की कटौती
  • वर्ष 2047 तक 85% की कटौती (अंतिम लक्ष्य)
  • आधारभूत (बेसलाइन) वर्ष: HFC के उपभोग और उत्पादन के स्तरों की गणना करने के लिए वर्ष 2024–2026 की अवधि को ‘आधारभूत वर्ष’ के रूप में निर्धारित किया गया है।
  • स्थिरीकरण (फ्रीज़) वर्ष: 2028 (खपत और उत्पादन को  आधारभूत स्तर पर सीमित किया जाएगा)।
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