संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-3: आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौतियाँ उत्पन्न करने में बाह्य राज्य और गैर-राज्य अभिकर्ताओं की भूमिका; विकास और उग्रवाद के प्रसार के बीच संबंध।

संदर्भ: गृह मंत्रालय (MHA) ने सुरक्षा स्थिति की समीक्षा के बाद मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के निर्दिष्ट क्षेत्रों में 1 अक्टूबर 2026 से अगले छह महीनों के लिए सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम (AFSPA), 1958 का विस्तार कर दिया है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • मणिपुर: 13 पुलिस थानों के अधिकार क्षेत्र वाले क्षेत्रों, जो पाँच जिलों में स्थित हैं, को छोड़कर पूरे राज्य में अशांत क्षेत्र की घोषणा को बढ़ा दिया गया है।
  • नागालैंड: अफस्पा को नौ जिलों—दीमापुर, निउलैंड, चुमौकेदिमा, मोन, किफिरे, नोकलाक, फेक, पेरेन और मेलुरी—तथा पाँच अन्य जिलों में 21 पुलिस थानों के अंतर्गत आने वाले निर्दिष्ट क्षेत्रों में बढ़ाया गया है।
  • अरुणाचल प्रदेश: यह तिरप, चांगलांग और लोंगडिंग जिलों के साथ-साथ असम सीमा से लगे नामसाई जिले के तीन पुलिस थानों के अंतर्गत आने वाले निर्दिष्ट क्षेत्रों में भी जारी रहेगा।

AFSPA, 1958 को समझना

  • उद्देश्य: 1958 में अधिनियमित, AFSPA के तहत उन क्षेत्रों में सशस्त्र बलों को कुछ विशेष शक्तियाँ प्रदान की जा सकती हैं जिन्हें “अशांत क्षेत्र” (disturbed area) घोषित किया गया हो, जहाँ स्थिति इतनी अशांत या खतरनाक मानी जाती है कि नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए सशस्त्र बलों की तैनाती आवश्यक हो।
  • अशांत क्षेत्र की घोषणा: धारा 3 के तहत, केंद्र सरकार, किसी राज्य का राज्यपाल या किसी संघ राज्य क्षेत्र का प्रशासक, आधिकारिक अधिसूचना के माध्यम से, वैधानिक शर्तें पूरी होने पर किसी राज्य/संघ राज्य क्षेत्र के पूरे या किसी भाग को “अशांत क्षेत्र” घोषित कर सकता है।
  • विशेष शक्तियाँ और सुरक्षा उपाय: अशांत क्षेत्र में अधिकृत सशस्त्र बलों के कर्मी, वैधानिक शर्तों के अधीन, बल का प्रयोग, जिसमें निर्दिष्ट परिस्थितियों में घातक बल का प्रयोग भी शामिल है, बिना वारंट गिरफ्तारी और बिना वारंट तलाशी ले सकते हैं।
    • गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों को यथासंभव शीघ्र निकटतम पुलिस थाने को सौंपना आवश्यक है।
  • कानूनी संरक्षण: अधिनियम के तहत प्राप्त शक्तियों के प्रयोग में किए गए या किए जाने का दावा किए गए कृत्यों के संबंध में किसी व्यक्ति के विरुद्ध अभियोजन, वाद या अन्य कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिए पूर्व केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक है।
  • संवैधानिक व्यवस्था: यद्यपि लोक व्यवस्था और पुलिस राज्य सूची के विषय हैं, संविधान नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए संघ के सशस्त्र बलों की तैनाती का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 355 भी संघ पर राज्यों को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से बचाने का दायित्व डालता है।
  • जम्मू-कश्मीर: जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र बल (जम्मू और कश्मीर) विशेष शक्तियाँ अधिनियम, 1990 लागू है, जो 1958 के अधिनियम से अलग कानून है।

अफस्पा की वर्तमान स्थिति

  • पूर्वोत्तर: अफस्पा वर्तमान में मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और असम के निर्दिष्ट क्षेत्रों में लागू है। इसका क्षेत्र अलग-अलग राज्यों में पूरे जिलों से लेकर विशिष्ट पुलिस थाना क्षेत्रों तक भिन्न है।
  • असम: अफस्पा वर्तमान में असम के 3 जिलों—तिनसुकिया, चराईदेव और शिवसागर में लागू है। 1 अप्रैल 2025 से डिब्रूगढ़ को इसके दायरे से बाहर कर दिया गया था। असम के लिए अधिसूचना राज्य सरकार द्वारा जारी की जाती है।
  • मिजोरम: अफस्पा वर्तमान में लागू नहीं है। मिजो शांति समझौते के बाद 1986 में मिजोरम से AFSPA हटा लिया गया था। मिजोरम को 1987 में पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ।
  • त्रिपुरा और मेघालय: 2015 में त्रिपुरा और 2018 में मेघालय से अफस्पा पूरी तरह हटा लिया गया। यह दर्शाता है कि सुरक्षा परिस्थितियों में सुधार होने पर इसके भौगोलिक दायरे को कम या पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है।

