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सामान्य अध्ययन–2: संसद और राज्य विधानमंडल—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार तथा इनसे संबंधित विषय; लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की प्रमुख विशेषताएँ।

संदर्भ: खेतों पर आधारित एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2025–26 में भारत के कपास क्षेत्र के 24–30% हिस्से में अनधिकृत आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) कपास संकर किस्मों की खेती की गई। यह जीएम फसलों के विनियमन और वास्तविक कृषि पद्धतियों के बीच मौजूद कमियों को उजागर करता है।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

• खेती का विस्तार: कपास की कुल 114.8 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में से अनुमानतः 26.2–29 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में अनधिकृत जीएम लक्षणों वाली संकर किस्में उगाई गईं।

• जीएम लक्षणों का पता लगना: 72.69% नमूनों में शाकनाशी-सहिष्णुता जीन cp4-epsps, जबकि 53.74% नमूनों में कीट-प्रतिरोधी जीन Vip3A पाया गया। ये प्रतिशत अध्ययन के लिए चुने गए नमूनों पर लागू होते हैं, न कि देश के सभी कपास खेतों पर।

• अनौपचारिक बीज बाजार: अध्ययन के अनुसार, अनधिकृत एचटीबीटी (HTBt) बीजों की बिक्री वर्ष 2017–18 में लगभग 35 लाख पैकेट से बढ़कर वर्ष 2025–26 में अनुमानतः 82–88 लाख पैकेट हो गई। इनका अनुमानित बाजार मूल्य ₹820–880 करोड़ था। इसके विपरीत, स्वीकृत बीटी कपास के बीज पैकेटों की बिक्री वर्ष 2022–23 के 596 लाख से घटकर वर्ष 2025–26 में 463 लाख रह गई।

जीएम फसलों, बीटी कपास और एचटीबीटी कपास के बारे में

• आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलें: इन फसलों को आनुवंशिक अभियांत्रिकी तकनीकों का उपयोग करके विकसित किया जाता है, ताकि कीट-प्रतिरोध, शाकनाशी-सहिष्णुता या रोग-प्रतिरोध जैसे लक्षणों को शामिल किया जा सके या उनमें बदलाव किया जा सके। कुछ तकनीकों में किसी अन्य जीव से आनुवंशिक सामग्री शामिल की जाती है।

• बीटी कपास और एचटीबीटी कपास

  • बीटी कपास: भारत में वर्ष 2002 में व्यावसायिक खेती के लिए स्वीकृत इस कपास में मृदा जीवाणु बैसिलस थुरिंजिएन्सिस (Bt) से प्राप्त जीनों का उपयोग किया जाता है। स्वीकृत cry1Ac और cry2Ab जीन ऐसे प्रोटीन उत्पन्न करते हैं, जो कपास को कुछ विशिष्ट बॉलवर्म कीटों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • एचटीबीटी कपास: इसमें बीटी आधारित कीट-प्रतिरोध और शाकनाशी-सहिष्णुता दोनों लक्षण होते हैं। cp4-epsps जीन कपास के पौधों को ग्लाइफोसेट के प्रति सहिष्णु बनाता है, जिससे इस लक्षण वाले कपास के पौधों को नुकसान पहुँचाए बिना खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है। भारत में इस अतिरिक्त लक्षण को व्यावसायिक खेती के लिए स्वीकृति नहीं दी गई है।
  • Vip3A लक्षण: यह एक अतिरिक्त कीट-प्रतिरोधी लक्षण है, जो cry1Ac और cry2Ab से भिन्न तरीके से कार्य करता है। अध्ययन के नमूनों में इसकी उपस्थिति एक अन्य अस्वीकृत जीएम लक्षण की मौजूदगी को दर्शाती है। अध्ययन में इसके उपयोग को गुलाबी सुंडी सहित अन्य कीटों के बेहतर नियंत्रण की माँग से जोड़ा गया है।

जीएम फसलें बनाम जीनोम-संपादित फसलें

आधारआनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलेंजीन-संपादन (जीन एडिटिंग) वाली फसलें
तकनीकआनुवंशिक अभियांत्रिकी के माध्यम से बाहरी आनुवंशिक पदार्थ प्रविष्ट कराया जा सकता है।सीआरआईएसपीआर-कैस जैसे लक्षित उपकरण डीएनए में विशिष्ट परिवर्तन करते हैं।
विदेशी डीएनएइसमें प्रविष्ट कराया गया आनुवंशिक पदार्थ हो सकता है।पौधों का विकास बाहरी डीएनए प्रविष्ट कराए बिना किया जा सकता है।
भारत में विनियामक प्रक्रिया1989 के नियमों के अंतर्गत आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) जीवों के जैव-सुरक्षा ढाँचे द्वारा विनियमित।देशी डीएनए प्रविष्ट कराए बिना विकसित एसडीएन-1 (डीएनए टेम्पलेट के बिना मरम्मत) और एसडीएन-2 (डीएनए टेम्पलेट का उपयोग करके मरम्मत) श्रेणी के पौधों को 1989 के नियमों के कुछ निर्दिष्ट प्रावधानों से छूट प्राप्त है।
उदाहरणव्यावसायिक खेती के लिए अनुमोदित बीटी कपास।वर्ष 2025 में घोषित डीआरआर राइस 100 (कमला) और पूसा डीएसटी राइस 1।

भारत में जीएम फसलों का विनियामक ढाँचा एवं स्थिति

• कानूनी ढाँचा: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 तथा वर्ष 1989 के नियम आनुवंशिक रूप से अभियांत्रित जीवों के निर्माण, उपयोग, आयात, निर्यात और भंडारण को विनियमित करते हैं।

