संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रबंधन और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन।
संदर्भ: हाल ही में, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने एनसीआर और आस-पास के क्षेत्रों में 2026 के फसल कटाई सीजन के दौरान गेहूं की पराली जलाने की प्रकिया की रोकथाम और उन्मूलन हेतु राज्य कार्य योजनाओं के समन्वित और समयबद्ध कार्यान्वयन के संबंध में व्यापक वैधानिक निर्देश जारी किए।
अन्य संबंधित जानकारी
• ये निर्देश पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारों को जारी किए गए हैं, जिनमें राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सरकार और राजस्थान से भी ऐसे ही उपाय अपनाने की अपेक्षा की गई है।
• यद्यपि ऐतिहासिक रूप से धान की पराली (अक्टूबर-नवंबर) पर ही मुख्यतः ध्यान दिया जाता था, CAQM ने यहाँ पाया कि गेहूं की कटाई के दौरान लगने वाली आग भी स्थानीय और क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता को काफी खराब करती है।
- गेहूं कटाई सीजन (1 अप्रैल-31 मई 2025) के दौरान उपग्रह निगरानी में पंजाब में 10,207, हरियाणा में 1,832 और उत्तर प्रदेश के एनसीआर जिलों में 259 आग की घटनाएं दर्ज की गईं।
• आयोग ने निर्देश संख्या 96 जारी करते हुए आगामी 2026 सीजन के दौरान गेहूं पराली जलाने की प्रक्रिया को समाप्त करने और व्यवहार्य विकल्पों की खोज के लिए समयबद्ध कार्यान्वयन का आदेश दिया है।
• राज्यों को निरंतर निगरानी और आवश्यक कार्रवाई के लिए आयोग को मासिक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
CAQM द्वारा जारी मुख्य निर्देश
• राज्य कार्य योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन: पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकारें गेहूं की पराली जलाने पर नियंत्रण के लिए अनुमोदित राज्य कार्य योजनाओं को पूर्णतः लागू करेंगी।
• पराली प्रबंधन की खेत-स्तरीय मैपिंग: प्रत्येक गाँव के हर खेत की मैपिंग की जाएगी ताकि पराली प्रबंधन के विशिष्ट माध्यम जैसे फसल विविधीकरण, स्व-स्थाने प्रबंधन, पर-स्थाने उपयोग या चारे की पहचान की जा सके।
• निगरानी हेतु नोडल अधिकारियों की टैगिंग: किसानों के समूह के साथ विशिष्ट नोडल अधिकारियों को जोड़ा जाएगा और जिले के सभी किसानों को कवर किया जाएगा। प्रभावी निगरानी के लिए प्रत्येक नोडल अधिकारी के साथ अधिकतम 100 किसान जोड़े जा सकते हैं।
• CRM मशीनों की समय पर उपलब्धता: राज्य एक समर्पित मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से कटाई के मौसम के दौरान ‘फसल अवशेष प्रबंधन’ (CRM) मशीनों का इष्टतम उपयोग और समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे।
• छोटे और सीमांत किसानों के लिए शुल्क-मुक्त पहुँच: ‘कस्टम हायरिंग सेंटर’ (CHCs) एकसमान पहुँच सुनिश्चित करने के लिए लघु और सीमांत किसानों को बिना किसी किराए के CRM मशीनें प्रदान करेंगे।
• पर्याप्त भंडारण बुनियादी ढांचे का विकास: गेहूं के भूसे के नुकसान को कम करने और आग की घटनाओं के जोखिम में कमी लाने के लिए सरकारें पर्याप्त और सुरक्षित भंडारण सुविधाएं स्थापित करेंगी।
• जिला स्तरीय आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन योजना: प्रत्येक जिला गेहूं के भूसे की निरंतर आपूर्ति श्रृंखला बनाने के लिए एक योजना तैयार करेगा, जिसमें पूरे वर्ष इसके पर-स्थाने अनुप्रयोगों और चारे के रूप में उपयोग को शामिल किया जाएगा।
