कर्नाटक में तुलु को अतिरिक्त आधिकारिक भाषा का दर्जा
संदर्भ: कर्नाटक मंत्रिमंडल ने दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में तुलु को दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा प्रदान किया।
अन्य संबंधित जानकारी
तुलु को यह दर्जा दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों के प्रशासनिक मामलों में लागू होगा तथा संबंधित जिला प्रशासन इसके कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार होंगे।
यह निर्णय शिक्षाविद् एम. मोहन अल्वा की अध्यक्षता में गठित उस समिति की सिफारिशों को लागू करता है, जिसे तुलु भाषा और संस्कृति का अध्ययन करने के लिए नियुक्त किया गया था।
तुलु के बारे में
- तुलु पाँच द्रविड़ भाषाओं में से एक है। यह मुख्य रूप से दक्षिण कन्नड़, उडुपी और उत्तरी केरल के कुछ हिस्सों में बोली जाती है तथा इसके लगभग 18–20 लाख मातृभाषी हैं।
- इसकी मौखिक परंपरा मजबूत और लोककथाओं की समृद्ध विरासत है, जिसमें यक्षगान और भूत कोला जैसी सांस्कृतिक परंपराएँ शामिल हैं।
- यद्यपि ऐतिहासिक रूप से इसकी अपनी लिपि थी, वर्तमान में इसे मुख्य रूप से कन्नड़ लिपि में लिखा जाता है।
- तुलु भाषी समुदाय दशकों से आधिकारिक मान्यता की मांग करते रहे हैं। यह मांग कर्नाटक विधानसभा में बार-बार उठाई गई है तथा सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से भी इसे आगे बढ़ाया गया है।
- अनुच्छेद 345 राज्य विधानमंडल को राज्य में प्रचलित किसी भाषा को प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाने का अधिकार देता है।
महत्त्व
- प्रशासनिक समावेशन: अब दोनों जिलों में सरकारी अधिसूचनाएँ और संचार तुलु भाषा में जारी किए जा सकते हैं।
- सांस्कृतिक संरक्षण: इससे तुलु भाषा, साहित्य और तटीय कर्नाटक की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा मिल सकता है।
- भाषा संवर्धन: अनुवाद और प्रशिक्षण के लिए समर्पित धनराशि तुलु के व्यावहारिक उपयोग को सुगम बना सकती है।
- संवैधानिक मान्यता: अनुच्छेद 347 किसी राज्य या उसके किसी भाग में किसी भाषा को मान्यता देने का प्रावधान करता है, जब जनसंख्या का पर्याप्त अनुपात उस भाषा को मान्यता देने की मांग करता है।
- मान्यता का अंतर: लंबे समय से मांग किए जाने के बावजूद तुलु अभी भी आठवीं अनुसूची से बाहर है, जिसमें वर्तमान में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है।
कवच संस्करण 4.0
संदर्भ: भारतीय रेलवे ने पहली बार दक्षिण मध्य रेलवे (एससीआर) पर कवच संस्करण 4.0 को शुरू किया है। हैदराबाद मंडल के मलकाजगिरी–कामारेड्डी खंड में 108 रूट किलोमीटर पर प्रणाली को संस्करण 3.2 से संस्करण 4.0 में उन्नत किया गया है।
कवच के बारे में

- कवच स्वदेशी रूप से विकसित स्वचालित ट्रेन सुरक्षा (एटीपी) प्रणाली है, जिसे परिचालन सुरक्षा बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है।
- यह लोको पायलट को निर्धारित गति सीमा बनाए रखने में सहायता करती है और यदि लोको पायलट ऐसा करने में विफल रहता है, तो आवश्यकता पड़ने पर स्वतः ब्रेक लगा सकती है।
- यह खतरे की स्थिति में सिग्नल पार करने (एसपीएडी) को रोकने, महत्वपूर्ण परिस्थितियों में ट्रेन की गति को नियंत्रित करने तथा टक्करों के जोखिम को कम करने में सहायता करती है।
- कवच का विकास क्रमिक संस्करणों के माध्यम से हुआ है, जिसमें संस्करण 1.0, 2.0, 3.0/3.2 और 4.0 शामिल हैं। इनमें परिचालन अनुभव और भारतीय रेलवे की आवश्यकताओं के आधार पर तकनीकी सुधार किए गए हैं।
- संस्करण 3.2 को दक्षिण मध्य रेलवे पर 1,465 रूट किलोमीटर में लागू किया जा चुका था, जिससे आगे के सुधारों के लिए अनुभव प्राप्त हुआ।
- कवच के लिए उच्चतम सुरक्षा प्रमाणन सुरक्षा अखंडता स्तर-4 (SIL -4) आवश्यक है।
कवच संस्करण 4.0 के बारे में
- कवच 4.0 में भारतीय रेलवे की विभिन्न परिचालन और तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तकनीकी सुधार किए गए हैं।
