संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
सामान्य अध्ययन -3: आपदा और आपदा प्रबंधन।
संदर्भ: हाल ही में, केरल तटीय उच्च-ज्वारीय बाढ़/समुद्र अतिक्रमण को राज्य-विशिष्ट आपदा (State-specific disaster) घोषित करने वाला भारत का पहला राज्य बन गया है।
अन्य संबंधित जानकारी
• आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत जारी यह आदेश स्पष्ट करता है कि जब ज्वारीय बाढ़ के कारण जन-धन, आजीविका और बुनियादी ढांचे को क्षति पहुँचती है, तो इसे एक सामान्य ज्वारीय घटना न मानकर ‘राज्य-विशिष्ट आपदा’ माना जाएगा।
- सामान्य तौर पर, राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) के मानदंडों के अनुसार, नियमित ज्वार आने की परिघटना को ‘आपदा’ नहीं माना जाता है। हालाँकि, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 2(d) आपदा को ऐसे विनाश या प्राकृतिक घटना के रूप में परिभाषित करती है, जो समुदाय की उनसे निपटने की क्षमता से परे जन जीवन, आजीविका या संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाती है।
• यह निर्णय राज्य को उन तटीय समुदायों को राहत प्रदान करने के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) के संसाधनों का उपयोग करने में सक्षम बनाता है, जो उच्च ज्वार रेखा के पार समुद्री जल के प्रवेश से प्रभावित हुए हैं।
- SDRF के दिशा-निर्देशों के अनुसार, राज्य अपने वार्षिक आवंटन का 10% तक उन “स्थानीय/राज्य-विशिष्ट आपदाओं” के लिए उपयोग कर सकते हैं जो गृह मंत्रालय (MHA) की राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचित सूची में शामिल नहीं हैं बर्शते कि इसके लिए राज्य कार्यकारी समिति (SEC) का अनुमोदन लिया गया हो।
ज्वार-भाटा और ज्वारीय रेखाओं के बारे में
• ज्वार-भाटा समुद्र के जल स्तर में होने वाला आवधिक उतार-चढ़ाव है, जो मुख्यतः चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव द्वारा संचालित होता है।
• पूर्णिमा और अमावस्या के दौरान, सूर्य-पृथ्वी-चंद्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं, ज्वारीय परास अपने अधिकतम स्तर पर होता है और उच्च ज्वार सबसे ऊंचे होते हैं तो दीर्घ ज्वार (Spring Tides) आते हैं।
• ज्वारीय बाढ़ तब आती है जब समुद्र का स्तर अस्थायी रूप से एक निश्चित सीमा से ऊपर उठ जाता है और निचले तटीय क्षेत्रों को जलमग्न कर देता है।
• चक्रवाती तूफान महोर्मि (Storm surges) के विपरीत, ज्वारीय बाढ़ प्रतिदिन (दिन में दो बार) आ सकती है और पूर्णिमा एवं अमावस्या (दीर्घ ज्वार) के दौरान यह अधिक गंभीर होती है।
• भारत के तटीय विनियमन क्षेत्र (Coastal Regulation Zone – CRZ) ढांचे के अंतर्गत, तटीय प्रबंधन और विकास नियंत्रण उच्च ज्वार रेखा (High Tide Line – HTL) और निम्न ज्वार रेखा (Low Tide Line – LTL) से संबद्ध हैं।
- उच्च ज्वार रेखा (HTL) को कानूनी रूप से स्थल पर उस रेखा के रूप में परिभाषित किया जाता है, जहाँ तक दीर्घ ज्वार के दौरान उच्चतम जल रेखा पहुँचती है।
- निम्न ज्वार रेखा (LTL) स्थल या तट पर वह रेखा है, जहाँ तक दीर्घ ज्वार के दौरान न्यूनतम जल रेखा पहुँचती है।
केरल में ज्वारीय बाढ़ के बारे में
• केरल की तटरेखा लगभग 590 किमी लंबी है। इसके 14 में से 9 जिले अरब सागर के से लगे हैं। इस कारण यह ज्वारीय प्रभावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है।
• ज्वारीय बाढ़ का जोखिम कुट्टनाड (अलप्पुझा) और कोच्चि क्षेत्र जैसे निचले इलाकों में सबसे अधिक है, क्योंकि इनके कुछ हिस्से समुद्र तल के बराबर या उससे नीचे स्थित हैं।
• अधिकारियों का अनुमान है कि केरल की लगभग 10% जनसंख्या इस प्रकार की तटीय बाढ़ से प्रभावित है, जिसका सीधा प्रभाव मछुआरों, तटीय किसानों, छोटे व्यापारियों और सुभेद्य तटीय क्षेत्रों के निवासियों पर पड़ता है।
• ज्वारीय बाढ़ के लिए उत्तरदायी कारकों में त्रुटिपूर्ण भूमि-उपयोग नियोजन (बाढ़ के मैदानों, नदी किनारों और ‘पोरम्बोक’ भूमि पर बस्तियां), नदियों और झीलों में गाद का जमा होना/नदियों,झीलों की गहराई में कमी तथा बदलती तटीय भू-आकृति और समुद्र के जल स्तर शामिल हैं।
• वर्षा के परिणामस्वरूप आने वाली बाढ़ के विपरीत, ज्वारीय बाढ़ वर्ष भर रहने वाली आपदा है, जिससे इसका संचयी सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है।
घोषणा का महत्त्व
• समय पर राहत पहुँचाना: यह अधिसूचना राज्य को SDRF ढांचे के अंतर्गत संरचित वित्तीय सहायता प्रदान करने में सक्षम बनाती है, जिससे तटीय उच्च-ज्वारीय बाढ़ के कारण मकानों को होने वाले नुकसान, आजीविका के नुकसान और बुनियादी ढांचे पर पड़ने वाले प्रभावों के लिए मुआवजा सुनिश्चित किया जा सकेगा।
• विकेंद्रीकृत आपदा शासन का सुदृढ़ीकरण: केरल द्वारा “राज्य-विशिष्ट आपदा” के विकल्प का उपयोग यह दर्शाता है कि राज्य किस प्रकार आपदा प्रबंधन अधिनियम के ढांचे के भीतर संदर्भ-विशिष्ट खतरों का समाधान कर सकते हैं, जिससे जोखिम प्रबंधन में लचीलापन बढ़ता है।
• तटीय अनुकूलन योजना को मुख्यधारा में लाना: राहत की पात्रता को उच्च ज्वार रेखा (HTL) जैसे वैज्ञानिक रूप से परिभाषित मापदंडों से जोड़कर, यह कदम बेहतर भूमि-उपयोग विनियमन, तटीय क्षेत्र नियोजन, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और दीर्घकालिक लचीली रणनीतियों का समर्थन करता है।
• नीतिगत मिसाल कायम करना: यह घोषणा समान ज्वारीय और समुद्री-जल के प्रवेश के जोखिमों का सामना कर रहे अन्य तटीय राज्यों के लिए एक शासन मॉडल पेश करती है, जिसके परिणामस्वरूप भारत संभावित तौर पर धीमी गति से आने वाले जलवायु-जनित खतरों के वर्गीकरण और प्रबंधन के तरीकों में बदलाव कर सकता है।