• पराली सुरक्षा बल का गठन: खुले में जलाने की घटनाओं की रोकथाम हेतु जिला और ब्लॉक स्तर पर एक समर्पित ‘पराली सुरक्षा बल’ का गठन किया जाएगा, जिसमें पुलिस, कृषि विभाग के अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी शामिल होंगे।
• प्रभावी प्रवर्तन और गश्त: प्रवर्तन एजेंसियां गश्ती में तेजी लाएंगी, विशेष रूप से देर शाम के समय जब आग लगाने की घटनाओं की संभावना अधिक होती है।
• पर्यावरण मुआवजा तंत्र: राज्य जलाने संबंधी मानदंडों के उल्लंघन के विरुद्ध उचित ‘पर्यावरण मुआवजा तंत्र’ का कार्यान्वयन सुनिश्चित करेंगे।
• सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) गतिविधियाँ: सरकारी योजनाओं, सर्वोत्तम पद्धतियों और फसल अवशेष जलाने के पर्यावरणीय प्रभाव के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाए जाएंगे।
पराली जलाने के प्रभाव
• वायु प्रदूषण: यह सूक्ष्म कणों (PM2.5 और PM10) और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) एवं सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) जैसी विषाक्त गैसों का एक प्रमुख स्रोत है।
• स्मॉग और धुंध (Haze): उत्सर्जन सर्दियों के मौसम के साथ अभिक्रिया कर सघन स्मॉग बनाता है, जिससे दृश्यता काफी कम हो जाती है और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में वायु गुणवत्ता स्तर खराब होता है।
• ग्लोबल वार्मिंग (भूमंडलीय तापन): पराली जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) और मीथेन (CH4) जैसी ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) का उत्सर्जन होता है।
• पोषक तत्वों की हानि: एक टन पराली जलाने के परिणामस्वरूप लगभग 5.5 किग्रा नाइट्रोजन, 2.3 किग्रा फास्फोरस, 25 किग्रा पोटेशियम और 1.2 किग्रा सल्फर का नुकसान होता है।
• श्वसन और हृदय संबंधी समस्याएँ: इसके संपर्क में आने से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और यहाँ तक कि फेफड़ों के कैंसर जैसी बीमारियाँ भी हो सकती हैं।
एनसीआर और आस-पास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के बारे में
• स्थापना: CAQM की स्थापना ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आस-पास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021’ के तहत की गई थी, जो 2020 में जारी एक अध्यादेश के बाद प्रभावी हुआ।
• प्रकृति और उद्देश्य: इसने 22 वर्ष पुराने ‘पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण’ (EPCA) को प्रतिस्थापित किया। इसका उद्देश्य इस क्षेत्र में वायु-गुणवत्ता शासन के लिए एक स्थायी और सर्वोपरि निकाय के रूप में कार्य करना है।
• अनन्य अधिकार क्षेत्र: इसका एनसीआर और पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के आस-पास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता के मामलों पर अनन्य अधिकार क्षेत्र है। विवाद की स्थिति में, इसके निर्देश इन राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों या राज्य सरकारों पर प्रभावी होते हैं।
• कार्य: यह ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) जैसे उपायों के कार्यान्वयन की देखरेख करता है, प्रदूषण स्रोतों की निगरानी करता है, प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों को प्रतिबंधित करता है और सीमा पार वायु प्रदूषण से निपटने के लिए राज्यों के बीच समन्वय करता है।
• संरचना: यह एक बहु-सदस्यीय निकाय है, जिसमें एक पूर्णकालिक अध्यक्ष, कई पदेन और पूर्णकालिक सदस्य, गैर-सरकारी संगठन (NGO) के सदस्य और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) एवं नीति आयोग जैसी एजेंसियों के तकनीकी सदस्य शामिल होते हैं।