- बढ़ी हुई स्थान सटीकता अधिक सटीक ट्रेन स्थिति निर्धारण को सक्षम बनाती है।
- बड़े यार्डों में सिग्नल की स्थिति से संबंधित बेहतर जानकारी परिस्थितिजन्य जागरूकता को मजबूत करती है।
- ऑप्टिकल फाइबर केबल (ओएफसी) के माध्यम से स्टेशन-से-स्टेशन कवच इंटरफेस बेहतर संचार और प्रणाली एकीकरण को सक्षम बनाता है।
- मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग प्रणालियों के साथ प्रत्यक्ष इंटरफेसिंग रेलवे सिग्नलिंग अवसंरचना के साथ एकीकरण को बेहतर बनाती है।
आवश्यकता और महत्त्व
- बेहतर सुरक्षा: असुरक्षित ट्रेन संचालन के विरुद्ध स्वचालित सुरक्षा को मजबूत करता है।
- बेहतर परिस्थितिजन्य जागरूकता: अधिक सटीक स्थिति निर्धारण और सिग्नल संबंधी जानकारी सुरक्षित परिचालन में सहायता करती है।
- बेहतर विश्वसनीयता: उन्नयन विभिन्न परिचालन और तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करता है।
- स्वदेशी क्षमता: भारत की स्वदेशी रेलवे सुरक्षा प्रौद्योगिकी को मजबूत करता है।
- नेटवर्क-व्यापी तैनाती: भारतीय रेलवे में कवच की नियोजित बड़े पैमाने पर तैनाती के लिए तकनीकी आधार प्रदान करता है।
नाउरू ने अपना पारंपरिक नाम नाओएरो पुनः अपनाया
संदर्भ: संयुक्त राष्ट्र महासभा में राष्ट्रपति डेविड अडियांग ने घोषणा की कि दक्षिण प्रशांत द्वीपीय राष्ट्र, जिसे पहले नाउरू के नाम से जाना जाता था, अपनी विरासत, भाषा और राष्ट्रीय पहचान की पुष्टि के रूप में अपना पारंपरिक नाम नाओएरो पुनः अपना रहा है।
नाओएरो (पूर्व में नाउरू) के बारे में

- नाओएरो दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित एक छोटा द्वीपीय देश है। यह माइक्रोनेशिया के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में स्थित है और भूमध्य रेखा से लगभग 40 किमी दक्षिण में है।
- पहले नाउरू के नाम से जाना जाने वाले इस देश ने 2026 में अपने पारंपरिक नाम नाओएरो को पुनः अपनाया है। इसके नाम के उच्चारण में “नाउ-रू” से “नाउ-एरो” परिवर्तन हुआ है। अब इसका अंतरराष्ट्रीय कोड एनआरयू से एनआरओ हो जाएगा और इसके नागरिकों को देई-नाओएरो कहा जाएगा।
- ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी के औपनिवेशिक शासन के बाद इसे 1968 में स्वतंत्रता मिली और यह विश्व का तीसरा सबसे छोटा देश है।
- इस द्वीप की अनुमानित जनसंख्या लगभग 12,500 है। इसकी कोई आधिकारिक राजधानी नहीं है और सरकारी कार्यालय यारेन में स्थित हैं।
भारत ने जम्मू-कश्मीर पर ओआईसी के संदर्भों को खारिज किया
संदर्भ: भारत ने जम्मू-कश्मीर पर इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के संपर्क समूह के संयुक्त विज्ञप्ति में जम्मू-कश्मीर के संदर्भों को खारिज कर दिया। यह विज्ञप्ति न्यूयॉर्क में 81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर आयोजित बैठक के बाद जारी की गई थी।
इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के बारे में
- स्थापना: अल-अक्सा मस्जिद में आगजनी की घटना के बाद 1969 में रबात, मोरक्को में स्थापित किया गया।
- सदस्यता: चार महाद्वीपों में 57 सदस्य देश, जो लगभग 1.5 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- मुख्यालय: इसका महासचिवालय जेद्दा, सऊदी अरब में स्थित है।
- उद्देश्य: सदस्य देशों के साझा हितों की रक्षा करना, इस्लामी एकजुटता को मजबूत करना तथा राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देना।
- प्रमुख अंग: इस्लामिक शिखर सम्मेलन, विदेश मंत्रियों की परिषद और महासचिवालय, जिन्हें विभिन्न स्थायी समितियों, अधीनस्थ निकायों और विशेषीकृत संस्थानों का सहयोग प्राप्त होता है।
- ओआईसी शांति और सुरक्षा, फिलिस्तीन, आतंकवाद-रोधी प्रयास, आर्थिक सहयोग, मानवाधिकार, विकास और अंतरधार्मिक सद्भाव जैसे मुद्दों पर कार्य करता है।
- जम्मू-कश्मीर पर ओआईसी संपर्क समूह की स्थापना 1994 में हुई थी। यह नियमित रूप से इस मुद्दे पर चर्चा करता है और कश्मीर विवाद से संबंधित रुख अपनाता रहा है।