• प्रमुख संस्थाएँ: संस्थागत जैव-सुरक्षा समिति (आईबीएससी) संस्थागत अनुसंधान की निगरानी करती है; आनुवंशिक हेरफेर संबंधी समीक्षा समिति (आरसीजीएम) संबंधित अनुसंधान एवं विकास की निगरानी करती है; तथा आनुवंशिक अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (जीईएसी) पर्यावरण में विमोचन से संबंधित प्रस्तावों का मूल्यांकन करती है। निर्णय लागू वैधानिक अनुमोदन प्रक्रिया के अनुसार लिए जाते हैं।

• जीएम फसलों की स्थिति: बीटी कपास भारत में व्यावसायिक खेती के लिए स्वीकृत एकमात्र जीएम फसल बनी हुई है। बीटी बैंगन की व्यावसायिक खेती पर स्थगन लागू है। जीएम सरसों को जीईएसी से पर्यावरणीय विमोचन की स्वीकृति मिली है, लेकिन इसे बिना किसी प्रतिबंध के व्यावसायिक खेती की अनुमति के समान नहीं माना जाना चाहिए।

• जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल: जैव विविधता अभिसमय के अंतर्गत अपनाया गया यह प्रोटोकॉल उन जीवित रूपांतरित जीवों के सुरक्षित प्रबंधन, परिवहन और उपयोग के लिए अंतरराष्ट्रीय रूपरेखा प्रदान करता है, जो जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। इसमें मानव स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को भी ध्यान में रखा जाता है। भारत ने वर्ष 2003 में इस प्रोटोकॉल की पुष्टि की थी। भारत में जीएम फसलों की स्वीकृति की प्रक्रिया घरेलू कानूनों के अंतर्गत ही संचालित होती है।

किसान अनधिकृत जीएम कपास क्यों अपना रहे हैं?

• श्रमिकों की कमी और उच्च लागत: हाथों से खरपतवार निकालने में अधिक श्रम लगता है और किसानों को किफायती दरों पर श्रमिक उपलब्ध कराने में कठिनाई होती है।

• खरपतवार प्रबंधन की कम लागत: अध्ययन के अनुसार, ग्लाइफोसेट का दो से तीन बार छिड़काव करने पर प्रति एकड़ ₹750–850 का खर्च आता है, जबकि हाथों से खरपतवार निकालने पर ₹12,000–15,000 का खर्च आता है। ये अनुमान स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

• अतिरिक्त कीट-प्रतिरोध की माँग: नमूनों में Vip3A की उपस्थिति अतिरिक्त कीट-प्रतिरोधी लक्षणों में किसानों की रुचि का संकेत देती है। इसका संबंध गुलाबी सुंडी जैसे कीटों के विरुद्ध मौजूदा तकनीकों की प्रभावशीलता को लेकर चिंताओं से हो सकता है। हालाँकि, केवल इस लक्षण को अपनाने से इसकी दीर्घकालिक प्रभावशीलता सिद्ध नहीं होती।

चिंताएँ एवं निहितार्थ

• विनियामक एवं जैव-सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: अनधिकृत खेती निर्धारित मूल्यांकन और अनुमोदन प्रक्रियाओं को दरकिनार करती है, जिससे निगरानी, पता लगाने की क्षमता और जवाबदेही सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है।

• पर्यावरणीय जोखिम: ग्लाइफोसेट के बार-बार उपयोग से शाकनाशी-प्रतिरोधी खरपतवारों का चयन हो सकता है, जबकि व्यापक प्रभाव वाले शाकनाशियों का छिड़काव गैर-लक्षित वनस्पतियों और जीवों को प्रभावित कर सकता है।

• प्रतिरोधकता एवं बीज गुणवत्ता: कुछ विशेष कीट-प्रतिरोधी लक्षणों पर अत्यधिक निर्भरता से उनकी दीर्घकालिक प्रभावशीलता कम हो सकती है। अनौपचारिक बीज वितरण नेटवर्क गुणवत्ता आश्वासन को भी कमजोर करते हैं और बीजों के अपेक्षित परिणाम न देने पर किसानों के पास शिकायत निवारण के सीमित विकल्प रह जाते हैं।

• नीतिगत चुनौती: अनधिकृत संकर किस्मों का प्रसार इस आवश्यकता को उजागर करता है कि वैज्ञानिक मूल्यांकन और विनियामक अनुपालन बनाए रखते हुए किसानों की उत्पादन संबंधी बाधाओं का समाधान किया जाए।

आगे की राह

• प्रवर्तन को सुदृढ़ करना: अनधिकृत बीज उत्पादन, वितरण और खेती की निगरानी में सुधार करना, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ ऐसी गतिविधियों की पहचान की गई है।

• किफायती विकल्पों को बढ़ावा देना: महँगे मानवीय श्रम और शाकनाशियों के बार-बार उपयोग पर निर्भरता कम करने के लिए यंत्रीकृत निराई तथा खरपतवारों के एकीकृत प्रबंधन का विस्तार करना।

• वैज्ञानिक मूल्यांकन में सुधार करना: प्रस्तावित जीएम लक्षणों का पारदर्शी एवं साक्ष्य-आधारित मूल्यांकन सुनिश्चित करना तथा विनियामक निर्णयों को स्पष्ट रूप से संप्रेषित करना।

• किसानों की आवश्यकताओं का समाधान करना: श्रमिकों की कमी, खरपतवार प्रबंधन की लागत और कीट प्रतिरोधकता जैसी समस्याओं का समाधान करते हुए यह सुनिश्चित करना कि नए जीएम लक्षण निर्धारित अनुमोदन प्रक्रिया का पालन करें।

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