अफस्पा पर न्यायिक स्थिति

  • इंदरजीत बरुआ बनाम असम राज्य (1983): उच्चतम न्यायालय ने किसी क्षेत्र को “अशांत” घोषित करने की शक्ति को मान्यता दी, लेकिन कहा कि ऐसी घोषणा मनमानी नहीं हो सकती और यह वस्तुनिष्ठ आधारों पर होनी चाहिए।
  • नागा पीपुल्स मूवमेंट ऑफ ह्यूमन राइट्स बनाम भारत संघ (1997): न्यायालय ने AFSPA की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, साथ ही अशांत क्षेत्र की घोषणाओं की समय-समय पर समीक्षा और शक्तियों के मनमाने प्रयोग से सुरक्षा उपायों की आवश्यकता पर बल दिया। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सशस्त्र बल नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए कार्य करते हैं।
  • EEVFAM बनाम भारत संघ (2016): न्यायालय ने कहा कि AFSPA सशस्त्र बलों के कर्मियों को पूर्ण प्रतिरक्षा प्रदान नहीं करता और न्यायेतर हत्याओं के आरोपों की कानून के अनुसार जाँच की जानी आवश्यक है।

अफस्पा से संबंधित चिंताएँ

  • व्यापक बल-प्रयोग संबंधी शक्तियाँ: बल प्रयोग, बिना वारंट गिरफ्तारी और तलाशी से संबंधित शक्तियाँ आनुपातिकता, संभावित दुरुपयोग और नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करती हैं।
  • जवाबदेही: कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिए पूर्व केंद्रीय सरकार की मंजूरी की आवश्यकता ने कथित उल्लंघनों के लिए प्रभावी कानूनी उपचार तक पहुँच को लेकर चिंताएँ पैदा की हैं। नागालैंड में ओटिंग हत्याकांड के अनुभव ने भी AFSPA के तहत कार्यरत कर्मियों के अभियोजन से जुड़ी व्यावहारिक कठिनाइयों पर नए सिरे से ध्यान आकर्षित किया।
  • लंबे समय तक लागू रहना: बार-बार विस्तार किए जाने से यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या विशेष सुरक्षा उपाय विशेष क्षेत्रों में अभी भी आवश्यक हैं, विशेषकर तब जब किसी राज्य के भीतर विभिन्न क्षेत्रों की परिस्थितियों में काफी अंतर हो।
  • नागरिक–सैन्य संतुलन: असाधारण शक्तियों पर निरंतर निर्भरता के साथ प्रभावी नागरिक प्रशासन, सामान्य पुलिस व्यवस्था और संस्थागत जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

सुझाव/समिति की सिफारिशें

  • न्यायमूर्ति बी.पी. जीवन रेड्डी समिति (2004–05): समिति ने AFSPA को निरस्त करने तथा इसके उपयुक्त प्रावधानों को गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) में शामिल करने की सिफारिश की। साथ ही, शिकायत निवारण और जवाबदेही तंत्र को मजबूत करने की बात कही।
  • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2007): आयोग ने अफस्पा को निरस्त करने की सिफारिश की। आयोग के अनुसार, इसका निरंतर लागू रहना प्रभावित क्षेत्रों में भेदभाव और अलगाव की धारणा को बढ़ाने में योगदान देता रहा है।
  • न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (2013): समिति ने सिफारिश की कि सशस्त्र बलों के कर्मियों द्वारा महिलाओं के विरुद्ध निर्दिष्ट यौन अपराधों के मामलों में AFSPA के तहत संरक्षण प्राप्त करने के लिए अभियोजन की पूर्व अनुमति लेनी आवश्यक नहीं होनी चाहिए।
  • संतोष हेगड़े आयोग (2013): उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त आयोग ने मणिपुर में कथित छह न्यायेतर हत्याओं की जाँच की। आयोग ने जाँचे गए मुठभेड़ों को वास्तविक नहीं पाया और उग्रवाद-रोधी अभियानों में अधिक जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित किया।
Shares: