संदर्भ:

बारह देशों ने युरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA)/ यूरोपीय संघ अंतरिक्ष परिषद के जीरो डेब्रिस चार्टर (Zero Debris Charter-ZDC) का समर्थन किया है।

प्रमुख बिंदु:

  • बारह देशों ने पृथ्वी की कक्षा में मानवीय गतिविधियों की दीर्घकालिक स्थिरता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की पुष्टि करने वाले युरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA)/ यूरोपीय संघ अंतरिक्ष परिषद के शून्य अपशिष्ट चार्टर पर हस्ताक्षर किए हैं।
  • यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) ने भी अंतरराष्ट्रीय संगठन (IGO) के रूप में चार्टर का समर्थन किया।
  • सम्मिलित राष्ट्र: इस चार्टर के हस्ताक्षरकर्ताओं में ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, साइप्रस, एस्टोनिया, जर्मनी, लिथुआनिया, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्वीडन और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं।

जीरो डेब्रिस चार्टर (ZDC) के बारे में

  • जीरो डेब्रिस चार्टर वर्ष 2030 तक अंतरिक्ष को अपशिष्ट-तटस्थ बनने का एक प्रयास है, जिसका अनावरण नवंबर 2023 में सेविले में आयोजित ESA का अंतरिक्ष शिखर सम्मेलन में किया गया था।

इसका उद्देश्य सदस्य देशों को निम्नलिखित के लिए प्रोत्साहित करके अंतरिक्ष मलबे के उत्पादन को कम करना है:

  • मिशन के बाद निपटान हेतु अंतरिक्ष यान का डिजाइन तैयार करना।
  • टक्कर टालने के उपाय जैसी मलबा शमन तकनीकों को लागू करना।
  • प्रक्षेपणों और परिचालनों के दौरान नये मलबे के सृजन को सीमित करना।

अंतरिक्ष मलबा पर एक नजर 

  • अंतरिक्ष मलबा या अंतरिक्ष का कचरा अंतरिक्ष में छोड़ी गई किसी भी मानव निर्मित वस्तु को संदर्भित करती हैं।
  • इसमें निष्क्रिय उपग्रहों जैसी बड़ी वस्तुएँ और रॉकेटों से निकले मलबे या पेंट के टुकड़े जैसी छोटी वस्तुएँ भी शामिल हैं।

अंतरिक्ष मलबा संबंधी चिंताएँ: अंतरिक्ष मलबा उपग्रहों के परिचलन हेतु खतरा उत्पन्न करने के साथ-साथ भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण प्रयासों में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

  • यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का अनुमान है कि 1 सेमी या उससे बड़े कक्षीय मलबे के 1 मिलियन से अधिक टुकड़े, तथा 10 सेमी से बड़े 30,000 से अधिक टुकड़े, पृथ्वी की निचली कक्षा (पृथ्वी की सतह से 2000 किमी ऊपर) में घूम रहे हैं।
  • अंतरिक्ष की विशालता के कारण मलबा हटाना कठिन और महंगा है। केसलर सिंड्रोम (Kessler Syndrome) की संभावना, टकराव का एक व्यापक प्रभाव है, जिसमें मलबा अंतरिक्ष में मौजूद मलबे से अधिक मलबा उत्पन्न होता है, जिससे अंतरिक्ष यान, उपग्रहों और अन्य अंतरिक्ष बुनियादी ढाँचे को नुकसान होने का खतरा काफी बढ़ जाता है।
  • अंतरिक्ष मलबा, पुनः प्रवेश करने पर, पृथ्वी की सतह पर प्रभाव डाल सकता है, जिससे आबादी वाले क्षेत्रों के लिए खतरा पैदा हो सकता है, तथा इसके जलने के कारण हानिकारक रसायनों और कणों के निकलने से वायुमंडलीय प्रदूषण भी देखने को मिल सकता है।

अंतरिक्ष मलबे के शमन हेतु की गई पहल

वैश्विक प्रयास:

  • अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति (IADC): IADC का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी की कक्षा में अंतरिक्ष के मलबे से संबंधित प्रयासों का समन्वय करना है। इसमें मानव निर्मित और प्राकृतिक दोनों तरह का मलबा शामिल है।
  • यूनाइटेड नेशंस ऑफिस फॉर आउटर स्पेस अफेयर्स (UNOOSA): यह अंतरिक्ष के मलबे के उन्मूलन संबंधी सर्वोत्तम प्रथाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • अंतरिक्ष टग और लेजर (Space Tugs and Laser) जैसी मलबा हटाने वाली तकनीकों का अनुसंधान और विकास पर ढेन देना।

भारत द्वारा किए गए प्रयास

  • इसरो का एक्सपोसैट मिशन (XPoSat Mission) सफलतापूर्वक पूरा हो गया है, क्योंकि इसमें रॉकेट अंतरिक्ष में कोई भी मलबा छोड़े बगैर सुरक्षित रूप से उत्तरी प्रशांत महासागर में उतर गया।
  • इसरो स्वच्छ कक्षा चयन, रॉकेट निपटान के लिए ईंधन आवंटन और सटीकता के साथ पुनः प्रवेश नियंत्रण वाले मलबा-मुक्त दृष्टिकोण को अपनाने की रणनीति बना रहा है, जो वर्ष 2025 में शुरू होगा।
  • प्रोजेक्ट NETRA अर्थात, नेत्र (स्पेस ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग और विश्लेषण के लिए नेटवर्क ): वर्ष 2020 में लॉन्च किया गया प्रोजेक्ट नेत्र (NETRA) एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के रूप में कार्य करता है, जो अंतरिक्ष में भारतीय उपग्रहों के मलबे और इससे संभावित खतरों का पता लगाता है।
  • भारत वर्ष 2030 तक मलबा मुक्त अंतरिक्ष मिशन के लिए प्रतिबद्ध है।

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