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सामान्य अध्ययन-3: बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।
संदर्भ: भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड (NPCIL) ने हाल ही में राजस्थान के रावतभाटा में स्थित RAPP-8, 700 मेगावाट विद्युत क्षमता वाले स्वदेशी दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWR) में प्रारंभिक ईंधन लोडिंग (IFL) शुरू की है। यह रिएक्टर के कमीशनिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
अन्य संबंधित जानकारी
- RAPP-8, फ्लीट मोड में स्थापित किए जा रहे 16 स्वदेशी 700 मेगावाट PHWRs की श्रृंखला का चौथा रिएक्टर है।
- इस श्रृंखला के पहले दो रिएक्टर—गुजरात स्थित काकरापार परमाणु विद्युत स्टेशन (KAPS) की इकाइयाँ 3 और 4—ने 2023-24 में वाणिज्यिक संचालन शुरू किया। इसके बाद RAPP की इकाई 7 ने अप्रैल 2025 में वाणिज्यिक संचालन शुरू किया।
- RAPP की इकाई 8 के अतिरिक्त, NPCIL के वर्तमान में आठ अन्य रिएक्टर निर्माणाधीन हैं—हरियाणा के गोरखपुर और कर्नाटक के कैगा में दो-दो तथा तमिलनाडु के कुडनकुलम में चार रिएक्टर।

भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को समझना
- उद्देश्य: इस कार्यक्रम की परिकल्पना डॉ. होमी जे. भाभा ने 1950 के दशक में की थी। यह एक बंद परमाणु ईंधन चक्र पर आधारित है, जिसका उद्देश्य भारत के सीमित यूरेनियम संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना तथा धीरे-धीरे देश के प्रचुर थोरियम संसाधनों का उपयोग करना है।
- चरण I – PHWRs: दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWRs) में प्राकृतिक यूरेनियम तथा भारी जल का उपयोग मंदक और शीतलक के रूप में किया जाता है। ये विद्युत उत्पादन के साथ-साथ U-238 से प्लूटोनियम-239 (Pu-239) का उत्पादन करते हैं, जो अगले चरण के लिए ईंधन का आधार बनता है।
- चरण II – FBRs: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBRs) प्लूटोनियम-आधारित ईंधन का उपयोग करते हैं तथा U-238 को Pu-239 में परिवर्तित करके अतिरिक्त विखंडनीय पदार्थ का उत्पादन करते हैं। इसके बाद ये थोरियम को यूरेनियम-233 (U-233) में परिवर्तित करने में भी सहायक हो सकते हैं।
- चरण III – थोरियम: थोरियम-232 उर्वर पदार्थ (Fertile) है, विखंडनीय (Fissile) नहीं। यह न्यूट्रॉन को अवशोषित करके विखंडनीय U-233 में परिवर्तित हो सकता है, जिससे भविष्य में बड़े पैमाने पर थोरियम के उपयोग का मार्ग प्रशस्त होता है।
- PFBR की उपलब्धि: कलपक्कम स्थित 500 मेगावाट के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने 6 अप्रैल 2026 को पहली बार क्रिटिकलिटी हासिल की, जो भारत के चरण II में प्रवेश का प्रतीक है।

भारत का परमाणु ऊर्जा परिदृश्य
- वर्तमान स्थिति: भारत में सात स्थलों पर 24 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर संचालित हो रहे हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 8.78 गीगावाट (GW) है। वर्ष 2024–25 में भारत के कुल विद्युत उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी 3.1% रही।
- रिएक्टर संरचना: परिचालन में शामिल रिएक्टरों में 20 PHWR, तारापुर में दो BWR तथा कुडनकुलम में दो VVER रिएक्टर हैं। यह भारत के स्वदेशी PHWR आधार के साथ-साथ आयातित रिएक्टर प्रौद्योगिकियों के उपयोग को दर्शाता है।
- वर्तमान विस्तार: कुल 7.5 GW क्षमता वाली नौ रिएक्टर इकाइयाँ निर्माणाधीन हैं, जबकि 10 स्वदेशी PHWR को फ्लीट-मोड में निर्माण के लिए मंजूरी दी गई है और अतिरिक्त इकाइयों के लिए तैयारियाँ चल रही हैं।
- निकट भविष्य की क्षमता: विभिन्न चरणों में चल रही परियोजनाओं के क्रमिक रूप से पूरा होने के साथ भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता 2031–32 तक 22.38 GW तक पहुँचने का अनुमान है।
- दीर्घकालिक लक्ष्य: विकसित भारत के लिए परमाणु ऊर्जा मिशन (Nuclear Energy Mission for Viksit Bharat) का लक्ष्य 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना है। इसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा को विश्वसनीय और निम्न-कार्बन बेसलोड विद्युत स्रोत के रूप में स्थापित करना है।
- प्रौद्योगिकी विविधीकरण: विस्तार में स्वदेशी 700 MWe PHWRs, अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से बड़े लाइट वाटर रिएक्टर (LWRs), फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBRs) और लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, दो 500 MWe FBRs के लिए परियोजना-पूर्व गतिविधियों को मंजूरी दी गई है।

परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार के लिए हाल की पहल
- शांति (SHANTI) अधिनियम, 2025: यह अधिनियम निजी क्षेत्र की भागीदारी को सक्षम बनाता है। इसके तहत केंद्रीय सरकार के लाइसेंस और नियामक सुरक्षा प्राधिकरण के अधीन परमाणु सुविधाओं एवं गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी की अनुमति दी गई है। साथ ही, परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को वैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है।
- SHANTI नियमों का मसौदा, 2026: प्रस्तावित नियम लाइसेंसिंग, परमाणु दायित्व, वित्तीय सुरक्षा और सुरक्षा के लिए परिचालन ढाँचा प्रदान करते हैं। इनमें निर्माण, स्वामित्व, संचालन और डीकमीशनिंग के लिए समग्र लाइसेंस का प्रावधान भी शामिल है।
- SMR मिशन: परमाणु ऊर्जा मिशन के तहत स्वदेशी लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) के विकास के लिए ₹20,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसका लक्ष्य 2033 तक कम-से-कम पाँच स्वदेशी SMR विकसित करना है। BARC द्वारा BSMR-200, SMR-55 तथा हाइड्रोजन उत्पादन के लिए उच्च-तापमान गैस-शीतित रिएक्टर विकसित किए जा रहे हैं।
- ईंधन सुरक्षा के लिए साझेदारियाँ: भारत ने 18 देशों के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते किए हैं।
- जुलाई 2026 में भारत और ऑस्ट्रेलिया ने एक प्रशासनिक व्यवस्था को अंतिम रूप दिया, जिसके तहत IAEA सुरक्षा उपायों के अंतर्गत शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ऑस्ट्रेलिया से भारत को दीर्घकालिक यूरेनियम निर्यात संभव होगा। इससे भारत के परमाणु ईंधन स्रोतों में विविधता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
आगे की चुनौतियाँ
- उच्च पूंजीगत लागत और लंबी निर्माण अवधि: परमाणु परियोजनाओं में प्रारंभिक स्तर पर बड़े निवेश, जटिल निर्माण प्रक्रिया और लंबे समय तक चलने वाली कमीशनिंग की आवश्यकता होती है। इसलिए परियोजनाओं का समय पर क्रियान्वयन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- ईंधन सुरक्षा: परमाणु ऊर्जा के तीव्र विस्तार के लिए पर्याप्त यूरेनियम आपूर्ति के साथ-साथ कुशल पुनर्संसाधन (Reprocessing) और बंद परमाणु ईंधन चक्र (Closed Nuclear Fuel Cycle) का विकास आवश्यक है।
- सुरक्षा और नियामक क्षमता: निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी तथा नई प्रौद्योगिकियों के उपयोग से नियामक संस्थाओं की तकनीकी विशेषज्ञता, स्वतंत्रता और प्रवर्तन क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता बढ़ेगी।
- परमाणु अपशिष्ट, दायित्व और जनविश्वास: रेडियोधर्मी अपशिष्ट का सुरक्षित प्रबंधन, प्रभावी दायित्व व्यवस्था, आपातकालीन तैयारियाँ तथा दीर्घकालिक जनविश्वास बनाए रखना परमाणु ऊर्जा के विस्तार के लिए आवश्यक हैं।
आगे की राह
- फ्लीट-मोड में तैनाती को तेज करना: कुशल परियोजना प्रबंधन, बड़े पैमाने पर खरीद और मजबूत घरेलू आपूर्ति शृंखलाओं के माध्यम से मानकीकृत 700 MWe PHWRs की स्थापना को गति दी जानी चाहिए।
- तीन-चरणीय कार्यक्रम को आगे बढ़ाना: भविष्य में थोरियम के उपयोग के लिए आवश्यक विखंडनीय पदार्थ के आधार को विकसित करने हेतु FBRs, पुनर्संसाधन तथा बंद ईंधन चक्र प्रौद्योगिकियों को मजबूत किया जाना चाहिए।
- सुरक्षा-आधारित विस्तार सुनिश्चित करना: रिएक्टर सुरक्षा, रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन और आपातकालीन तैयारियों के लिए कड़े मानकों को बनाए रखते हुए AERB की तकनीकी एवं संस्थागत क्षमता को मजबूत किया जाना चाहिए।
- स्वदेशीकरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच संतुलन: अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के माध्यम से यूरेनियम आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाई जानी चाहिए और उन्नत प्रौद्योगिकियों तक पहुँच बनाई जानी चाहिए, साथ ही परमाणु ईंधन चक्र के विभिन्न चरणों में घरेलू क्षमताओं को क्रमिक रूप से मजबूत किया जाना चाहिए।
