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सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान—महत्त्वपूर्ण प्रावधान एवं मूल संरचना; केंद्र और राज्यों द्वारा जनसंख्या के कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ।
संदर्भ: हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया गया था, जो इस्लाम धर्म अपनाने वाले कुछ व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) श्रेणी के अंतर्गत आरक्षण प्राप्त करने की अनुमति देता था।
मामले की पृष्ठभूमि
- तमिलनाडु सरकार का 2024 का आदेश: राज्य सरकार ने एक ऐसी व्यवस्था शुरू की, जिसके तहत निर्दिष्ट पिछड़े समुदायों से इस्लाम धर्म अपनाने वाले व्यक्ति राज्य की अधिसूचित सात पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदायों में से किसी एक के अंतर्गत सामुदायिक प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकते थे।
- न्यायिक हस्तक्षेप: यह विवाद तब उत्पन्न हुआ, जब धर्म परिवर्तन करने वाले एक व्यक्ति ने मुस्लिम लब्बाई समुदाय का प्रमाण-पत्र माँगा। मद्रास उच्च न्यायालय ने 25 जून, 2026 को सरकारी आदेश को निरस्त कर दिया और सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।
- मुख्य मुद्दा: क्या धर्म परिवर्तन से पहले की जाति या समुदाय की स्थिति के आधार पर, धर्म परिवर्तन के बाद किसी अन्य अधिसूचित पिछड़ा वर्ग समुदाय के अंतर्गत पात्रता स्वतः स्थापित हो जाती है?
संवैधानिक एवं कानूनी ढाँचा
- अनुच्छेद 15(4) और 16(4): अनुच्छेद 15(4) सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान करने में सक्षम बनाता है। अनुच्छेद 16(4) राज्य की सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व वाले पिछड़े वर्गों के लिए सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण का प्रावधान करता है।
- पिछड़े वर्गों की पहचान: इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुसार, पिछड़े वर्ग विभिन्न धार्मिक समुदायों में मौजूद हो सकते हैं। हालाँकि, केवल धर्म परिवर्तन से किसी विशेष अधिसूचित समुदाय की सदस्यता स्थापित नहीं होती और न ही आरक्षण की पात्रता स्वतः हस्तांतरित होती है।
- संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 का पैराग्राफ 3: इसमें प्रावधान है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्तियों को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता।
- न्यायिक निर्णय: चिंतादा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (मार्च 2026) मामले में एक अलग निर्णय के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने ईसाई धर्म अपनाने और अनुसूचित जाति की स्थिति से जुड़े मामले में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 को लागू किया।
प्रमुख कानूनी निहितार्थ
- आरक्षण की पात्रता: यह निर्णय स्पष्ट करता है कि केवल इस्लाम धर्म अपनाने से किसी विशिष्ट अधिसूचित पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) श्रेणी के अंतर्गत पात्रता स्थापित नहीं होती।
- कार्यपालिका की कार्रवाई की सीमाएँ: यह निर्णय रेखांकित करता है कि किसी अधिसूचित पिछड़ा वर्ग श्रेणी में प्रवेश का स्वतः मार्ग कार्यकारी आदेश के माध्यम से नहीं बनाया जा सकता, जब तक उस समुदाय के साथ आवश्यक सामाजिक एवं कानूनी संबंध स्थापित न हो।
- जातिगत पहचान और सामाजिक वंचना: यह निर्णय किसी व्यक्ति की पूर्ववर्ती जातिगत पहचान, निरंतर बनी रहने वाली सामाजिक वंचना तथा किसी विशिष्ट आरक्षण श्रेणी के लिए औपचारिक पात्रता के बीच के अंतर को रेखांकित करता है।
